भारत वर्ष की खस्ताहाल न्याय व्यवस्था का भारतीय परिवेश एवं जनजीवन पर दुष्प्रभाव

किसी भी समाज के लिए न्याय व्यवस्था रीढ़ की हड्डी के समान होती है। न्याय व्यवस्था में अगर रोग लग जाये तो किसी इमारत के आधार के कमज़ोर होने की तरह वह समाज भी कमज़ोर होना शुरू हो जाता है। भारत वर्ष की न्याय व्यवस्था का वर्तमान परिदृश्य को देखा जाए तो कुछ वैसा ही मंज़र दिखाई देता है। चारों तरफ अफरा-तफरी मची हुई है, न्याय के नाम पर बाज़ार सजा हुआ है और सब कुछ बिकाऊ दिखाई देने लगा है। मात्र चंद धन्ना सेठों, साहूकारों, सत्ताधारियों एवं कलाकारों के लिए इस देश का न्यायालय कार्य करता हुआ नज़र आता है नहीं तो न्यायालय में रखी मूर्ति की तरह इस देश की न्यायव्यवस्था पूरी अंधी ही दिखाई देना शुरू कर दी है। न्याय व्यवस्था किसी भी समाज का सबसे मजबूत स्तंभ इसलिए होता है क्योंकि जब समाज में इंसान अपने आपको पूरी तरह बेसहारा महसूस करता है तो न्यायालय का दरवाजा खटखटाता है ताकि उसे सहारा मिल सके, पर इस देश के न्यायालयों में ऐसी परिस्थितियाँ निर्मित हो चुकी हैं कि यह बात पूरी झूठी नजर आने लगी है कि चिंता करने की कोई बात नहीं, इस देश में अभी कानून ज़िंदा है। कैसे हो इस देश की जनता को विश्वास, क्योंकि न्याय व्यस्था के रहते हुए देश में प्रचंड भ्रष्टाचार है और कोई भी भ्रष्टाचारी घोषित होकर सज़ा प्राप्त करता हुआ नज़र नहीं आता है।

इस देश का न्यायालय ही एक अजायबघर नज़र आता है जहाँ पर मात्र तारीखें और न्याय के नाम पर धोखा मिलता हुआ दिखाई देता है। तारीख देने तक के लिए पैसे मांगे जाते हैं और न्याय की कुर्सी पर बैठा हुआ न्यायधीश सब कुछ चुपचाप शांति से देखता रहता है। न्यायालय में ही खरीद-फरोख्त होता है जबकि मैं यह कहूँगा की न्यायालय ही कहता है कि आपस में मामले को सुल्टा लो, काहे न्यायालय में झंझट करते हो। देश के वर्तमान के कानून मंत्री की राज्यसभा में कही बात को मानें तो देश के विभिन्न न्यायालयों में विचाराधीन कानूनी विवादों की गिनती 5.02 करोड़ पहुँच चुकी है अर्थात देश की 135 करोड़ की जनसंख्या के अनुसार देखें तो हर 27 व्यक्ति में से एक व्यक्ति किसी न किसी कानूनी मुकदमे में फँसा हुआ है। यह देश के नागरिकों की किसी कानूनी प्रताड़ना से कम नहीं है। सालों न्यायालयों में किसी मुकदमे को घसीटा जाता है।

उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय का हाल तो इतना बुरा है कि सालों कितने मुकदमों की सुनवाई तक नहीं होती है और प्रार्थी अपनी बारी का इंतज़ार करते रहते हैं पर उन्हें न्याय मिलने का सपना आना भी बंद हो जाता है। ऐसे कई मुकदमे होते हैं जहाँ एक पीढ़ी खत्म हो जाती है तो अगली पीढ़ी को मुकदमे में पेश होना पड़ जाता है। देश की न्यायव्यवस्था की यह स्थिति पूरे समाज को गंदा करना शुरू कर दी है। देश में वही सैकड़ों साल पुराने घिसे-पिटे कानून चलाये जा रहे हैं और उसकी सबसे प्रमुख वजह है कि इस देश में जाहिल, अनपढ़ और अपराधी एवं अपराधी किस्म के राजनेताओं के हाथ में इस देश की जनता सत्ता सौंपती रहती है। बहुत आसान है इस देश की जनता को मूर्ख बनाना क्योंकि उन्हें प्रगति क्या होती है यह समझ नहीं आता है और उनका कल्याण कैसे होगा यह भी नहीं समझ आता। हम सभी को तो भगवान भरोसे जीने की हज़ारों वर्षों से आदत पड़ी हुई है। हम तो कुछ गलत होता देखकर संघर्ष करने से भी अब कतराने लगे हैं और बस यह कह देते हैं कि हमें क्या? हम पढ़े लिखे सभ्य लोग हैं और हम अपने परिवार की जरूरत पूर्ति की तरफ़ ध्यान देंगे और राजनीति के दलदल में क्यों धसेंगे? इसी अनदेखी का फायदा उठाते हैं आपराधिक किस्म के लोग जो संगठन बनाकर और लुटेरे धन्ना सेठों के साथ साठ-गाँठ कर लोकतंत्र के नाम पर मात्र लूट और अराजकता का साम्राज्य चलाते हैं। कहने को तो इस देश में चाक चौबंद कानून व्यवस्था है और शांति पसरी हुई है पर आपराधिक मामलों के 2023 के आंकड़ों को देखें तो हर 1,00,000 व्यक्ति में 445.9 अपराध के मामले दर्ज हो रहे हैं। मेरा यह मानना है कि असलियत में अभी भी यह गिनती कम से कम 5 गुना या ज्यादा ही होगी क्योंकि बहुत सारे आपराधिक मामलों को पैसे के दम पर तो कभी सत्ता के दम पर या फिर प्रशासनिक ताकत के दम पर या सामाजिक दबाव बनाकर या फिर देश की पुलिस के द्वारा ही डरा धमकाकर दबा दिए जाते हैं। ऐसे मामले जिन्हें जबरदस्ती दबा दिया जाता है उनकी कोई सुनवाई नहीं है।

इसके अलावा भी देश के हर राजस्व न्यायालय, कलेक्टोरेट, कमिशनर के न्यायालयों में जो मामले दर्ज हैं उनकी गिनती या आंकड़े कहीं पर दर्ज नहीं होते हैं। देश की न्याय व्यवस्था में जो गंदगी फैली हुई है उसके सबसे प्रमुख अपराधी सबसे पहले इस देश में कानून बनाने वाले सत्ताधारी नेता हैं जो अपने हित के लिए या फिर अपने पूंजीपति मित्रों के हित के लिए या उच्च प्रशासनिक अधिकारियों के हित के लिए चुपचाप बिना किसी तर्क, चर्चा या हल्ला-गुल्ला मचाये कानूनी बदलाव कर देते हैं पर जहाँ भी जनता के कल्याण संबंधित कानून में बदलाव की बात है तो पूरे देश में बहस की जंग छिड़ जाती है और उसका इतना मीडिया प्रचार किया जाता है जैसे आसमान सर पर फटकर गिरने वाले है। तर्क के नाम पर मीडिया में कुतर्क ज्यादा किये जाते हैं और जरूरी कानूनी बदलाव के मामलों को सालों तक विवादित है कहकर लटकाकर रख दिया जाता है। देखा जाए तो जरूरी कल्याणकारी कानूनी बदलाव का मात्र राजनीतिकरण होता है और ऐसी स्थिति निर्मित की जाती है कि वह बदलाव लगभग असंभव है।

इस देश का संविधान दुनिया में सबसे बड़ा है। उसे लिखते समय तो चर्चा का विषय नहीं बनाया गया था बल्कि देश के नैतिकवान, ज़िम्मेदार, शिक्षित एवं सामाजिक लोग मिलकर उस समय के अनुसार लोक कल्याण को देखते हुए और अन्य देशों के संविधान से प्रेरणा एवं उदाहरण लेकर इस देश के संविधान की रचना किये थे। फिर वर्तमान में अनपढ़, जाहिल, अनैतिक सत्ताधारी नेता, और जिन्हें सामाजिकता और कानून की समझ तक नहीं वह जनता, क्या योगदान कर सकती है, जो इसे जनता के बीच इतना चर्चा का विषय बनाया जाता है। इस देश की जनसंख्या विश्व के सभी लोकतंत्रों में सबसे ज़्यादा है उसके बावजूद क्या हमारे देश में आज़ादी के 76 वर्षों बाद भी पढ़े-लिखे, समझदार, नैतिकवान देशभक्तों की इतनी कमी है कि वह इस दिशा में सोच भी नहीं सकते और एक संगठन बनाकर देश एवं राज्य सरकारों को ज़रूरी कानूनी बदलाव की पेशकश नहीं कर सकते हैं? क्या फायदा है इस देश के इतने पढ़े-लिखे प्रशासनिक अधिकारियों, न्यायधीशों एवं समाज सेवियों का जो मिलकर ऐसा कुछ करने में असमर्थ ही नज़र आते हैं। देश की सत्ता में बैठे दोनों सदनों के जनप्रतिनिधि एवं विधानसभाओं में बैठे जनप्रतिनिधि क्या मात्र राज चलाने, भ्रस्टाचार को पनपने देने और लूट का माहौल खड़ा करने एवं जनजीवन को अस्त-व्यस्त करने मात्र के लिए हैं? ऐसी प्रशासनिक व्यवस्था किस तरह से देश के लिए प्रगतिशील साबित हो सकती है? जिस देश में इतना ज्यादा नैतिक पतन का माहौल हो और सही मायने में नेतृत्वविहीन नज़र आती हो वह देश किस तरह से प्रगति की राह पर अग्रसर रह सकता है और किस तरह जनकल्याण का कोई कार्य सही तरीके से संभव हो सकता है। इस देश के पूरे के पूरे प्रशासनिक ढाँचा और न्यायव्यवस्था को दीमक लग चुका है ऐसा नज़र आना शुरू हो गया है। ऐसी परिस्थिति में तो जनांदोलन होना चाहिए पर इस देश की मूर्ख जनता को चंद रेवड़ियाँ परोस दी जाती हैं और धर्म के नाम पर आपस में लड़ाकर गुमराह कर दिया जाता है। और राजनेता सत्ता लाभ लेकर लूट खसोट एवं अराजकता की व्यवस्था को भी ईमानदारी और विकास की व्यवस्था कहने से भी नहीं थकते हैं।

