अध्यात्म जगत में नारी का स्थान

आनन्द वचनामृतम् (खण्ड-सप्तम)

साप्ताहिक धर्मचक्र में अभिमन्यु सिंह दादा द्वारा स्वाध्याय पाठ, गर्ल्स प्राउटिस्ट फाउंडेशन डे के उपलक्ष्य में।

कुछ दिन पहले मैंने कहा था, अनेकों की भूल धारणा है कि आध्यात्मिक साधना में सिद्धिलाभ करने का केवल पुरुष का ही अधिकार है। नारी साधना से अनेक दूर तक सफलता प्राप्त कर सकती है, किन्तु मोक्ष मुक्ति लाभ नारी प्राप्त नहीं कर सकती है, मोक्ष लाभ करने के लिये, उन्हें पुरुष होकर जन्म ग्रहण करना होगा। मैंने कहा था कि यह बात अयौक्तिक और अविवेकपूर्ण है। कारण पुरुष वर्ग जब परमपुरुष की संतान है, तो नारी भी उन्हीं की सन्तान हैं। पिता क्या चाहेंगे कि उनके लड़के सब तरह की उन्नति करे और लड़कियाँ पीछे रह जायें। वे कभी भी ऐसा नहीं चाहेंगे, नहीं करेंगे। यह बात नहीं है कि माता-पिता सिर्फ लड़कों को ही गोद में लेते हैं, और उनके साथ खेलते हैं, बल्कि लड़कियों के साथ भी वही व्यवहार करते हैं।

कई बार लड़के से लड़कियों के लिये लोगों का ममत्व अधिक होता है, कारण वे लोग सोचते हैं कि “यह और यहाँ कितना दिन रहेगी, यह तो दूसरे के घर चली जायेगी, इसलिए कुछ अधिक ही स्नेह-प्रेम कर लेते हैं,” अथवा लड़के के पास लोगों को आशा रहती है कि लड़का बड़े होने पर उपार्जन करेगा, घर-संसार देखेगा। लड़की से कोई आशा नहीं, तब भी लड़की को अधिक प्यार करते हैं, इसका अर्थ है लड़की के ऊपर अधिक आकर्षण। और परमपुरुष की लड़कियाँ मुक्ति-मोक्ष नहीं पायेंगी और लड़के पायेंगे, यह कैसी युक्ति हुई। बेकार की बात है। तो इन बातों का प्रचार क्यों हुआ था? इसके पहले धर्म अर्थात् तथाकथित रिलिजन थी सुविधावादी लोगों की चीज, Vested interest—लोगों के हाथ में था। जहाँ पर पूँजीवाद था, वहीं पर जीवन के नस-नस में रन्ध्र-रन्ध्र में पूँजीवाद घुस गया था। इसलिए अनन्तकाल तक नारियों पर शोषण किया जाय। इसलिए घोषणा की थी कि नारियाँ मुक्ति मोक्ष नहीं पायेंगी, यह बात सुनने के बाद नारियों के मन में यह भावना जगेगी, कि हमलोग शूद्र हैं, इस तरह एक मनोभाव जगेगा और यह शूद्र मनोभाव जगने के कारण पुरुषलोग इनलोगों को इच्छानुसार दासी बना कर रखेंगे। अर्थात् अधीन रखेंगे, नौकरानी बना कर रखेंगे। यह सुविधा जैसे मिले, इसलिए इस तरह प्रचार किया गया था।

किन्तु, मानव सभ्यता का जब प्रथम उन्मेष हुआ था, उस समय ये सब चीजें नहीं थीं। नारियाँ पूर्ण स्वतंत्र थीं। ऐसे कि एक पुराना बंगला का इतिहास भी देखा जाय तो पायेंगे कि नारी-पुरुष दोनों समान स्वतंत्र थे। पुरुषवर्ग शिकार करते थे और नारियाँ जा कर उन जन्तु-जानवरों को पकड़ कर ले आती थीं। अर्थात् सब काम में समान स्वतंत्रता थी।

