आदिपिता शिव का रहस्यमयी और गौरवमयी इतिहास

शिव लगभग 7000 वर्ष पूर्व आये थे। शिव युग के बहुत बाद में अर्थात लगभग 2500 वर्ष पहले भारत मे बौद्ध धर्म मत और जैन धर्म मत मानने वालों की बाढ़ सी आ गई थी। किंतु जिन दिनों जैन मत को मानने वालों की प्रबलता थी, उन दिनों में भी, धरती के भीतर ही भीतर बनने वाले पानी के झरने की तरह, जनसाधारण के बीच शैव धर्म को मानने वाले भी अच्छी बड़ी संख्या में थे। बंगाल में जब बौद्ध और जैन मतों का प्राबल्य था, तब भी बंगाल के इन मूल निवासियों ने शैव धर्म को नहीं छोड़ा। ऊपरी सतह पर बौद्ध और जैन मत का प्रभाव दिखाई पड़ता था पर आंतरिक सतह पर शैव धर्म ही प्रतिष्ठित था। आज उन लोगों ने पौराणिक धर्म को स्वीकार कर लिया है पर उन दिनों वे लोग पूरी तरह शैव धर्म का ही पालन करते थे।

शैव धर्म के बाद भारत मे बौद्ध मत और जैन मत का आविर्भाव हुआ। बौद्ध मत और जैन मत शक्तिहीन थे, इसलिए कालांतर में उनकी अवनति होती गई। जब जैन मत और बौद्ध मत का पतन हो रहा था साथ ही साथ पौराणिक धर्म का अभ्युत्थान हो रहा था, उस मध्यवर्तीय कालीन अवस्था में, अर्थात बौद्ध धर्म और पौराणिक धर्म ( शैव धर्म से इसका कोई संबंध नहीं था ) के संयोजन से “नाथधर्म” नाम से एक नए मतवाद ने जन्म लिया। इस धर्म के गुरुओं के नाम के अंत मे “नाथ” शब्द रहता था जैसे आदिनाथ, मत्स्येंद्रनाथ, गोरखनाथ इत्यादि। उत्तरप्रदेश, बिहार और बंगाल में नाथ धर्म का व्यापक प्रभाव था। इस नाथ धर्म मे बौद्ध धर्म से बहुत कुछ लिया गया है, तथापि इन्होंने शिव को अपना अधिष्ठाता के रूप में स्वीकार किया किंतु यह न तो शैव धर्म था और न ही शिव द्वारा प्रवर्तित कोई विचारधारा।

अपनी अवनति के समय केवल बौद्ध मत और जैन मत ने ही शिवाचार का सहारा नहीं लिया वरन पौराणिक मतावलंबियों ने भी यही किया। पौराणिक मत की पाँच शाखाएं हैं – शैवाचार, शाक्ताचार, वैष्णवाचार, सौराचार और गणपत्याचार। बौद्ध धर्म के पतन और पौराणिक मत के अभ्युत्थान के समय पश्चिम भारत मे महाराष्ट्र अंचल में गणपत्याचार प्रारंभ हुवा। अर्थात गणपति या गणेश को केंद्र में रखकर एक नया धर्म मत विकसित हुआ। उन्हीं दिनों बंगाल के किसी-किसी भूभाग में शाक्ताचार का उद्भव हुआ जिसमें बलिदान आदि की प्रथा सम्मिलित थी। उन्हीं दिनों दक्षिण भारत मे शैवाचार और वैष्णवाचार दिखलाई दिये। बंगाल में तब तक वैष्णवाचार का आगमन नहीं हुआ था। बाहर से आकर बसे शाकद्वीपी ब्राम्हणों के मध्य सौराचार प्रचलित हुआ। ये लोग ज्योतिष चर्चा करते थे और सूर्य को अपना गृह देवता मानते थे।  साराँश यह है कि बौद्ध और जैन मतों को छोड़कर तत्कालीन समाज ने इस पाँच पंथों को स्वीकार किया।