इस देश की दीमक लगी हुई प्रशासनिक व्यवस्था, कानून व्यवस्था और मुर्दा न्याय व्यवस्था देशवासियों के घरों में सेंध लगाना शुरू कर दी है। कहने और सुनने में मेरी बातें बुरी और कड़वी अवश्य लगेंगी पर यह वर्तमान की देश की पारिवारिक व्यवस्था की कड़वी सच्चाई बनते जा रही है और पारिवारिक विघटन का बहुत बड़ा कारण बनते जा रही है। हम सालों से इसे सामाजिक रूप से और कानून के दृष्टिकोण से हजारों वर्ष पुरानी सोच की वजह से नज़र-अंदाज़ करते रहे हैं पर यह भयावह स्थिति पर पहुँच चुकी है जो देश की सम्पूर्ण समाज के अस्तीत्व पर खतरे के बादल की तरह छा गई है। इस देश के शुभचिंतकों ने बेटी पढ़ाओ और बेटी बचाओ अभियान चलाया और विगत वर्षों में नारी उत्थान के लिए बहुत सारे कार्य हुए हैं जो अत्यंत सराहनीय कार्य हैं। कानून ने भी नारी सुरक्षा एवं नारी प्रताड़ना के विषय को बहुत गंभीरता से लिया और दहेज प्रताड़ना जैसे विषयों पर तुरंत कार्यवाही कर इस कुरीति की रोकथाम में अत्यंत सराहनीय कार्य किया है। नारियों की शिक्षा एवं आर्थिक प्रगति विगत कई वर्षों में सराहनीय रही है जो नारियों के स्वावलंबी बनने और नारियों के उत्थान के लिए समाज में आवाज़ उठाने लायक स्थिति में उन्हें ले आई है। नारी सुरक्षा और नारी अधिकार के मामलों में अत्यंत जनजागरण भी हुआ है जिससे देश के हर भाग में नारियाँ अपने अधिकारों को समझने लगी हैं। नारी सुरक्षा के लिए काम करने वाली स्वयं सेवी संस्थाओं का भी निर्माण हुआ है जो प्रताड़ित नारियों को मदद करने और न्याय दिलाने में अग्रणी भूमिका निभाने लगी हैं।