किन्तु परवर्ती काल में जब तथाकथित वर्तमान सभ्यता का विकास हुआ, उन्होंने एक चालाकी का मनोभाव पकड़ लिया। शोषण करने का मनोभाव आ गया। उस समय से नारी बन्दिनी हुई। जब पुरुष ने प्रथम धर्माचरण सीखा, उस धर्माचरण आदि के युग में जैसे बड़े-बड़े महर्षियों ने पृथ्वी पर जन्म लिया था, उसी तरह बड़ी-बड़ी महर्षी नारियों ने भी जन्म ली थी। उस समय दोनों का समान अवदान धर्मजगत में था। जैसे हमलोग वशिष्ठ, विश्वामित्र, याज्ञवल्क्य, ऋषियों को पाते हैं, उसी तरह मैत्रेयी, गार्गी, मदालसा इनलोगों को पाते हैं। किसी को कम नहीं पाते हैं; पुरुष, नारी दोनों के समान अवदान ही धर्मजगत में थे।

याज्ञवल्क्यजी-गार्गी के बीच हुआ था ये दार्शनिक संवाद?????? भारत में पुरुषों के साथ ही भारतीय महिला दार्शनिकों तथा साध्वियों की लम्बी परंपरा ...

अति प्राचीन काल में गार्गी का नाम पाते हैं। गार्गी ने राजसभा में, जनकसभा में, सीधा याज्ञवल्क्य के अनेक विषय पर चैलेन्ज किया। गार्गी के प्रश्न का उत्तर याज्ञवल्क्य नहीं दे पाये थे। इस तरह का हाल हुआ कि अन्त में धर्म के वितर्क में, शास्त्रार्थ में शेष पर्यन्त याज्ञवल्क्य असल में हार गये। हार कर बोले “गार्गी तुम रुको। तुम्हारा जीभ गिर जायेगा।” उस अवस्था में गार्गी को बाध्य हो कर मुँह बन्द करना पड़ा था।

गार्गी का हार हुआ था यह बात बोल तो नहीं सकते हैं। अर्थात् याज्ञवल्क्य ने उनकी पदमर्यादा का अपव्यवहार कर गार्गी का मुँह बन्द कर दिया था। अब देखें याज्ञवल्क्य के दो स्त्रियाँ थीं—‘मैत्रेयी’ और ‘कात्यायनी’। एक बार याज्ञवल्क्य अधिक अस्वस्थ हो गये थे। मैत्रेयी और कात्यायनी, दोनों ने ही खूब सेवा-शुश्रुषा की थी।

शुश्रुषा—यह जो कहा—सेवा और शुश्रुषा। शुश्रुषा का क्या अर्थ है? शुश्रुषा सम्पर्क में ‘श्रु’ धातु इच्छार्थे त्रियाम् डिप् अर्थात् सुनने की इच्छा। शुश्रुषा शब्द का असल अर्थ हुआ सुनने की इच्छा। अर्थात् रोगी को पूछना ‘अहो! तुमको क्या कष्ट होता है? कहाँ पर दर्द होती है।’ इसलिए सेवा करने के लिये शुश्रुषा की जरूरत होती है। अर्थात् रोगी की क्या सुविधा-असुविधा जानना जरूरी है। इसलिये सेवा-शुश्रुषा वे दोनों खूब करती थीं।

पुरुष वर्ग में साधारण मनुष्य जैसे हैं, अति साधारण भी हैं, वैसे ही स्त्रियों में साधारण तथा अतिसाधारण भी होती हैं। याज्ञवल्क्य ने स्वस्थ होने के बाद कात्यायनी से पूछा—“तुम क्या चाहती हो?” कात्यायनी बोली “यह साड़ी और ये आभूषण चाहिए।” इस तरह नाना तालिका तैयार कर दी। ये, सब देना होगा। याज्ञवल्क्य ने भिक्षा कर के धीरे-धीरे भिक्षान्न जमा कर साड़ी और गहना सब दिया। अब मैत्रेयी से पूछा, “तुम क्या लोगी? साड़ी लोगी, जेवर लोगी, क्या लोगी बोलो।” मैत्रेयी चुप थी। याज्ञवल्क्य ने पूछा, “यही तो कात्यायनी ने चाहा था—साड़ी, जेवर अनेक कुछ। तुम उसमें से क्या चाहती हो? बोलो।”

