भारतवर्ष में मात्र राजस्थान, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, तेलंगाना एवं मिजोरम में विधानसभा के चुनाव होने जा रहे हैं तथा भारतवर्ष के सम्पूर्ण राजनीतिक परिवेश में भूचाल आया हुआ है। यद्यपि मैं लोकतंत्र के वर्तमान स्वरूप को वास्तविक लोकतंत्र का स्वरूप नहीं मानता हूँ तथापि धरातल पर चल रहे चलचित्र को देखकर आँख मूंदकर नहीं रह सकता हूँ, इसलिए कलम चलाने के लिए मजबूर हूँ। किसी देश की राजनैतिक व्यवस्था में संघीय व्यवस्था, राष्ट्रीय एवं स्थानीय संस्थाओं को समाज के प्रति जिम्मेदारी अहसास कराने का सुन्दर तरीका होता है, जिसमें राष्ट्र एक केंद्रीकृत शक्तिशाली सत्ता होती है जबकि राज्य विकेंद्रीकृत सुदृढ़ आर्थिक व्यवस्था होती है। लेकिन दुर्भाग्य है इस दुनिया का, प्रदेश एवं देश दोनों को राजनीति के हवाले कर देता है। इसलिए एक या एकाधिक राज्यों की राजनीति राष्ट्र में भूचाल ले आती है। आज हम भारतवर्ष के पांच राज्यों की राजनीतिक हलचल एवं जमीनी हकीकत को समझने की कोशिश करेंगे।
राज्यों की राजनीतिक हलचल, केन्द्र की राज्यसभा को प्रत्यक्ष तथा लोकसभा को अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करती है, इसलिए राज्यों के चुनावों को भी अहमियत मिलती है। राज्य एवं राष्ट्रीय सरकार के उत्तरदायित्व में अंतर होता है जबकि राजनैतिक व्यवस्था में समानता दिखाई देती है। केन्द्र का दल राज्य की बागडोर अपने हाथ में रखना चाहते हैं इसलिए केन्द्रीय नेतृत्व राज्यों की राजनीति को अपने हिसाब से चला रहे हैं। जमीनी हकीकत देखे तो राजस्थान, मध्यप्रदेश छत्तीसगढ़ एवं तेलंगाना में क्रमशः अशोक गहलोत, कमलनाथ, भूपेश बघेल तथा के. चन्द्रशेखर राव उर्फ केसीआर से सीधा मुकाबला प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कर रहे हैं। स्थानीय नेतृत्व अस्तित्व हीन बनते देखे जाते हैं। यह केवल इस समय में ही नहीं, इन्दिरा गाँधी के समय में भी देखी गई थी। जब भी केन्द्र में किसी दल की राजनीति मजबूत हुई है, राज्यों में उस दल की राजनैतिक इच्छा शक्ति कमजोर हुई है।
राजस्थान, छत्तीसगढ़ एवं तेलंगाना में जहाँ स्थानीय सरकारों से नरेंद्र मोदी टक्कर ले रहे हैं, वहीँ मध्यप्रदेश में विपक्ष से नरेंद्र मोदी को अग्निपरीक्षा देनी पड़ रही है। मिजोरम में भी मुख्यमंत्री जोरमंथगा, मोदी के साथ मंच साझा करने से इंकार कर रहे हैं। इसे राजनैतिक विश्लेषक भाजपा से दूरी बनाना कह रहे हैं। ऊँट किस करवट बैठेगा यह तो उत्सुकता बनाकर मीडिया अपनी टीआरपी जुटा रहा है। जनता की दुर्बलता यह है कि वह चेहरे देखती है, समस्याओं पर गौर नहीं करती है। लोग जाति एवं सम्प्रदाय के नाम पर अन्न, वस्त्र, आवास, चिकित्सा एवं शिक्षा जैसे मूलभूत समस्या को भी भूल जाते हैं। क्या ऐसी लोकतांत्रिक व्यवस्था समाज का कल्याण कर सकती है? मैं तो कहूँगा कदापि नहीं।
राज्यों की विधानसभा के चुनाव एवं जमीनी हकीकत को एक-एक राज्य के राजनैतिक इतिहास में जाकर समझने की कोशिश करते हैं।
(1) राजस्थान – राजस्थान राज्य की स्थापना 30 मार्च 1949 को हुई थी। तब से लेकर आज तक राजनीति का एक ध्रुव कांग्रेस रहा तथा दूसरा ध्रुव समय के साथ बदल रहा है। यह क्रमशः रजवाड़ों की स्वतंत्र दल, कम्युनिस्ट पार्टी, जनता पार्टी, जनता दल एवं भाजपा रहा है। 1989 के बाद तो भाजपा एवं कांग्रेस ने बारी-बारी से पारी खेली है। इस बार यद्यपि भाजपा की बारी है लेकिन उन्हें अशोक गहलोत की जादुई राजनीति तथा वसुंधरा राजे के राजनैतिक बल से टकरा कर ही राजनैतिक चालें चलनी होगी। शाह मोदी की जोड़ी ने अपनी पहली बैटिंग में आठ सांसदों को विधानसभा की लड़ाई लड़ने भेजा लेकिन स्थानीय भाजपाई नेता ने उन्हें अपना सर्वेसर्वा मानने से आनाकानी की इसलिए वसुंधरा राजे के लिए शाह मोदी को मजबूरन झुकना पड़ रहा है।
(2) मध्यप्रदेश – मध्यप्रदेश की राजनीति में भाजपा को कांग्रेस की ओर तथा कांग्रेस को भाजपा की ओर चुनौती मिलती है। पंचायत राज चुनाव में आम आदमी पार्टी के अच्छे प्रदर्शन के बाद राजनीति गलियारे में कुछ चहलपहल दिखाई दी। लेकिन वर्तमान चुनाव में मोदी जी अपनी सीधी एंट्री कमलनाथ के सामने करने जा रहे थे लेकिन शिवराज सिंह अपना प्रभाव दिखाकर लड़ाई को शिवराज सिंह बनाम कमलनाथ करने में सफल हुए है। मध्यप्रदेश का राजनैतिक इतिहास बताता है कि यहाँ की राजनीति का एक ध्रुव कांग्रेस तथा दूसरा युग के अनुसार बदलता गया। आज यह भाजपा है।
(3) छत्तीसगढ़ – यह भाजपा का गढ़ रहा है। स्थापना के बाद लम्बे समय तक भाजपा ने शासन किया। उसे कांग्रेस की ओर टक्कर मिलती रही है। वर्तमान में कांग्रेस की सरकार है। यहाँ पहले मुख्यमंत्री कांग्रेस के अजीत जोगी हुए थे। वर्तमान में यहाँ कांग्रेस भाजपा के बीच सीधी टक्कर है।
(4) तेलंगाना – यहाँ के. चन्द्रशेखर राव की पार्टी का शासन है, राज्य की स्थापना से लेकर अब तक यही मुख्यमंत्री रहे हैं। केसीआर को स्थानीय दल से सामना करना पड़ता है।
(5) मिजोरम – मिजोरम में मिजोरम की स्थानीय पार्टियों एवं कांग्रेस के बीच सामना होता है। वर्तमान में मिजोरम के सीएम मोदीजी से दूरी बनाने की राह पर है।