जब कानून हर रूप में नारी सुरक्षा के लिए मुस्तैदी से काम करने लगा है और नारी सुरक्षा एवं अधिकारों के लिए नारी स्वयं सेवी संस्थाएं इतनी सजग और देश की नारियों को जागृत करने में सफलतापूर्वक सराहनीय कार्य करने लगी हैं। नारियों की आर्थिक स्वावलंबिता एवं आर्थिक अधिकारों में वृद्धि हुई है और जागरूकता फैली है। उस दृष्टिकोण में इस देश के खासकर हिन्दू विवाह संबंधित कुछ कानूनों में बदलाव लाना आवश्यक नज़र आने लगा है। हिन्दू विवाह कानून के अनुसार लगभग सब कुछ नारी अधिकार पर आधारित नज़र आने लगा है और पुरुषों एवं परिवारों के सामान्य मानवता के अधिकारों को भी पूरी तरह नज़र-अंदाज़ कर दिया गया है। न्यायालय भी यह समझता है कि इस देश की नारियाँ उनकी सुरक्षा के लिए बनाए गए कानून और सुरक्षा व्यवस्था का नाजायज़ फ़ायदा उठाने लगी हैं और लगभग 80 से 90% पारिवारिक विवाद के मामले झूठे और बिना किसी बुनियाद एवं साक्ष्य के हैं। न्यायालय ऐसे मामलों में भी जिनमें न कोई साक्ष्य प्रस्तुत किये जाते हैं और न ही कोई जाँच होती है और न ही कोई विस्तृत परिस्थिति की जानकारी प्रस्तुत किया जाता है, के लिए पुरुषों और उनके परिवारों को मात्र किसी नारी की आधारहीन सूचना के आधार पर कानूनी रूप से प्रताड़ित करने के कार्य में अत्यंत लिप्त हो चुकी है। इस देश का सर्वोच्च न्यायालय तक यह टिप्पणी करने से बाज़ नहीं आता है कि पुरुषों को अपने पत्नियों की हर बात चाहे सही हो या गलत मान लेनी चाहिए नहीं तो उनकी खैर नहीं। पुरुषों को अपने ही बच्चों के प्रति अधिकारों के लिए नारी समर्थन के लिए वंचित कर दिया जाता है और कोई भी मामला न्यायालय में पहुंचे तो न्यायालय का पारिवारिक विवाद के मामलों में जिसमें किसी भी गंभीर अपराधों की बात तक नहीं कही गई है, में भी पुरुषों को गंभीर अपराधियों की तरह प्रताड़ित करने और उनके विरुद्ध निर्णय लेने में कोई कसर नहीं छोड़ा जाता है। पुरुषों एवं उनके परिवारों को झूठे मुकदमों में सालों प्रताड़ित होना पड़ता है और उनके साथ होने वाले क्रूरता को भी नज़र-अंदाज़ कर न्यायालय उन्हें पारिवारिक विघटन के अधिकारों से वंचित कर मात्र हजारों वर्ष पुरानी बातों का हवाला देते हुए निर्णय सुनाने में आनाकानी करता हुआ नज़र आता है। पुरुषों के परिवार में भी नारियाँ होती हैं पर उनकी प्रताड़ना को नारी उत्थान का दर्जा नहीं दिया जाता है। जब दो समझदार लोग साथ रहने में असमर्थ नजर आ रहे हैं और वापस किसी परिस्थिति में समझाईश देने के बावजूद पारिवारिक रूप से रहने में इच्छुक नज़र नहीं आते हैं तो उन्हें जबरदस्ती न्यायालय के चक्कर लगवाकर मूलभूत मानवता के अधिकारों से वंचित नहीं किया जाना चाहिए और उस परिवार की नारी एवं बच्चों की नीतिगत सुरक्षा एवं प्रगति को ध्यान में रखकर निर्णय लेकर अंत कर देना चाहिए। साथ ही साथ अब भारत वर्ष में भी विवाह पूर्व/ शादी के पूर्व कानूनी अनुबंध को मंजूरी देकर उसे दोनों की सहमति माना जाना चाहिए और उस अनुबंध को विवाह के पंजीयन की तरह विवाह के शर्तों के रूप में आवश्यक कर देना चाहिए।

वर्तमान में होने वाले पारिवारिक विवादों के मामले की जाँच की जाए तो लगभग 90% या अधिक मामले बिना सिर-पैर के नज़र आएंगे और मात्र अहंकार या लालच की झूठी लड़ाई नज़र आएगी जो भारतवर्ष के पारिवारिक सामंजस्य को बिगाड़ना शुरू कर दिया है। पुरुष एवं उनके परिवारों को नाहक ही कानूनी प्रताड़ना का दंश सहना पड़ रहा है और अपनी मर्जी से बहुत छोटी बात गंभीर विवाद और पारिवारिक विघटन का कारण बनने लगा है। स्त्रियाँ जो अत्यंत शिक्षित हैं एवं आर्थिक रूप से सक्षम होने की उनकी क्षमता है एवं परिवार बनाने और जीवन भर साथ निभाने में बिना किसी ठोस वजह से असक्षम नज़र आती हैं के लिए पुरुषों को उन्हें जीवनभर आर्थिक सहयोग देने के लिए कानूनी दबाव बनाना अब उचित मानदंड नज़र नहीं आता।