मध्यवर्तीकालीन युग में बौद्ध मत एवं जैन मत लुप्त हो रहे थे और पौराणिक धर्म के उदय में आपस में मेल-मिलाप हो रहा था। उसी समय पौराणिक धर्म के प्रधान प्रवक्ता शंकराचार्य का आविर्भाव हुआ। शंकराचार्य द्वारा प्रवर्तित पौराणिक धर्म संभवत: जनमानस में ठीक से स्थान नहीं बना पायेगा इसी आशंका से घबराकर, मनोववैज्ञानिक तरीके से यह घोषित किया गया कि शंकराचार्य शिव के अवतार हैं। सच तो ये है कि भारत के जनमानस में शिव के अभूतपूर्व प्रभाव को देखकर ही, शंकराचार्य की बातों को शिव की बातें कहकर प्रचारित किया गया। उन्हें मालूम था कि भारत का जन साधारण, शिव की बातों को बिना किसी तर्क के स्वीकार कर लेगा। इसलिए उन्हें शंकराचार्य को शिव का अवतार घोषित करने की आवश्यकता महसूस हुई। ये घटना आज से लगभग 1300 वर्ष पहले घटी थी जिसमें कि जनभावना का इस्तेमाल कर गुमराह किया गया और यह किसी छल से कम नहीं।

शिव के समय में तंत्र का जो व्यवहारिक स्वरूप सामने आया, उसमें विभिन्न शक्तियाँ तो हैं किंतु देवी-देवता नहीं हैं। देवी-देवता के सम्बंध में विवेचना करते समय और भी पीछे, अर्थात वैदिक युग मे जाना पड़ेगा क्योंकि उस युग मे देवी-देवता थे किंतु उनकी मूर्ति बनाकर पूजा करने की प्रथा नहीं थी। यज्ञादि के द्वारा उन देवी देवताओं की उपासना की जाती थी। इंद्र, अग्नि, वरुण इत्यादि सभी वैदिक देवता हैं। इनकी मूर्ति का निर्माण कर पूजा करने की प्रथा भी नहीं थी। यही कहा जाता था कि उनकी प्रतिमा नहीं है – ईश्वरस्य प्रतिमा नास्ति। प्रतिमा का रूप है प्रतिरूप अर्थात मूल वस्तु जैसी है उसी प्रकार एक और वस्तु को बनाना। इसी कारण कहा गया है की परमपुरुष के समान और कोई भी नहीं है। “तुला वा उपमा कृष्णस्य नास्ति।” अर्थात ईश्वर की प्रतिमा हो ही नहींसकती। ये वैदिक काल की ध्यान धारण थी।

इसके बाद शैव तंत्र का युग आया। शैव तंत्र के युग में विभिन्न प्रकार की कालिका शक्तियाँ थीं किंतु देवी-देवता की मुर्तियाँ बनाकर पूजा करने की प्रथा नहीं थी। उसके बाद आया शिवोत्तर तंत्र – बौद्ध और जैन युग। इसी बौद्ध और जैन युग मे विभिन्न प्रकार के देवी-देवताओं की मूर्ति बनाकर पूजा करने की प्रथा प्रचलित हुई।और इसी समय शिवोत्तर तंत्र आया जो कि वास्तव में शिव के समय के तंत्र की रूपांतरित विचारधारा थी जिसमें बौद्ध और जैन धर्म का प्रभाव शामिल हो गया था, और जिनके प्रभाव के कारण शिवोत्तर तंत्र की देवी-दवताओं की मूर्ति पूजा का प्रचलन प्रारंभ हो गया।

पार्वती शब्द का अर्थ क्या है? आम बोलचाल में या फिर पौराणिक कथाओं में उन्हें पर्वतस्य कन्या अर्थात पर्वत की कन्या कह कर पुकारते हैं। पर्वत की तो मानव रूप में कोई कन्या वैज्ञानिक दृष्टिकोण से संभव नहीं है अतः सही तरीका है कि पर्वत देशस्य कन्या इत्यर्थे पार्वती अर्थात पहाड़ी देश की कन्या। यह जो पार्वती है ये गौरी है अर्थात गौरवर्ण की आर्य कन्या थी। उन दिनों भारत में भारत के प्राचीन निवासी (आष्ट्रिक – मंगोल – नीग्रोइड) और बाहर से आये हुए आर्यों के मध्य अच्छा या प्रेम संबंध नहीं था। आर्यगण, भारत के मूल निवासियों को कभी असुर, कभी दानव, कभी दास और कभी शुद्र कहकर संबोधित किया करते थे।

