चौपाईवत

चौपाईवत

उजियारे   तू    क़दम   बढ़ा  रे

ख़ुद     भागेंगे    ये   अँधियारे

 

सफर  कठिन  है मत घबरा रे

दुख  वाले  दिन चार  हैं प्यारे

 

कर्तव्यों   को   गले   लगा  रे

चमक   उठेंगे   क़िस्मत  तारे

 

रोकर पा न सकेगा कुछ भी

मुस्कानों  के   गीत   सुना रे

 

जय”ने तुझको अपना माना

तू  भी अपनापन दिखला रे

डॉ जयसिंह आर्य नई  दिल्ली