वर्तमान में स्वार्थी राजनेताओं व अन्य तथाकथित बुद्धिजीवियों द्वारा एक प्रकार का प्रोपेगेण्डा चलाया जा रहा है कि हमारे देश भारतवर्ष की जनसंख्या बेहिसाब बढ़ रही है। यह आने वाले समय में मनुष्य के अस्तित्व के लिए खतरे की बात है। यह एक शातिराना षड्यन्त्र है। दुनिया में ऐसी कोई भी समस्या नहीं है जिसका समाधान मानव-मस्तिष्क न कर सके। जन्म-मृत्यु सृष्टि की एक सतत धाराप्रवाह है। एक ओर प्रत्येक दिन अनेक शिशुओं का जन्म होता है, जो परिवार के लोगों को खुशियाँ प्रदान करता है तो दूसरी ओर अनेक लोग इस दुनिया से प्रयाण कर जाते हैं। लेकिन यह दु:ख की बात है कि शासन व्यवस्था में बैठे हुए कुछ लोग और तथाकथित जन-नेता इस जनसंख्या वृद्धि को सामाजिक अभिशाप मान बैठे हैं। यह प्रवृत्ति निश्चय ही उस मानव जाति के लिए कलंक है जो अपने आप को बौद्धिक रूप से विकसित और वैज्ञानिक विचार का धनी समझता है।
इतिहास में झाँकें, तो 1952 से जन्म दर कम करने और जनसंख्या वृद्धि दर को धीमा करने के लक्ष्य के साथ भारतवर्ष में परिवार नियोजन की शुरुआत की गई। यह विश्व का पहला देश बना, जिसने परिवार नियोजन कार्यक्रम की शुरुआत की। इस परिवार नियोजन कार्यक्रम को अब परिवार कल्याण कार्यक्रम के नाम से जाना जाता है। इस कार्यक्रम को हिंदू व अन्य अल्पसंख्यक परिवारों ने अपनाया लेकिन सम्प्रदाय विशेष ने इसे नहीं अपनाया। इससे डेमोग्राफिक सन्तुलन बिगड़ने की समस्या आ गई।
नीचे दी गई तालिका में हिन्दू-मुस्लिम आबादी को तुलनात्मक रूप से दिखाया गया है।
| वर्ष | जनसंख्या
करोड़ में |
दशकीय
वृद्धि करोड़ में |
प्रतिशत
वृद्धि वार्षिक |
हिन्दू
आबादी % |
मुस्लिम
आबादी % |
| 1941 | 31.9 | – | – | – | – |
| 1951 | 36.1 | 4.2 | 1.31 | 84.1 | 9.8 |
| 1961 | 43.9 | 7.8 | 2.16 | 83.5 | 10.7 |
| 1971 | 54.8 | 10.9 | 2.48 | 82.7 | 11.2 |
| 1981 | 68.3 | 13.5 | 2.46 | 82.3 | 11.8 |
| 1991 | 84.4 | 16.1 | 2.36 | 81.5 | 12.6 |
| 2001 | 102.9 | 18.5 | 2.19 | 80.5 | 13.4 |
| 2011 | 121.1 | 18.2 | 1.77 | 79.8 | 14.2 |
वर्ष 2021 में कोविड-19 के कारण जनगणना टाल दिया गया है।
इस डेमोग्राफिक असन्तुलन का लाभ राजनैतिक पार्टियाँ वोट बटोरने के लिए उठा रही हैं, लेकिन इन सब का समाधान प्रउत व्यवस्था के अन्तर्गत है। किसी को भी भयभीत होने की आवश्यकता नहीं है।
जनसंख्या वृद्धि के कारण:-
- आर्थिक (Economical) कारण :–
क्रय शक्ति कम होने के कारण जीवन-स्तर बहुत ही निम्न-स्तर का होता है। फलस्वरूप मनोरंजन के साधनों का अभाव होता है। अतः मनुष्य की कामवृत्ति के कारण जनसंख्या वृद्धि होती है।
- जैविक (Biological) कारण :–
लोगों का शारीरिक व मानसिक स्वास्थ्य निम्न-स्तर का होता है। वे अपने शरीर व मन के बीच सन्तुलन स्थापित नहीं कर पाते। फलस्वरूप भौतिक उर्जा कामवृत्ति की ओर प्रेरित होती है।
- मनोवैज्ञानिक (Psychological) कारण :-
गरीबी के कारण मानसिक चिन्ताएं व दु:ख बढ़ जाती हैं। इससे छुटकारा पाने के लिए मनुष्य कामवृत्ति का दास बन जाता है।
- बौद्धिक (Intellectual) कारण :-
गरीब मनुष्य बौद्धिक रूप से विकसित नहीं होता। वह अपनी मानसिक ऊर्जा को आध्यात्मिक ऊर्जा की ओर ले जाने में सक्षम नहीं हो पाता। इस अवस्था में मनुष्य हीन वृत्तियों का शिकार हो जाता है।
