क्रोध का तांडव हुआ
हर्ष का भी लैय हुआ
सुप्त ज्वाला भड़क उठी
क्रांति का उदघोश हुआ
समता की पट भूमि में
विषमता सेंध लगायी थी
पूँजी पतियों के अहंकार ने
त्राहिमाम मचाई थी
क्रंदन करते नर नारी
भूखी प्यासी जग सारी
अमानवता के प्रहार से
मन में पीड़ा जागी थी
पूँजीवाद के थपेडों को
जग भूल अभी ना पायी थी
साम्यवाद के अट्ठहास से
कम्पित दुनिया सारी थी
रुपियाह आना तेज़ हुआ
मानवता भी सेष हुआ
दो कौड़ी में बिकता मानव
भौतिकवाद का अभिषेक हुआ
बिखर गया परिवार
अंत हुआ भाईचारे का
अशहिष्णुता, संकीर्णता ने
घर किया मानव मन का
जाग उठा है सम समाज
जाग उठा है जन मानस
जाग उथी है दुनिया जिसकी
पृष्ठ भूमि है गौतम बुद्ध
आया फिर से शिव धरा में
मूर्ती आनंद का धर के
बजा प्रउत का बिगुलधरा में
चतुर दिशा से नभ अम्बर से
अब ना कोई रोक पायेगा सदविप्रों के ज्वार को
उनकी ज्वाला में स्वाह होना होगा कलुषित समाज को
नव्यमानवता वाद की नवबेला में
जग में खुशियां आएँगी
मानव सामज तब एक बनेगा
मन से विषमता जाएगी
Deeptima
दधीचि बोलो न कब बनूंगा?
नेक काम सब कर रहे हैं
मैं बेहतर कब करूंगा?
समाज हित सब जी रहे हैं,
दधीचि बोलो न कब बनूंगा?
है समस्याओं का अम्बार पड़ा।
समाधान को कब रहूंगा खड़ा?
मानव जीवन का सुयोग मिला।
खुशियों का कमल कहां खिला?
सुख दुःख जीवन मरण का फेर
इस राज को समझने इतनी देर?
ईश्वर अंश जब जीव है अविनाशी
समाज बनाने सब जगह हो काशी
जीवन में हो पालन भागवत धर्म
समाज कल्याण हित हो सत्कर्म।
गौतम प्रधान ‘मुसाफ़िर’
रायगढ़ छत्तीसगढ़
दिनांक 23 नवंबर 2024
धूप के साथ बाहर – भीतर होते हैं कपड़े
सारा दिन कभी हरा साग काटना
शाम थोड़ा समय मिला तो मटर छीलने बैठना
कभी बिस्तरों को तहाना
इसी ठंडे-गर्म के बीच अटका रहता है दिन
आखिर एक वक्त तो झुंझलाहट होती ही है।

सर्द हवाएं पैर ठंडे करती हैं
बरतन मांजते उंगलियां अकड़ती हैं
मन तो करता है घर के आदमियों की तरह
आग जला कर घर के बाहर बैठ जाएं
हाथ सेंकते बुला लें राह चलती किसी ठिठुरती हम उम्र को
कि आ जा जिज्जी! बैठ जा ना थोड़ी देर
और बिना जान पहचान बातों की सिगड़ी सुलगा लें
जोर से ठहाका मार कर हंसे किसी बात पर।
सहेलियां बढ़ती जाएं
और महफिल घिर जाए शाम के घने कोहरे की तरह
कोई गर्म चाय आए घर के भीतर से
कि बाहर औरतें बैठी हैं सर्दी में आग जलाकर।
सरसों के खेत पर छाए पीले रंग की बात करें
राजनीति की बात करें
किसी किताब और कविता की बात करें
बात करें यूँ ही सिर्फ अपने मन की
यही कि रात से मन में पीड़ा है सखी री
मन बहुत दुख रहा है
रो लें सुलगते धुएं के बहाने
हँस लें चटखती आग के बहाने।
ना चिंता हो कि गली में बैठी हैं
ना सोच समझकर बोलें कि कोई क्या कहेगा
बस ठहाका हो जो मन हल्का कर दे
एक आँच हो मन की सारी ठिठुरन खोल दे
एक उजाला हो हर औरत का चेहरा दमका दे।
एक अलाव तो औरतों के लिए भी होना चाहिए ना
घर के बाहर
जहाँ वे ठिठुरते हाथ ताप सकें
और पिंघला सके पैरों की बेड़ी।
करोथवाल