आर्यों ने यहाँ के मूल निवासियों को अपने समाज में स्थान नहीं दिया था वरन उनकी अवहेलना करते थे। जबकि आष्ट्रिक, मंगोल और नीग्रो इन तीनो के रक्त मिश्रण से जन्मे तत्कालीन भारत के प्राचीन मनुष्यों की अपनी सभ्यता थी, संस्कृति थी। वे भी उन्नत जीव थे, उनका भी तंत्र था और उनका भी चिकित्सा विज्ञान था। बाहर से आये हुवे आर्यों के साथ उनका बहुत लंबे समय तक संघर्ष चलता रहा। गौरी या पार्वती इन्हीं आर्यों के हिमालय निवासी राजा दक्ष की कन्या थीं।

गौरी के साथ शिव का विवाह होने पर, अनेकों ने सोचा था कि आर्य और अनार्य भारत वासियों के मध्य मधुर संपर्क स्थापित होगा। दुख का विषय है कि शिव गौरी के विवाह के उपरांत भी आर्य और अनार्य के संबंध नहीं सुधर सके वरन उनका आपसी संघर्ष और तीव्र हो गया। आर्यगण और गौरी के पिता दक्ष, शिव की निरंतर निंदा करने लगे और अंततः शिव का अपमान करने के लिए उन्होंने शिव वर्जित यज्ञ का आयोजन किया। शिव की निंदा नहीं सह पाने के कारण, उसी यज्ञ स्थल पर पार्वती ने आत्मदाह करके अपने प्राण त्याग दिए।

पार्वती के आत्मदाह के बाद भारत में आर्य और आर्येत्तर मनुष्यों के संबंध मधुर होते गए। आजकल लोग दुर्गा नाम की पौराणिक देवी को मानते हैं, उनसे गौरी या पार्वती का कोई संबंध नहीं है। पार्वती मानव कन्या थीं और उनके दो हाथ थे। पौराणिक युग की यह दुर्गा देवी है उनके साथ शिव या उनके युग का किसी भी प्रकार का कोई संबंध नहीं है।

दुर्गापूजा मुख्य रूप से मार्कण्डेय पुराण पर आधारित है। देवी पुराण, कालिका पुराण, वृहत नंदिकेश्वर पुराण, दुर्गाभक्तिरंगिनी, देवी भागवत जैसे ग्रंथो पर आधारित है। इनमें से कोई भी ग्रंथ 1300-1400 वर्ष से अधिक पुराना नहीं है। उपरोक्त ग्रंथों के चुने हुवे 700 श्लोकों को मिलाकर मार्कण्डेय पुराण की रचना हुई है, उसे ही दुर्गा सप्तशती और उसी को कथ्य भाषा में श्री श्री चण्डी कहा गया। शिव के समय ये सब कुछ नहीं था। शिव के साथ इनका कोई संबंध नहीं है।

शिव की पत्नी गौरी का एक पुत्र था – भैरव। जो तंत्र साधना करता है, उसे भैरव कहा जाता है। शिव की दूसरी पत्नी काली की पुत्री थी भैरवी। तंत्र साधना करने वाली नारी को भैरवी कहा जाता है। तथ्य केवल यह है कि भैरवी ने अपने पिता से साधना सिखा था और वे तंत्र साधना करती थीं। किंतु काली को यह भय सताया करता था कि साधना करते समय उनकी पुत्री कहीं किसी विपत्ति में न फँस जाए। इसलिए एक नीरव रात्रि में वे अपनी पुत्री की खोज खबर लेने गई थीं। उस समय शिव भी वहीं श्मशान में ध्यान मग्न बैठे हुए थे। उस अंधेरी रात में चलते समय काली का पैर शिव पर लग गया। उन्होंने लज्जावश अपनी जीभ काट ली। शिव का ध्यान भंग हो गया। शिव ने पूछा “कस्त्वं”? तुम कौन हो? काली शिव की पत्नी थीं। वे यह तो नहीं कह सकती थीं कि वह भैरवी हैं। पति को पुत्री का नाम लेकर अपना परिचय नहीं दे सकती थीं। इसलिए घबराहट में उस समय उन्होंने अपना परिचय देते हुवे कहा, “कौवेरी अस्मि अहं” – मेरा नाम कौवेरी है। तभी से काली का एक और नाम हो गया। संस्कृत में कौवेरी ही है पर आजकल भूल से कावेरी कहते हैं।