कहने के लिए तो वकीलों का काम है की वह कानून के जानकार हैं इसलिए देश के नागरिकों को उनके खिलाफ हुए किसी अपराध को कानूनी रूप में न्यायालय में पेश कर सकें। पर अक्सर वही कानूनी दलाल बने नज़र आते हैं और सबसे पहले किसी भी कानूनी विवाद में जो कभी हुआ नहीं है उस झूठ को कानूनी भाषा में न्यायालय में प्रस्तुत करते हैं ताकि उनकी दुकान चलती रहे भले ही देश का सम्माननीय नागरिक नर्क का अनुभव करने के लिए मजबूर हो जाये। इस देश के न्यायधीश जो इतने अनुभवी हैं की उन्हें किसी भी वाद, उसके साक्ष्य और परिस्थितियों को देखकर तुरंत समझ आ जाना चाहिए कि कौन सा सच्चा और कौन सा झूठा मामला है और साक्ष्यों एवं तथ्यों का अध्ययन कर निर्णय लेना चाहिए फिर भी अंधों की तरह एकतरफा निर्णय लेते हुए इस देश का न्यायालय नज़र आने लगा है और पारिवारिक विवादों को भी सालों घसीटते रहने का सबसे बड़ा दोषी है।

क्या हम यह मान लें की इस देश में न्याय की अपेक्षा मात्र ताकतवर और पैसे वालों को करना चाहिए और बाकियों को न्यायालय से सारी अपेक्षा ही खत्म कर देनी चाहिए? देर से मिलने वाला न्याय भी किस काम का जब पूरी जिंदगी ही अपराध और कानून की प्रताड़ना में बीत जाए? अगर ऐसा ही चलता रहा तो जो भारतीय समाज की ताकत हुआ करता था उसकी पारिवारिक व्यवस्था वह पूरी की पूरी घुटने में आ जायेगी फिर न समाज बचेगा और न ही देश और न ही देशभक्ति।

क्या यह भी पूंजीपतियों की सोची समझी साजिश है जो भारतीय समाज को अत्यंत कमज़ोर बना देना चाहती है ताकि उन पर आसानी से राज किया जा सके और उनसे बंधुआ मजदूरों की तरह काम करवा सके। अगर अपराधी अपराध करने के बाद स्वच्छन्द खुला घूमते हुए अपराध करता रहेगा, अराजकता फैलाता रहेगा और भ्रष्टाचार कर या अन्य माध्यम से देश की प्रशासन और न्याय व्यवस्था के शह पर तांडव करता रहेगा तो क्या समाज के लोगों का अत्यंत नैतिक पतन नहीं होगा, क्योंकि उन्हें लगने लगेगा कि अपराधी बनने से ही उनकी सुरक्षा और प्रगति संभव है न कि नैतिकवान रहकर। फिर क्या बच जाएगी सामाजिक व्यवस्था और कैसी दुर्गति होगी यह सोचकर ही मेरी रूह काँपने लग जाती है। इन सबके बावजूद हमारे देश का आधार आध्यात्मिकता रही है और पूर्व में भी नैतिक मूल्यों पर समाज निर्माण का प्रयास किया जा चुका है। इसलिए मुझे यह लगता है की अगर प्राथमिक शिक्षा व्यवस्था में नैतिकता की शिक्षा और अनंत में एक होने के आध्यात्मिक योग-साधना के अभ्यास को शिक्षा एवं सामाजिकता में शामिल किया जाए एवं नैतिक लोगों का सम्मान किया जाए एवं प्रशासनिक सेवा एवं राजनीति में नैतिक मूल्यों को आधार मानकर शिक्षित, समझदार एवं सामाजिकता के जानकार लोगों को ही मौका दिया जाए तो देश की व्यवस्था में बदलाव लाया जा सकता है। अन्यथा वही ढर्रा चलता रहेगा और बस कोरी बात कही जाते रहेगी कि हम दुनिया की सबसे प्राचीन और उन्नत सभ्यता हैं जिनके उच्च संस्कार हैं। अगर सामाजिक रूप से नैतिकता एवं कल्याण की भावना समाज से नदारत है तो सारी बातें ढ़कोसला और मिथ्या है और सम्पूर्ण देशवासियों के लिए शर्मनाक बात है। अब यह परिवर्तन जन आंदोलन की बदौलत आएगा या फिर नैतिक शिक्षा की जागरूकता के बदौलत मैं इस विषय को इस देश के समाज के लिए मनन और चिंतन करने के लिए छोड़ देता हूँ क्योंकि मेरे कहने मात्र से कोई बदलाव नहीं आएगा बल्कि समाज के लोगों को इस विषय में मनन चिंतन कर कार्य करना होगा, तभी प्रगतिशील परिवर्तन संभव है अन्यथा नहीं।

आदर्श चंद्राकर