याज्ञवल्क्य आणि मैत्रेयी - व्हरांडा क्लब

मैत्रेयी बोली—“‘येनाहं अमृतस्याम् तेनाहं किं कुर्यामि।’ जो चीज सब अस्थायी है वह तो मेरे पास नहीं रहेगी, उसको लेकर मैं क्या करूँगी। जो हमको अमृत में प्रतिष्ठित नहीं करेगी, उसको लेकर मैं क्या करूँगी? आज का यह कीमती साड़ी कुछ दिनों के बाद तो फट जायेगी। आज का यह जेवर कुछ दिनों के बाद उस डिजाइन का, उस पैटर्न का जेवर कोई नारी नहीं पहनेगी। जेवर का पैटर्न तो युग-युग में बदल जायेगा। दादी जी के समय एक तरह का, माँ के युग में एक तरह का, और अभी एक तरह का है। इसलिए कोई भी स्थायी नहीं है।”

स्वामी से उसने कहा—“तुम जो जेवर, कपड़ा, इत्यादि समस्त चीजें देने को बोल रहे हो—रुपया पैसा और सब लेकर मैं क्या करूँगी? कुछ भी मेरे पास नहीं रहेगी। और सब से बड़ी बात है, मैं जब मर जाऊँगी, उस समय ये सब तो पृथ्वी पर छोड़ कर चली जाऊँगी। वह सब लेकर मैं क्या करूँगी।”

उस समय याज्ञवल्क्य बोले—“तब तुम क्या चाहती हो?”

तब मैत्रेयी बोली—“यदि तुमको कुछ देने का मन है, है जो चिरदिन मेरे पास रहे तथा जो चिरदिन मैं उसे पकड़ कर रख सकूँगी, जो हमको अमृतत्व में प्रतिष्ठित करेगा—ऐसी चीज तुम मुझको दे सकते हो तो दो। नहीं तो और कुछ नहीं चाहिए।”

तब याज्ञवल्क्य ने मैत्रेयी को जो सब उपदेश दिया उसकी भीति से राजयोग का अधिकांश अंश तैयार हुआ था। अर्थात जैसे कोई मूर्ख यह बात न कह सके नारियाँ साधना, योग साधना नहीं कर सकती हैं। तुमलोग नारियाँ! ये बातें याद रखोगी कि कोई यदि तुमलोगों को भी (नीच दृष्टि) हेयज्ञान करे, क्षुद्र रूप में देखे तो उसके मुँह पर जवाब दोगी।

रानी मदालसा के उस मनमोहक गीत ने उनके बच्चों को किस प्रकार ज्ञान प्रदान किया?

इसके बाद आती है मदालसा। मदालसा थी तथाकथित राक्षसी। गन्धर्वराज चित्रसेन के साथ शादी हुई थी। मदालसा के साथ राजा की एक शर्त हुई थी, कि लड़के को शिक्षा में दूँगी, राजा नहीं देंगे। मदालसा के मत के अनुसार पुरुष वर्ग से नारियों में धर्म-भाव अधिक होता है, भक्ति अधिक होती है। इसलिए सन्तान को शिक्षा देने की योग्यता पुरुष वर्ग से भी, नारियों में ही अधिक होती हैं। इसलिए तुमलोगों की नारियों के एक संस्था को मैंने कहा था, “प्राथमिक शिक्षा (Primary teacher) नारियाँ ही करें, इसलिए आन्दोलन करो।”

राजा के साथ शर्त हुई कि शिक्षा मदालसा देगी। राजा मान गये। प्रथम सन्तान को शिक्षा मदालसा ने दी। जब वह सन्तान सात आठ साल को हो गया, तो वह योगी बन कर पर्वत में चला गया। दूसरी सन्तान को भी जब मदालसा शिक्षा दे रही थी, तब राजा को क्रोध आ गया कि इसी कुशिक्षा के कारण मेरी सन्तान सब संन्यासी हो जाती है, किन्तु क्या किया जाय, मदालसा विश्व में सर्वश्रेष्ठ सुन्दरी थी और सबसे बड़ी ज्ञानी।