बहुत बाद में अर्थात शिवोत्तर तंत्र में इसी काली शक्ति को भी एक तांत्रिक देवी के रूप में ग्रहण कर लिया गया। बौद्ध तंत्र में भी इन्हें सम्मिलित कर लिया गया। पौराणिक युग में भी ये काली देवी के रूप में पूज्य हो गई। किन्तु शिव की पत्नी काली का इस कालिका शक्ति से कोई संबंध नहीं है। काली शिव की पत्नी थीं – यह लगभग 7000 वर्ष पहले की बात है। जबकि जिस काली देवी को शिवोत्तर तंत्र और बौद्ध तंत्र में स्वीकृति मिली है, वह मात्र 1600 – 1700 वर्ष पहले की घटना है। इनकी पूजा कालिका पुराण पर आधारित है। अर्थात काली देवी का शिव के समय से और वैदिक युग से कोई संबंध नहीं है।

शिव की तीसरी पत्नी पीतवर्णा गंगा थीं। ये मंगोल क्षेत्र के तिब्बत अंचल की कन्या थीं। गौरी का एक पुत्र था भैरव और काली की एक पुत्री थी भैरवी और गंगा का एक पुत्र था कार्तिकेय जिन्हें कार्तिक षणमुखम, षडानन, तमिल में षणमुगम, बाल सुब्रमण्यम और मुरुगन भी कहा जाता है।

पार्वती के पुत्र भैरव धर्मनिष्ठ थे, तंत्र साधक थे। कालिका की पुत्री धर्मनिष्ठा थी और साधिका थी। किंतु गंगा के पुत्र वैसे नहीं थे। इसी कारण गंगा मन ही मन दुखी रहती थी। उनके दुख को भुलाए रखने के लिए शिव उनके साथ अत्यंत मधुर व्यवहार किया करते थे। सभी लोग कहा करते थे कि शिव गौरी या काली से इतना मधुर व्यवहार नहीं करते जितना वे गंगा से करते हैं। मानो शिव ने गंगा को अपने सिर पर चढ़ा रखा है। इसी आधार पर पौराणिक युग मे लोगों ने यह अर्थ निकाल लिया कि शिव ने गंगा को अपनी जटाओं में बांध रखा है। पुराणकारों ने इसी बात को लेकर एक कहानी की रचना कर ली कि स्वर्ग से विष्णु के चरण धोकर जल उतर कर धरती पर आ रहा था, तो शिव ने उसे अपने सिर पर धारण कर लिया – वही जल वास्तव में गंगा जल है। अर्थात शिव की पत्नी गंगा को पुराण के रचियता ने गंगा नदी बना दिया। वस्तुतः गंगा नदी का शिव के साथ कोई संबंध नहीं है।

वैदिक युग से पहले भी, मनुष्य लिंग पूजा किया करते थे। उस युग मे विभिन्न दलों में विभिन्न जनगोष्ठियों के मध्य आपस मे भयानक संघर्ष चला करता था। मनुष्य न तो दिन में सुरक्षित था न रात्रि में। इसलिए सभी दल अपने-अपने दलों की संख्या वृद्धि करना चाहते थे और संख्या वृद्धि के प्रतीक के रूप में वह लिंग पूजा करते थे। यह लिंग पूजा भारत, दक्षिण पूर्व एशिया और मध्य एशिया में अत्यधिक प्रचलित थी। मध्य अमेरिका अर्थात उत्तर अमेरिका के दक्षिण भूभाग, और दक्षिण अमेरिका के उत्तरी अंचल में भी लिंग पूजा का व्यापक प्रचलन था। कुछ लोगों का कहना है कि पहलव, पण्डा, चोल और आंध्र के शैलेन्द्र साम्राज्य के शासन काल मे यह लिंग पूजा अमरीका गई थी। मध्य अमेरिका में जो लोग लिंग पूजा करते थे उन की सभ्यता “माया सभ्यता” के नाम से प्रसिद्ध हुई। इसलिए संस्कृत में अमेरिका को मायाद्वीप कहा जाता है।

