जीपीएफएफ को समर्पित
कृषि, वह उद्योग है – जिसमें जीवन, जीवन शैली तथा जीवन के महत्व का उत्पाद होता है। कृषि जगत के लिए उपज यह आत्मिक पहेली, कृषि को समझने का स्वयं में एक दर्शन है। जीवन शब्द का अर्थ किसी सत्ता का प्राणवान होना; धरती, समाज एवं व्यक्ति का प्राणवान होना; खेती की उपज से सटीक समझा जाता है। धरती को फाड़ कर जब कोई बीज पौधा बनकर बाहर आता है। उनके अंदर उपस्थित पोषक तत्व के महत्व को रेखांकित करता है, इसके साथ यह प्रमाणित होता है कि धरती का यह टुकड़ा प्राणवान अर्थात उपजाऊ है तथा यहीँ शुरू होती है खेती की कहानी। खेती की कहानी को बाद में देखेंगे, अब तनिक खेती से समाज के प्राणिन तत्व को खोजते हैं। खेती की शुरुआत से पहले व्यक्ति एकाकी तथा स्वार्थी गुटबाजी का निर्माता था। खेती ने मनुष्य को एक जगह रहना सिखाया तथा उससे समाज अस्तित्व में आया, इसलिए खेती को समाज की प्राण-ज्योति बताने वाले आर्थिक तत्व में स्थापित किया गया है। यही तत्व पुरातन से आधुनिक खेती की कहानी लिखवाएगा। व्यक्ति के प्राण अन्नमय कोष में रहते हैं, जिसके निर्माण एवं विकास में अन्न की जरूरत है। उसे अन्नदात्री खेती ही पुष्ट कर सकती है। खेती के इस गुढ़ रहस्य को समझने के बाद विषय की ओर चलते हैं।
प्रसिद्ध दार्शनिक सुकरात ने लिखा था कि खेती फलती-फूलती है, तो उद्योग-धंधें पनपते हैं, भूमि बंजर छोड़ते ही अर्थव्यवस्था सपाट हो जाती है। सुकरात का यह कथन खेती को उद्योगों की जननी बता है। प्राचीनकाल में राज्य के राजस्व का मुख्य स्रोत ही खेती था, इसलिए खेती के संदर्भ में प्राचीन खेती को रुग्ण कहने की धारण को बदलनी होगी। खेती में कोई तथ्य तो अवश्य था जिसके चलते प्राचीन अर्थव्यवस्था खेती पर आधारित था। सोचने वाली बात तो यह है कि प्राचीन खेती में रसायनिक उर्वरकों का स्थान नहीं होते हुए भी खेती उत्तम कहलाती थी। अतः जैविक खेती की सोच विकसित करना ही खेती का आधुनिक तरीका है।
खेती का रुढ़िवादी एवं पुरातन तरीका किसान की गरीबी का कारण रहा है जिससे किसान आधुनिकता की दौड़ से पीछे रह गया है। जब आधुनिक की बात आ ही गई है तो आधुनिकता की परिभाषा भी समझ लेनी चाहिए। आधुनिकता का अर्थ है “वह जीवन जो मनुष्य के शारीरिक, मानसिक एवं आध्यात्मिक प्रगति को सुनिश्चित करता है।” इसके लिए कृषि के पुरातन कंकाल को फेंक कर प्राचीन कृषि प्राण सत्ता के उपर तकनीकी एवं प्रौद्योगिकी को बिठाना कृषि का आधुनिकीकरण है।
परंपरागत खेती में किसान की सोच पेट भरने तथा जीवन गुजारने तक सीमित थी जबकि आधुनिक खेती की सोच में खेती द्वारा व्यष्टि तथा समष्टि के जीवन मूल्यों में नवीनता लाना है। आधुनिक किसान टाटा, बिड़ला तथा बिल गेट्स से कम नहीं रहें यही खेती के आधुनिकीकरण की सोच है। व्यष्टि एवं समष्टि जीवन मूल्यों की निर्धारणी शक्ति खेती को समझना ही खेती का आधुनिक है।
कृषि का आधुनिकीकरण
कृषि को लाभकारी, कल्याणकारी तथा अर्थव्यवस्था की प्राणशक्ति बनाना ही कृषि का आधुनिकीकरण है।
(१) कृषि को लाभकारी बनाना – कृषि को लाभकारी बनाने के एक मात्र तरीका है कृषि को उद्योग का दर्जा देकर खेती को सहकारिता के आदर्श तरीके से चलाना। सहकारिता का आदर्श तरीका भूधारक, कृषि निवेशकर्ता एवं कृषि कर्ता में लाभांश का समायोजन करने का धरातलीय तरीका है। कृषि लाभांश का अर्थ धनात्मक तथा ऋणात्मक दोनों ही भाग में तीनों जिम्मेदार है। कृषि को लाभकारी बनाने का तरीका यहीं पर नहीं रुकता है। कृषि का यह सहकारी समझौता खेत से उत्पाद पर ही नहीं रहे अपितु खेतों में आने से पहले खाद, बीज, सिचाई, निराई, गुड़ाई तथा जुताई से लेकर बीज का विभिन्न प्रकार के उत्पाद में बदलकर बाजार तक जाने में निहित है। प्रउत की भाषा में कृषि सहायक उद्योग, कृषि