राजा उसके सामने कुछ बोल नहीं सकते थे, भय था, इसके अलावा वह राक्षसी थी—मदालसा। राजा को भय होता था कि हमको मार न डाले। द्वितीय लड़का भी उसी तरह कहीं वह संन्यासी हो गया। अब इतिहास में वे मदालसा के ही लड़के थे, सेवाकर्म धर्मावलम्बी अर्थात् संन्यासी लोग जो सेवाव्रत मे उत्तरे मिशनरी जीवन ग्रहण किया, उसमें मदालसा के लड़के प्रथम थे। इनके आगे संन्यासी थे किन्तु वे लोग साधु का वेश धर कर केवल लड्डू, पुलाव, मालपूवा—इन समस्त की खोज में घूमते रहते, किन्तु मदालसा के लड़कों ने संन्यास लेकर क्या किया? प्रथम मिशनरी जीवन (missionary life), सेवाव्रत में उतरे। चारों तरफ धन्य-धन्य हो गया। सब कहने लगे, “मदालसा के लड़के की तरह योगी नहीं देखे हैं।” मदालसा के पास से शिक्षा पाई है। इसके बाद तृतीय लड़के की भी वही अवस्था। द्वितीय लड़का का भी वही हुआ और तृतीय लड़का भी उसी तरह संन्यासी हुआ। इसके बाद चतुर्थ लड़के को जब मदालसा सुला रही थी—उस समय था, दो तीन मास का, उसे सुलाने का गीत (हिन्दी में लोडी, अंग्रेजी में lullaby कहा जाता है, सुलाती थी)—यह कह कर सुलाती थी

शुद्धोऽसि बुद्धोऽसि निरञ्जनोऽसि।

संसार माया परिवर्जितोऽसि॥

संसार स्वप्नं त्यज मोहिनिद्राम्।

मदालसोल्लापम् उवाच पुत्रम्॥

हे पुत्र! असल में एक छोटे मनुष्य के आधार में रहते हो ठीक ही, किन्तु तुम हो, उस परम चैतन्य की अभिव्यक्ति। तुम शुद्ध हो, तुम नित्य बुद्ध हो, अर्थात् जब तक तुम क्षुद्र शिशु बोलकर चिन्तन करते हो तब तक ही तुम अज्ञ हो। और जब तुम चिन्तन करते हो कि “मैं उस विराट परमपुरुष का अंश हूँ—मैं वह विराट पुरुष हूँ”, तब तुम सर्वज्ञ हो।

‘निरञ्जनोऽसि’—साधारण मनुष्य नाना दोष करते हैं, नाना अपराध करते हैं, पाप करते हैं, उसका छाप, उसके मन पर रह जाता.

है, संस्कार रूप में उस छाप को अंजन कहा जाता है।

अंजन का अर्थ—जो आँख में लगायी जाती है—काजल जैसी चीज। एक दाग—अंजन का अर्थ दाग। तो तुम्हारे ऊपर कोई अंजन तो नहीं है—कोई दाग तो नहीं है। तुम निष्पाप निरंजन हो।

संसार माया परिवर्जितोऽसि—एवं आत्मस्वरूप में तुम संसार माया के ऊपर हो, माया तुम्हारे अधीन है, इसलिए तुम समस्त जागतिक माया के ऊर्ध्व हो।

“संसार स्वप्नं त्यज मोहनिद्राम्।” और यह संसार तुम्हारे पास असल में है क्या? मनुष्य इसी को सत्य कहता है, किन्तु परम तपस्वी के पास यह एक स्वप्न-मात्र है। इसकी वास्तविक स्वीकृति नहीं है। संसार स्वप्नं त्यज मोहनिद्राम्, इसलिए मोहवश जो संसार-स्वप्न को सत्य रूप में देखते चलते हो, वह मोहनिद्रा तुम त्याग करो। हे बालक—हे छोटे शिशु, तुम यह मोहनिद्रा त्याग करो।

मदालसोल्लापम् उवाच पुत्रम्— अपने बच्चे को मदालसा, जब ये बातें कह रही थी राजा उस समय दौड़ कर आये, और रुक नहीं सके। मेरे इस पुत्र को भी खराब कर देगी। तब राजा के साथ मदालसा का झगड़ा शुरू हुआ। उस समय मदालसा बोली—“शर्त थी—शिक्षा मैं दूँगी, तुम वह शर्त भंग करते हो, मैं अब नहीं रहूँगी।” यह कह कर मदालसा निकल गई। बाहर जाकर (कहानी है) उसने गड्ढा में डुबकर शरीर त्याग किया था। जो भी हो।

उस समय राजा ने कहा—इस छोटे लड़के को मैं मन के अनुसार तैयार करूँगा। राजा ने लड़के का नाम क्या रखा? राजा ने स्वयं बुद्धि का परिचय कैसे दिया। लड़के का नाम रखा “अलर्क”। अलर्क का…