प्राचीन काल से मनुष्य लिंग पूजा करता आ रहा है पर इसका कोई आध्यात्मिक या दार्शनिक संबंध नहीं था। जैन युग में, विशेषकर, दिगंबर जैन युग में, तीर्थंकरों की निर्वस्त्र मूर्तियों ने, मनुष्यों के मन में, लिंग पूजा के संबंध में एक नई भावना को जन्म दिया। जैन धर्म और बौद्ध धर्म के साथ-साथ शैव तंत्र का परिवर्तित रूप विद्यमान था, उसे शिवोत्तर तंत्र कहा जा सकता है। उसी युग में जैन मतवाद के प्रभाव में आकर शिवोत्तर तंत्र में भी शिवलिंग की पूजा प्रचलित हो गई। प्राचीन युग की लिंग पूजा मात्र एक सामाजिक संस्कार थी बाद में वही लिंग पूजा ने नई भावना ग्रहण करके दार्शनिक स्वरूप ग्रहण किया। इस परिवर्तन का काल आज से लगभग 2500 वर्ष पूर्व का है। जैन युग में ये जो शिव लिंग पूजा प्रारंभ हुई यह भारतवासियों की नस-नस में समा गई। शिव की पूजा में जो परिवर्तन हुआ उसने शिव के ध्यानमंत्र और बीजमंत्र में भी परिवर्तन ला दिया। यह लिंग पूजा शिव के द्वारा दिये गए तंत्र आधारित आध्यात्मिक निर्देश से पूरी तरह भिन्न है।

आज भारत के विभिन्न हिस्सों में  विशेषकर राढ़ अंचल के  जमीन खोदने पर अनेक बड़े-बड़े शिवलिंग मिलते हैं । सब के सब जैन युग के शिवलिंग हैं। पौराणिक शैवाचार युग में भी शिव लिंग की पूजा निरंतर होती रही । जैन युग के बाइस प्रकार के शिवलिंग हैं जैसे आदिलिंग ,ज्योतिर्लिंग, अनादिलिंग इत्यादि। बौद्ध युग और जैन युग लगभग साथ-साथ चल रहे थे। भगवान महावीर, भगवान बुद्ध से करीब 50 वर्ष बड़े थे। बौद्ध तंत्र में भी शिवलिंग की पूजा को ही अधिक प्रश्रय दिया। शिव का जो ध्यानमंत्र है, उसमें शिवलिंग की पूजा का कहीं भी उल्लेख नहीं है। इसलिए इस बात को याद रखना होगा कि शिवलिंग की पूजा का प्रचलन बहुत बाद में हुआ जो शिव के निर्देशानुसार बिल्कुल नहीं है।

शिव की यह जो विराट जनप्रियता थी, इसी कारण बौद्ध धर्म के युग में भी कोई भी शिव की उपेक्षा नहीं कर सका। थोड़े से अंतर के साथ उस युग में भी शिव की मूर्ति और शिव लिंग की पूजा स्वीकृत हुई। शिव को सम्पूर्ण देवता के रूप में न मानकर, उन्हें बोधिसत्व के रूप में माना गया। अर्थात शिव की जो मूर्ति बनाई जाती, उसके माथे पर बुद्ध की एक छोटी सी मूर्ति को रख दिया जाता। शिवलिंग की पूजा के लिए जो शिवलिंग बनाया जाता, उसके ऊपर भी बुद्ध की एक छोटी सी मूर्ति रख दी जाती। इसका उद्देश्य यह था कि शिव को सम्पूर्ण देवता नहीं दिखाना था, वरन शिव भी बोधिसत्त्व हैं यह  दिखलाना। इन मूर्तियों और शिवलिंग के द्वारा यह दिखलाने का प्रयास किया जाता था कि शिव के आराध्य देवता बुद्ध हैं जो कि उनके माथे पर विराजमान हैं।

