हम सभी उन्हीं लोगों में से हैं जो अंधविश्वास पर ही अपने जीवन का आधार बनाते हैं। हम भी वही कार्य करते हैं जिस पर हमारा विश्वास बन जाता है। किसी भी व्यक्ति का विश्वास एक ही जीवन मे अपने बचपन से क्या सुनते आ रहे हैं और किस परिवेश में जी रहे हैं उसके आधार पर बनता चला जाता है। हजारों वर्षों की रीति की परिभाषा का महत्व बस इतना है कि हम पुरानी बातों को परखते नही हैं या सवाल नही पूछते हैं क्योंकि हमें यह विश्वास दिला दिया जाता है कि हमारी महानता और अस्तित्वकी रक्षा पुराने रीति रिवाजों को मानने की वजह से ही होते आ रही है। ज्यादातर मनुष्य धर्म भीरू ही होता है और वह उसपर आसानी से विश्वास कर लेता है जो उसे अपने से जुड़े लोग सिखाते हैं। कुछ नया समझने या करने की हिम्मत ज्यादातर लोगों में नही होती है क्योंकि मन मे और समझ मे सहजता की बेड़ियाँ लगी होती हैं। चाहे इंसान अपनी जिंदगी को स्वाहा ही क्यों न कर ले उसके मन मे विश्वास रहता है कि उसका कल्याण भी उसी राह से है। यह जो मानसिक जड़ता और आध्यात्मिक अज्ञानता है यही प्रगति की सबसे बड़ी बाधा है। इस बाधा के पार जाने के लिए पहला कदम उठाने की आवश्यकता अवश्य पड़ती है और ऐसे आध्यात्मिक गुरु के शरण मे जाना पड़ता है जो अंतरात्मा के माध्यम से आत्मविश्वास पैदा करते हैं और जो अंतर्मन में उस अलौकिक छवि के दर्शन करवाते हैं और उसमें अनंत प्रेम का अनुभव देते हैं। उस आत्मविश्वास के माध्यम मात्र से ही मनुष्य अपने जीवन को सार्थक करने में सफल हो सकते हैं अन्यथा पूर्वजों के रीति रिवाजों से मुक्ति तो मृत्युपर्यन्त भी सम्भव नही हो पाता है क्योंकि मृत्युपर्यन्त भी उन रीति रिवाजों से किसी एक व्यक्ति या उसकी आत्मा को बांध दिया जाता है। यही इस धरती के मानव जीवन का कड़वा सत्य है।
सभी कहते हैं और मानते हैं कि वह मुक्ति और मोक्ष की राह पर अपने रीति रिवाजों के माध्यम से अग्रसर हो रहे हैं पर अज्ञानता और भय की वजह से कोई स्वयं से यह सवाल करने की हिम्मत नही कर पाता है कि उनका बंधनो में बांधने वाले रीति रिवाज आखिर उन्हें या उनके मन को मुक्त कैसे कर पाएंगे भला? जब स्वयं से सवाल करने की हिम्मत पैदा हो जाएगी तब सही मायने में धर्मपथ की खोज में वह इंसान आगे बढ़ जाता है और उसे वह राह भी अवश्य मिलती है और उसकी प्रगति की शुरुआत वहीं से शुरू हो जाती है।
आनंदसूत्रं में कहा गया है कि
मुक्तिआकांक्षया सद्गुरू प्राप्ति:
अर्थात मुक्ति एवं मोक्ष की प्रबल इच्छा होने पर सद्गुरु की प्राप्ति होती है, जो प्रगति के मार्ग को प्रशस्त करते हैं और उसी राह पर चलते हैं, गुरु कृपा से जीव का कल्याण हो जाता है।
दूसरा सूत्र है
ब्रम्हेव गुरुरेक: नापरः
इसका अर्थ ब्रह्मा के अलावा और कोई गुरु हो ही नही सकता। यह भी समझना जरूरी है कि यह ब्रह्म हिंदुओं के पौराणिक देवता नही हैं बल्कि सबके मैं के मैं हैं अर्थात जो सबके मैपन में छुपे हुए हैं अर्थात उनसे साक्षात्कार करने के लिए अपने मैपन में झाँककर अपने मैपन का त्याग करना पड़ेगा तभी उनका अहसास सम्भव है। जब तक हमारा व्यक्तिगत मैं हम पर भारी होगा हमें वृहत मैं अर्थात ब्रह्म का अनुभव करना भी मुश्किल ही है और बिना अहसास के विश्वास मजबूत नही हो सकता। यह विश्वास ही आधार है हमारी प्रगति या दुर्गति का तो बिना विश्वास के इस जगत में कुछ भी संभव नहीं।
