विश्वशांति के पुरोधा हम

विश्वशांति के पुरोधा बनकर

कितनी बार गुहार लगाएंगे कि

किसी भी बात-बे-बात को लेकर

लड़ना

कितना उचित है?

लड़ाई किसी भी बात पर हो

अनुचित है।

बस, थोड़ी-सी जमीन के लिए

या अपनी साख

अहम

या फिर जातिवाद, आतंकवाद जैसा मुद्दा

उठाकर भीड़ जाते हैं

दो देश आपस में!

एक दूजे पर बरसाते हैं, बम ही बम

बारूद ही बारूद 

दो देशों के इस भयानक युद्ध में

हजारों तो कभी लाखों

बे-गुनाह लोग

यानी मनुष्य ही मनुष्य का

करता है नरसंहार

कोई

फरिश्ता कभी, कहीं से नहीं

रोकता है इस दो देशों के

बीच के भयानक युद्ध को,

श्वेत कबूतर उड़ाने वाले देश भी

नहीं करते युद्ध विराम की पैरवी!

और इस अमानवीय

युद्ध से

कितना असर पृथ्वी

के पर्यावरण पर होता है

इस बात पर चिंतन

“पर्यावरण विमर्श” जैसे विषय

पर होता है

अवश्य

परन्तु विनाश और

बरबाद होती सृष्टी,

दूषित होता वातावरण,

दूषित होता जलवायु,

दूषित होती नदियाँ-झील-झरने 

जल स्रोत।

पिघलते बर्फ के पहाड़,

बिगड़ता पृथ्वी का सौंदर्य।

दूषित होती हवाएँ 

इसे रोकने के लिए कोई

तत्परता नहीं करता।

यदि इस ओर मनुष्य

अपनी जिजीविषा को

मोड़ दे,

तो आने वाला कल

बहुत ही सुंदर होगा

बहुत ही सुहाना होगा!

डॉ. जयप्रकाश नागला

             नांदेड़, महाराष्ट्र