क्या जनसंख्या वृद्धि वाकई में प्राकृतिक समस्या है? क्योंकि लोगों का विचार है कि जनसंख्या वृद्धि से भोजन और आवास की समस्या पैदा होगी। इसके अलावा रोज़गार की भी समस्या पैदा होगी। लेकिन यह धारणा गलत है। हमारे देश में इतना अन्न का उत्पादन होने लगा है कि हम दूसरे देशों को भी अन्न निर्यात कर रहे हैं। यदि पृथ्वी की आबादी वर्तमान से दुगुना भी हो जाती है तो भी पृथ्वी पूरे विश्व को भोजन देने में सक्षम है। जिस प्रकार से शिशु के जन्म होने पर माता के स्तन में दूध आ जाता है, उसी प्रकार प्रकृति ने इस पृथ्वीवासियों को धन-धान्य से परिपूर्ण कर रखा है। कमी है तो सहकारिता सहयोग (coordinated cooperation) भावना की, सामूहिक प्रयास की, उचित आदर्श की, दमदार योजना की। वर्तमान में सरकारें व व्यवस्था भ्रष्टाचार में आकण्ठ डूबी हुई हैं। न तो नीतियां ठीक हैं और न ही नियत। दोषपूर्ण सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था और अविवेकपूर्ण वितरण के कारण समाज, अमीर और गरीब दो वर्गों में बट गया है। गरीब वर्ग दिनोंदिन गरीब होते जा रहा है और अमीर वर्ग अमीर। इसका दुष्परिणाम है अपराधों में लगातार वृद्धि। क्योंकि जनसंख्या वृद्धि गरीब वर्ग में अधिक है अमीर वर्ग की तुलना में।
जनसंख्या नियन्त्रण हेतु प्राउटिष्टिक निदान :-
यदि निम्नलिखित चार कारकें समाज में विद्यमान हों तो जनसंख्या वृद्धि स्वत: ही नियन्त्रित हो जाएगी।
- आर्थिक स्वतन्त्रता (Economic Liberty)
समाज में आर्थिक स्वतन्त्रता होने से लोगों को पौष्टिक आहार उपलब्ध हो सकेगा, क्योंकि क्रय शक्ति अधिक होगी। क्योंकि देखा गया है कि धनी परिवार में कम बच्चे होते हैं और गरीब परिवार में अधिक बच्चे होते हैं। उदाहरणार्थ- स्कैण्डिनेविया में लोगों की अधिक क्रय क्षमता होने के कारण उनका जीवन स्तर बहुत अधिक ऊँचे स्तर की है। अतः वहाँ पर जनसंख्या वृद्धि की कोई समस्या नहीं है।
- अच्छा स्वास्थ्य (Sound Health)
सबको अच्छे स्वास्थ्य लाभ प्राप्त करने का अधिकार हो। यदि लोगों का शरीर और मन स्वस्थ होगा तो हार्मोनल पद्धति भी सन्तुलित होगी और वे लोग अपने भौतिक ऊर्जा को मानसिक ऊर्जा में और मानसिक ऊर्जा को आध्यात्मिक ऊर्जा में परिणित कर पाएंगे। इस आध्यात्मिक विकास के क्रम में मनुष्य की हीन वृत्तियाँ सरलता से नियन्त्रित की जा सकेंगी।
- मानसिक चिन्ताओं से मुक्ति (Free from mental worries)
देखा गया है कि मानसिक रूप से परेशान व्यक्ति के यहाँ अधिक बच्चे होते हैं। अतः मनुष्य को अनावश्यक चिन्ताओं और अवसाद से मुक्त होना होगा। मनुष्य जब मानसिक दु:ख से गुजरता है तो हीन प्रवृत्तियाँ हावी हो जाती हैं। यदि मानसिक कष्ट नहीं होगा तो मनुष्य के जीवन में शान्ति होगी और उच्च भावनाएँ मन में पनपने लगती हैं।
- उच्च बौद्धिक स्तर (High Intellectual Standard)
यह देखा गया है कि वैज्ञानिक और दार्शनिक परिवार में कम बच्चे होते हैं। अत: मानवता के बौद्धिक स्तर को पुनः स्थापित करना होगा। बौद्धिक उन्नति के साथ मानव अपनी सर्वांगीण मानसिक क्षमता को उन्नत कर सकता है और अपनी मानसाध्यात्मिक क्षमता को आसानी से विकसित कर सकता है। सहज प्रयास के माध्यम से मनुष्य अपने व्यक्तिगत अस्तित्व को परमसत्ता में विलीन करते हुए, सर्वोच्च स्थिति प्राप्त करने में सक्षम हो सकेगा। अतः मानव मन हीन-वृत्ति से उपर उठेगा।