उद्योग तथा कृषि आधारित उद्योग तक एक सहकारी व्यवस्था स्थापित करने की प्रक्रिया को आदर्श सहकारिता कहते हैं। खेती यदि मानसून का जुआ है तो उस जुगार के हिस्सेदार कृषि की सम्पूर्ण कड़ी हो। तेज धूप एवं हाड़कापती सर्दी में शरीर को खपाने वाला किसान अकेला ही इस जिम्मेदारी को क्यों उठाएं। कृषि जगत में यह तरीका स्थापित करना ही रुढ़िवादी तरीका था जिसको पुरातन कंकाल कहा गया है। कृषि का लाभकारी तरीका कहता है कि कृषि का कच्चा उत्पाद हो अथवा तैयार उत्पाद हो उसका भाव निर्धारण का अधिकार उत्पादकर्ता के पास रहेगा।
(२) कृषि को कल्याणकारी बनाना – कृषि को लाभकारी बनना एक पूंजीवादी तरीका है, जबकि कृषि का कल्याणकारी बनना समाजवादी तरीका है। चूंकि प्रउत पूंजीवाद एवं समाजवाद का विकल्प है इसलिए लाभकारी बनाकर पूंजीवाद को उत्तर दिया तथा कल्याणकारी बनाकर समाजवाद को उत्तर देता है। कृषि उद्योग लाभ की उत्कंठा से नहीं चलाकर सामाजिक सरोकार के लिए चलाना कल्याणकारी तरीका है। उदाहरणार्थ यदि कपास की खेती में अधिक लाभ होता है लेकिन मक्का उत्पाद से जन सामान्य की भूख शांत होती है तो कृषि कम लाभ का होने पर मक्के के उत्पादन को प्राथमिकता देगा। बचपन में मैंने अपनी माता जी को मक्के के स्थान कपास उत्पादन करने की सलाह दी तो उन्होंने बताया कि हमें केवल हमारे लिए ही नहीं समाज के लिए भी जीना है। इसलिए कपास के साथ मक्के का भी उतना उत्पादन करना है, जिससे हमारा परिवार, हम पर निर्भर परिवार तथा आसपास के भूमिहीन को आपूर्ति कर सकें । इस प्रकार मैंने बचपन में माताश्री से कृषि का कल्याणकारी तरीका सिखा साथ में लाभकारी भी सिखा। मेरे पिताजी किसान नहीं थे वे राजस्व विभाग के कर्मचारी थे इसलिए खेती का काम माताजी के निर्देशन में ही होता था।
(३) कृषि को अर्थव्यवस्था की धुरी बनाना – कृषि का आधुनिकीकरण का तरीका कृषि को अर्थव्यवस्था की धुरी के रूप में स्थापित करना है। जिस प्रकार समाज का मूलाधार शूद्र है, उसी अर्थव्यवस्था का मूलाधार किसान है। जब समाज शूद्र के सर्वांगीण विकास को केन्द्रित कर विकास योजना बनाता है तब उन्नत समाज कहलाता है उसी प्रकार अर्थव्यवस्था भी तभी उन्नत मानी जाएगी जब किसान की क्रयशक्तिअधिक है। अर्थव्यवस्था का केन्द्र कृषि को लेकर सम्पूर्ण व्यवस्था को संगठन किया जाना होता है। यही अर्थव्यवस्था का प्रगतिशील तरीका है। इसको स्थापित किये बिना कृषि का आधुनिकीकरण संभव नहीं है।
कृषि के आधुनिकीकरण को लेकर प्रचलित रुढ़ धारणा
कृषि के आधुनिकीकरण को लेकर आधुनिकी मशीनीकरण, रासायनिक उर्वरक, कीटनाशक का छिडकाव, उन्नत बीजों का चयन तथा अधिक से अधिक फसल लेना माना जाता है। जो कृषि को आधुनिकीकरण नाम देने के का रुढ़ तरीका है। रसायन उर्वरक तथा कीटनाशक रसायन विष है, जिसका प्रभाव मानव तथा पशुओं को भुगतान पड़ता है तो यह आधुनिकीकरण का अंग नहीं है। जैविक खाद एवं जैविक कीटनाशक को उपयोग करना ही आधुनिकीकरण की सोच है। बीजों के चयन में भी जैविक तरीका ही अच्छा एवं सच्चा है। इसि प्रकार यदि मशीनीकरण से बेरोजगारी बढ़ती है तो आधुनिक तरीका नहीं है।
कृषि के आधुनिकीकरण का अर्थ कृषि को उत्तम खेती, मध्यम व्यापार तथा निम्न नौकरी की उक्ति में सटीक स्थापित करना है। कृषि के आधुनिकीकरण की कहानी थोड़ी सी प्राकृतिक खेती की ओर भी ले जाती है। प्रकृति से सीधे मिलने वाले उत्पाद से खेती करना प्राकृतिक खेती की परिधि में रखा गया है, जिसमें पशु से मिलने वाले खाद, बीज को बिना रसायनिक जैविक क्रिया के उपयोग करना, केचुआ का सीधा खेती में उपयोग करना है। यह सस्ती, स्वास्थ्यवर्धक एवं पशुधन की सुरक्षात्मक है। यह भी किसानों के लिए लाभकारी हो सकती है।

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