प्रभात संगीत क्रमांक 2707 (नीलकंठ दिवस)
सबार आपन तुमि सबार प्रिय
तुमि अलकार तुमि वसुधार
विश्वेर विष राशि कंठे निये
अमर होयेछो गुणे आपनार।
गुणेते तोमार सम नाहिको केहो
रुपेर समारोहे अतनु गेह
प्रीति ममताय परिपूर्ण स्नेह
एमंटी नाही भावा जाय आर।
हिमाद्री शिरे उत्तूंग तुमि
पातालेर गहवरे रयछो चूमी
देहे मने बारे–बारे तोमारे नमी
अमरार तुमि सुधा सार।
अर्थ:
हे प्रभु, तुम सबके अपने और प्रिय हो। तुम स्वर्ग और वसुधा दोनों के ही हो।
पूरे विश्व का विष कंठ में धारण किए हुए, तुम अपने ही गुण से अमर हो गये हो।
गुणों में तुम्हारे समान कोई भी नहीं है, तुम में रूपों की सामूहिकता होने के बाद भी तुम्हारा निवास अशरीरी है।
तुम प्रेम, ममता और स्नेह से परिपूर्ण हो। यह सब और सोचने में भी मैं खुद को असमर्थ पा रहा/ रही हूँ।
तुम हिमालय पर्वत-शिखर जैसे ऊँचे हो और पाताल की गहराइयों को भी चूम रहे हो। मैं तुम्हें शरीर और मन से बार-बार नमन करता हूँ। स्वर्ग लोक के अमृत के तुम ही सार हो।