उक्त चारों कारकों की पूर्ति हेतु मनुष्य को रोज़गार प्रदान करना होगा जिससे उसके क्रय शक्ति बढ़ सके और साथ ही साथ उसे शिक्षित भी करना होगा ताकि अपने शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य को अच्छा रख सके। और साथ ही साथ प्रशिक्षित करना होगा ताकि वह अपने भौतिक ऊर्जा को मानसिक ऊर्जा में और मानसिक ऊर्जा को आध्यात्मिक ऊर्जा में परिणित करने की कला सीख सके।
इसके अलावा जनसंख्या वृद्धि होने पर भौतिक स्तर पर भी निम्नलिखित प्रयास करने होंगे।
- बंजर भूमि को कृषि योग्य बनाना होगा।
- वैज्ञानिक पद्धति से कृषि उत्पादन को बढ़ाना होगा।
- ज़मीन, पानी और हवा की क्षमता का उपयोग करते हुए रासायनिक विधि से अन्न उपजाना होगा।
- यदि पृथ्वी अपनी उत्पादन क्षमता खो दे तो उस स्थिति में मनुष्य को दूसरे ग्रहों में विस्थापित होना होगा।
- विज्ञान अब उस स्थिति में पहुँच गया है कि वह एक नये युग का सूत्रपात कर सकता है। यह दुनिया की खाद्य समस्याओं को हल करने हेतु सिंथेटिक लेकिन पौष्टिक भोजन का उत्पादन कर सकता है। इसकी एक गोली पूरे दिन के लिए पर्याप्त हो सकेगी। इसलिए हमें जनसंख्या वृद्धि से डरने की ज़रूरत नहीं है। भावी पीढ़ियाँ अपना अधिक समय और ऊर्जा सूक्ष्म मानसिक और आध्यात्मिक गतिविधियों पर खर्च करेंगी, इसलिए भौतिक भोजन की उनकी मांग भी कम हो जाएगी।
- अधिकतम उत्पादन एवं आर्थिक सुरक्षा के लिए समाज को सामूहिक आर्थिक व्यवस्था अपनानी होगी ताकि संचय पर नियंत्रण रखा जा सके। साथ ही एक सुव्यवस्थित सहकारी प्रणाली के माध्यम से सामूहिक धन का तर्कसंगत वितरण सुनिश्चित करना होगा और विकेन्द्रीकृत सामाजिक-आर्थिक योजना लागू करना होगा और सभी प्रकार की सांसारिक, अलौकिक और आध्यात्मिक क्षमताओं का अधिकतम उपयोग सुनिश्चित करना होगा। अभी तक समाज ने ऐसा दृष्टिकोण नहीं अपनाया है इसलिए वह भोजन की समस्या का समाधान करने में असमर्थ रहा है।
प्रउत दर्शन के अनुसार निम्नलिखित कदम भी उठाने होंगे।
- स्त्री/पुरुष के शरीर का आपरेशन द्वारा उनकी प्रजनन शक्ति को स्थायी रुप से नष्ट करके जन्म नियन्त्रण नहीं होगा। कारण उनमें कभी भी उग्र मानसिक प्रतिक्रिया पैदा हो सकती है, जो उनके और समाज के लिए क्षतिकारक होगी तथा दूसरा कारण है कि भविष्य में पैदा होने वाले महान विभूतियों से वंचित होना। उदाहरण – भगवान कृष्ण अपने माता-पिता के आठवीं सन्तान थे। सुभाषचन्द्र बोस अपने माता-पिता के नौवीं सन्तान थे। गरीब परिवार हेतु अस्थायी व वैज्ञानिक जन्म नियन्त्रण की पद्धति स्वीकृति होगी।
- योग्य व्यक्ति को अधिक सन्तान पैदा करने की अनुमति होगी जबकि अयोग्य व्यक्ति को न्यूनतम।
उपरोक्त तथ्यों के आधार पर यह स्पष्ट है कि जनसंख्या वृद्धि कोई समस्या नहीं है। प्राउटिष्टिक व्यवस्था को अपनाकर इस समस्या से सरलता से मुक्ति पाई जा सकती है।
प्रस्तुति – आचार्य शिवानन्द दानी

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