विज्ञान के क्षेत्र में हमारा विकास ज़्यादातर इस पर निर्भर करता है कि विद्युत् चुम्बकीय तरंगों व विद्युत् चुम्बकीय उत्सर्जन में हमारी प्रगति व हमारा ज्ञान कितना है। अतः इस परिवर्तन के कारण हमारे मानवीय एवं विज्ञान दोनों ही क्षेत्र में विकास का अधिक नुकसान होता है। हमें ऐसे परिवर्तन के लिए तैयार रहना चाहिए और यह परिवर्तन निकट भविष्य में होने वाला है।
तुम जानते हो, मानव का अस्तित्व केवल भौतिक शरीर को लेकर, भौतिक संरचना को लेकर नहीं है। वह अनेकानेक तारंगिक दैर्ध्य का समाहार है। इसलिए यदि भौतिक तरंगों में परिवर्तन होता है, यदि मौसम कि हालत में खास कर एक विशाल संरचनागत परिवर्तन होता है, तब निश्चय ही स्नायुकोश और स्नायुतन्तुओं की उत्सारण एवं बोध गम्यता में भी परिवर्तन होगा, तथा विच्छिन्नता आयेगी। परिवर्तन अच्छाई की ओर भी हो सकता है और बुराई की ओर भी, परन्तु परिवर्तन अवश्यम्भावी है।
इस प्रकार के परिवर्तन में चाहे वह भौतिक क्षेत्र में हो या आधिभौतिक क्षेत्र में, आध्यात्मिकता के क्षेत्र में भी परिवर्तन अवश्य होगा। हम आशा करते हैं कि यह जो यात्रा है, मानवीय यात्रा और प्रत्येक जीव की यात्रा, जड़ से चेतन सत्ता की ओर व बर्हिमुखी से अन्तर्मुखी है। अतः मानवों के भावतरंग वर्तमान की अपेक्षा भविष्य में अधिक आध्यात्मिक होंगे। इस विकसित अवस्था में मानव वर्तमान से अधिक आध्यात्मिक मनोभाव वाले होंगे।
भुमा सत्ता / चित्ती शक्ति अपना उत्सारण भौतिक, आधिभौतिक, भौतिकोत्तर एवं आध्यात्मिक स्तर पर कभी बन्द नहीं करते। अणुजीवों में भौतिक परिवर्तन के कारण स्नायु में वैज्ञानिक बदलाव आता है। तब कोश एवं स्नायुतंत्र निश्चय ही वर्तमान की अपेक्षा अन्य तरीके से कार्य करेंगे। वृहत् का भावतरंग/ चित्तिशक्ति का भावतरंग जब एक मानव संरचना में संचारित होगा तब निश्चय ही उस भावतरंग में कुछ आकार व स्वभाव परिवर्तन आयेगा। उम्मीद की जा सकती है कि उस परिस्थिति में अन्तर्मुखी क्षेत्र में मानव की प्रगति वर्तमान कि अपेक्षा ज्यादा गतिशील या त्वरित होगी।
खासकर धरती के भांति छोटे ग्रहों में ध्रुवें अपना स्थान बदलते हैं, तब वह परिवर्तन मनुष्य के लिए लाभकारी हो भी सकता है और नहीं भी हो सकता है, परन्तु यह निश्चित है कि परमपुरुष के भावतरंग बदले हुए परिवेश में अपना कर्तव्य अवश्य करेंगे। मानव अत्यधिक ध्यानी होगा और परमपुरुष/ चित्तिशक्ति को अच्छी तरह और अधिक विज्ञान सम्मत रूप से स्वीकार करेगा।
किसी को यह नहीं सोचना चाहिए कि विश्वब्रह्माण्ड में कोई भी वस्तु अपरिवर्तनशील या स्थायी है। हर वस्तु गतिशील है, निश्चय ही ध्रुवें भी गतिशील हैं और ध्रुवों ने अपना स्थान परिवर्तन करना पहले ही शुरू कर दिया है। तुम देखोगे की उस परिवर्तन के फलस्वरूप विशेषकर यदि परिवर्तन तीव्र गति से हुआ, तब दुसरा हिमयुग इस धरती पर आयेगा। हिमयुग के पहले और बाद कि स्थिति के बीच लम्बा अंतराल होगा, परन्तु हमें मानवीय मनीषा पर पूर्ण आशा एवं विश्वास है कि यदि विनाश निकट आता है तब मानव-मनीषा उस विनाश पर अवश्य ही विजय पायेगी और लोगों को दुसरे ग्रहों में स्थानांतरित करेगी जहाँ समुचित पर्यावरण एवं अच्छा परिस्थितिक व्यवस्था होगा। मानवता बढ़े और मानवता का विकास अधिक से अधिक आध्यात्म उन्मुख हो।
श्री प्रभात रंजन सरकार
(उत्तर-पूर्व भारतीय सभ्यता का इतिहास – 31 मई 1986, कलिकता)
साझा कर्ता: अवधुतिका आनन्द श्वेता आचार्या