उसके बाद पौराणिक शिवाचार और पौराणिक शाक्तचार का युग आया। उस युग में भी शिवलिंग की पूजा होती थी। यह जो पौराणिक शिव हैं उनका जैन और बौद्ध तंत्र के शिव से कोई संबंध नहीं है। अर्थात 7000 वर्ष पुराने प्राणपुरुष शिव, और जैन युग के, बौद्ध युग के, शिवोत्तर तंत्र युग के, व पौराणिक युग के शिव एक नहीं रहे। बीजमंत्र बदलता गया, शिव का स्वरूप भी बदलता गया। बौद्ध युग और पैराणिक युग के बीच में एक और परिवर्तन आया वह था नाथ धर्म का युग। नाथ धर्म के गुरुओं के नाम में “नाथ” शब्द प्रयुक्त होता था, जैसे – आदिनाथ, भीमनाथ, मत्स्येन्द्रनाथ, गोरखनाथ, चौरंगीनाथ इत्यादि। ये सभी नाथ योगी नाथ धर्मी थे। ये ‘नाथ धर्म’ बौद्ध धर्म और पौराणिक शैव धर्म के मिलन का परिणाम था। नाथ धर्म के गुरुओं को शिव का अवतार माना जाता था अर्थात उनकी मृत्यु के उपरांत मंदिर में उनकी मूर्ति की स्थापना करके उन्हें शिव का अवतार मानकर उनकी पूजा की जाती थी। इसलिए उनके गुरुओं के नाम के अंत में जिस तरह “नाथ” शब्द प्रयुक्त होता था, उसी तरह जब वे  लोग शिव की पूजा करते थे तो शिव के नाम के अंत मे भी नाथ शब्द जोड़ दिया करते थे जैसे – तारकनाथ, वैद्यनाथ, विश्वनाथ, अमरनाथ, इत्यादि। ये सभी नाथ योगियों के शिव हैं। सुप्रचीन सदाशिव से इनका कोई संबंध नहीं है। ऐतिहासिक सदाशिव एवं नाथयोगियों के द्वारा प्रचलित शिव के बीच लगभग 5500 वर्षों की दूरी है। पौराणिक युगीन तंत्र का जो शिवाचार और शाक्तचार था, उसमें भी शिव लिंग की पूजा का प्रचलन था। किंतु वह अपने शिव को अलग पहचान देने के लिए, शिव के नाम के अंत मे “ईश्वर” शब्द प्रयुक्त करते थे जैसे तारकेश्वर, रामेश्वर, त्रयंबकेश्वर, इत्यादि। कालांतर में नाथ योगियों के शिव और पौराणिक शिवाचार के शिव आपस में घुल मिल गए।

यही शिव का परिचय है। कहीं नाथ, कहीं ईश्वर, कहीं नाथ योगी, कहीं पौराणिक शैवाचार। इन सभी का बीजमंत्र “हौं” है। अपने जीवनकाल में शिव सभी के अत्यंत निकट हो गए थे। सभी के मन प्राण में बस चुके थे इसलिए उनकी पूजा किसी बीजमंत्र के माध्यम से नहीं होती थी। किंतु बाद में, अर्थात जैन तंत्र, बौद्ध तंत्र और शिवोत्तर तंत्र के युग में, शिव का बीजमंत्र “ऐं” हो गया। अथर्ववेद के समय तंत्र युग भी चल रहा था और अथर्ववेद तंत्र से प्रभावित भी था। ओंकार का विश्लेषण करने पर हम उसमें 50 ध्वनियों का समागम पाते हैं। ये ध्वनियाँ काल शक्ति से उपजी हैं और शाश्वत हैं। अर्थात महाकाल की इन शक्तियों, इन ध्वनियों में काल का प्रवाह के साथ-साथ उत्थान पतन होता रहेगा किंतु ये ध्वनियाँ अनादि काल से लेकर अनंत काल तक विद्यमान रहेंगी। बीज मंत्र के परिवर्तन को देखकर ही यह समझा जा सकता है कि इन सभी शिवों का 7000 वर्ष पुराने ऐतिहासिक शिव से कोई संबंध नहीं है।

