प्रभात संगीत क्रमांक 5013
एगिये चलो, एगिये चलो
आजीके शुभ विजया
दूर काछे एसो, सबे भालोबाशो
नवालोके चलो नाचिया
आजीके शुभ विजया।
जा छीलो विभेद सब भूले जाओ
मित्रारि सबे काछे टेने नाओ
मनेर मयूरे नभे छेड़े दाओ
रंगीन कलाप मेलीया
आजीके शुभ विजया।
घनान्धकार सोरिया गियाछे
रण हुंकार पुरोनो होएछे
प्रीती झंकार कर्ने कहिछे
सब ग्लानि फेलो मूछिया
आजीके शुभ विजया।
भावार्थ:
आज के इस पावन अवसर पर सभी आगे की ओर बढ़ चलो, आज शुभ विजयादशमी है।
लोगों के बीच में आए दुराव को मिटाकर सब लोग करीब आओ, सभी एक दूसरे के प्रति प्रेम भाव रख नई आलोक में नृत्य करते बढ़ चलो।
सारे गिले–शिकवे भुलाकर मित्रतापूर्ण सभी को करीब खींच लाओ। मन के मयूर को अपने रंग-बिरंगे पंख फैलाये हुए आकाश में छोड़ दो।
घना अँधकार छंट गया है और युद्ध की गर्जना पुरानी हो चुकी है। प्रेम की झंकार कानों में बोलती है कि मन के सभी पश्चाताप मिटा दो।