अर्थ संस्कृत भाषा में होता है—पगला कुत्ता—तो, वह अलर्क राजा की कुशिक्षा से सब तरह से खराब हो गया। इसके बाद एक देश के राजा ने आकर उस देश को दखल कर लिया—इस प्रकार की समस्त नाना कहानी है। अन्त में अलर्क घर से बाहर निकल गया। अलर्क ने देखा कि वह सब तरफ से हार गया है। राज्य चला गया। उस समय उसके मन में याद आई कि जब उसकी माँ चली गई थी, उस समय उसने एक अंगूठी दी थी और बोली थी कि, यदि तुम चरम विपद में पड़ो तब अंगूठी तोड़ना। इससे तुम उपयुक्त निर्देश पाओगे। अलर्क ने उस समय अंगूठी को तोड़ा और देखा उसके भीतर छोटा कागज है। कागज में लिखा है, सर्व प्रकार की संगति त्याग करोगे। यदि अकेला रह कर सङ्ग त्याग नहीं कर सकते हो, तो सत्सङ्ग करना। द्वितीय उपदेश—सब प्रकार की वासना-कामना त्याग करोगे। एकदम वासना-कामना का त्याग नहीं कर सकते, तब मुक्ति की कामना करोगे। उस समय अलर्क ने ठीक किया यह सब कुछ छोड़कर निकल गया।

विकलांग संत अष्टावक्र की रहस्यमय कहानी। story of deformed sage ashtavakraकौन योगी है कौन संन्यासी है? खोजते-खोजते वह वीरभूम जिला के महर्षि अष्टावक्र थे, तपस्या करते थे—उनके पास पहुँचा। पहुँचने पर उनके पास से उपदेश मांगा। प्रश्न करता था और महर्षि अष्टावक्र उपदेश देते थे। अष्टावक्र के साधनस्थल को वक्रेश्वर कहा जाता है। वीरभूम जिला के पश्चिम अंश में है। अलर्क प्रश्न करता है और अष्टावक्र उत्तर देते हैं। इसकी भित्ति से राजयोग का कुछ अंश तैयार हुआ। जिसका नाम अष्टावक्र संहिता है। इसके बाद घूम-फिर कर उस देश का राजा, जिसने राज्य दखल किया था, उसने फिर अलर्क को बुलाया। कारण था अलर्क की उस समय सारी पृथ्वी पर ख्याति फैल गयी थी, विराट सन्यासी, विराट योगी के रूप में। पहले ही बोल चुका हूँ कि मदालसा के लड़के केवल सन्यासी ही नहीं थे, उन लोगों ने ही प्रथम जन-सेवा शुरू की थी—मिशनरी जीवन के रूप में। राजा ने कहा “अलर्क! तुम आओ अपने सिंहासन पर बैठो।” उसने कहा नहीं, अभी मुझे बहुत काम है, सारी पृथ्वी पर मुझे धर्म का प्रचार करना है, समाज सेवा करना है। राज्य चलाने के लिये अब मेरे पास समय कहाँ। और अलर्क ने राजत्व वापस नहीं लिया।

यह थी ‘मदालसा’ नारी, जो धर्मजगत में पिछड़ी थी, ऐसा कोई प्रमाण अतीत का नहीं है। अर्थात् वे लोग ही आगे थीं। इसके अलावा विभिन्न सामाजिक चित्र, सामाजिक आलेख जहाँ पर पाया जाता है उससे भी देखा जाता है कि नारी किसी काल में भी पीछे नहीं थी। यह एकदम गलत बात है। बुद्ध के युग में भी अनेक महिला थी जो खूब ही आगे थी और वर्तमान युग में कोई महिला पीछे रहेगी ऐसा कोई सुदृढ़ कारण नहीं है। हाँ यह सत्य बात है कि जो अतीत में नारी का अधिकार नाना भाव से नष्ट किया गया था उसका प्रतिविधान होना जरूरी है। हमलोग आनन्दमार्ग में उसका प्रतिविधान करते हैं—समान अधिकार दिया है तथा आशा करता हूँ कि नारियाँ भी अध्यात्म पक्ष में, आध्यात्मिक भावना में पुरुष के साथ में समान गति से आगे बढ़ेंगी। पीछे रहने का कोई सुदृढ़ कारण, मैं खोजने से नहीं पाता हूँ।

श्री श्री आनन्दमूर्ति जी

(कलिकाता, 27/12/78)