इसके उपरांत आते हैं लौकिक शिव। सदाशिव का प्रभाव जनमानस में इतना ज्यादा था कि वह सभी के प्राणों के देवता बन गए। उन्हें पूजने के लिए किसी को खास जाति या वर्ण का होने की जरूरत नहीं थी और न ही किसी बीजमंत्र की उन्हें आवश्यकता थी। वे जनसाधारण, अशिक्षित शुद्र, अशिक्षिता नारी, जिन्हें वेद पढ़ने का अधिकार नहीं था – इन सभी के थे। अन्त्यज शुद्र जिन्हें वेद के मंत्र सुनने का अधिकार नहीं था, जो ओंकार नहीं सुन सकते थे, जो गायत्री मंत्र अर्थात सावित्री ऋक भी नहीं सुन सकते थे। नारी चाहे जितनी भी पढ़ी-लिखी हो उन्हें वेद पढ़ने और सुनने का अधिकार नहीं था। सुविधाभोगी लोग कहा करते थे कि साधना जगत में नारी चाहे जितनी प्रगति कर ले किंतु मृत्योपरांत उसे पुरुष के रूप में जन्म लेना पड़ेगा, तभी उसे मुक्ति-मोक्ष मिलेगा अन्यथा नहीं। शिव ने इस तरह की विचारधारा को छिन्न-भिन्न कर दिया। अपने त्रिशूल के आघात से उनके टुकड़े-टुकड़े कर दिए।

वही शिव समाज के अन्तःस्थल में समा गए। आज जो छोटे-छोटे बच्चे और बालिकाएं मिट्टी का शिवलिंग बनाते हैं, फिर मिट्टी का दिया बनाकर, उसमें थोड़ा सा घी डालकर, रुई की बत्ती बनाकर, उसे प्रज्जवलित कर के शिव की आरती उतारते हैं वह हैं लौकिक शिव। मिट्टी के मनुष्यों के मिट्टी के देवता। इस शिव की पूजा करने के लिए किसी बीजमंत्र की आवश्यकता नहीं, किसी ध्यानमंत्र की अनिवार्यता नहीं, किसी प्रणाममंत्र या आचार्य और पुरोहित का प्रयोजन नहीं। अपनी-अपनी लौकिक भाषा में, इसी शिव को दीर्घकाल से लोग पूजा करते चले आ रहे हैं। सिर झुकाकर “नमः शिवाय नमः” कहते हैं और सोचते हैं – “मेरे आशुतोष इसी से संतुष्ट हो जाएंगे।”

7000 वर्ष बाद भी मनुष्य शिव को भूल नहीं सका है। शिक्षित, अशिक्षित, अन्त्यज शुद्र कोई भी उन्हें नहीं भुला है। ‘शिव’ सरल हृदयता की चरम अभिव्यक्ति के मूर्तरूप थे। शिव की सरलता की अनेक कहानियाँ हैं। शिव ने लोगों को सिखाया है – “साहसी बनो, धर्म के प्रति निष्ठावान रहो, किंतु सरलता का त्याग मत करो। सदैव सीधे रास्ते पर चलो।” शिव सरलता के प्रतीक थे। तभी तो लोगों ने शिव के व्यष्टित्व में देवत्व की पूर्ण महिमा के दर्शन किए थे। मिट्टी के मनुष्य में समस्त ऐश्वर्यों का समावेश देखा था। इसी कारण सभी जाति और सभी वर्ण के विद्वान, अविद्वान और बाकी सभी लोगों ने शिव के चरणों मे समर्पण करते हुए कहा था :-

“निवेदयामि चात्मानं त्वं गति परमेश्वरा।”

[अर्थात – मैं, स्वयं को पूरी तरह तुम्हें समर्पित करता हूँ। तुम ही मेरे अंतिम शरण स्थल हो। तुम ही मेरी जीवन यात्रा का अंतिम पड़ाव हो।]

श्री श्री आनंदमूर्ति

श्रोत: “नमः शिवाय शान्ताय”

संपादक: आदर्श चंद्राकर