Burnout Syndrome in Women (Hindi)

महिलाओं में बर्न आउट सिन्ड्रोम

शांति सुमन दीदी


कामकाजी महिलाओं में इन दिनों बर्नआउट सिन्ड्रोम की समस्या बढ़ती ही जा रही है। कुछ दिनों पहले एक एजेंसी के द्वारा सर्वे किये जाने पर पता चला कि आधे से ज़्यादा कामकाजी महिलाएं लंबे समय से स्ट्रैस, एंग्ज़ाइटी और डिप्रैशन कि शिकार हैं। सर्वे में शामिल 77% महिलाओं ने बताया कि कभी ना कभी वह बर्नआउट की शिकार हो चुकी हैं।

मनोवैज्ञानीक क्रिस्टीना मैसलैस का कहना है कि जब शारीरिक, मानसिक और भावात्मक रूप से थकान और हताशा महसूस करने लगें तो समझ जाना चाहिए कि बर्न आउट सिन्ड्रोम है।

ऐसे में अपने प्रति तथा दूसरों के प्रति नकारात्मक सोच उत्पन्न होने लगता है। यह अत्यधिक लम्बे समय तक तनाव के कारण होता है। निरंतर मांगों को पूरा करने में लोग खुद को असमर्थ और थका हुआ महसूस करते हैं। डबल्यू.एच.ओ. के मुताबिक लंबे समय तक वर्कप्लेस पर स्ट्रैस की वजह से यह होता है।

कैलिफोर्निया के मनोवैज्ञानिक स्टीफन हिनसाँ कहते हैं कि घर में या ऑफिस में दिन भर दूसरों की केयर करने के फेर में महिलाएं अपनी फीलिंग को सही ढंग से नहीं समझ पाती हैं या दूसरों के साथ शेयर नहीं कर पाती हैं, इसलिए बर्न आउट से पीड़ित हो जाती हैं। क्रिस्टीना मैसलैस कहती हैं कि काम की अधिकता के कारण किसी चीज़ पर नियंत्रण नहीं हो पाता है। दोहरी ज़िम्मेदारी, घर और बाहर, के बावजूद लोगों से सराहना नहीं मिलने के कारण या हर बात में मीनमेख निकालने तथा उलाहना के कारण महिलाएं स्ट्रेस का शिकार बन जाती हैं। उन्हें लगता है कि दिन-रात काम करने के बाद भी लोग उनकी परवाह नहीं करते हैं। ऐसी प्रतिकूल परिस्थिति लंबे अरसों तक रहने के कारण उदासी या नकारात्मक विचारों से वो घिर जाती हैं। जीवन नीरस लगने लगता है। अगर परिजन मनोचिकित्सक के पास नहीं ले जाएं तो आत्महत्या भी कर सकती हैं।

 

बर्न आउट के 12 चरण होते हैं। यह वैज्ञानिक मॉडल “हर्बर्ट फ्रायडेन बर्गर और उनके सहयोगियों” के द्वारा विकसित किया गया था।–

1. अत्यधिक महत्वाकांक्षा– बर्न आउट एक हानि रहित तरीके से शुरू होता है। अपने काम के प्रति उत्साह के साथ कई संवेदनशील प्रकाशकर्ता अपनी महत्वाकांक्षा को सकारात्मक विशेषता के रूप में समझते हैं, तो उनके करियर के विकास को समर्थन करती है। अत्यधिक आंतरिक प्रेरणा आपको दबा सकती है क्योंकि खुद दूसरों के लिए अपनी योग्यता साबित करना मजबूरी में बदल जाती है। अतिरिक्त ज़िम्मेदारियां लेने के कारण तेजी से काम करने की ज़रूरत होती है।

2. अधिक मेहनत करना– यदि ज़्यादा काम करते हैं तो काम निजी ज़िंदगी में घुसना शुरू हो जाता है। जब आपके लगन की प्रशंसा की जाती है तो वास्तव में आपको संतुष्टि का झटका लगता है। साथ ही काम एक लत की तरह लगने लगती है। शाम को काम समाप्त करने में परेशानी होती है।

3. अपनी अपेक्षाओं की उपेक्षा करना– एक संवेदनशील व्यक्ति होने के कारण अपनी ज़रूरत से पहले दूसरों की ज़रूरत को प्राथमिकता देते हैं जिसके कारण भोजन छोड़ते हैं व परिवार और दोस्तों के साथ समय बिताना भूल जाते हैं। अनिद्रा, ध्यान में कमी तथा अन्य कई प्रतिकूल प्रभाव पड़ते हैं। अनियमित निद्रा के कारण स्वास्थ्य पर खराब असर पड़ता है।

4. समस्याओं का विस्थापन– काम पर अधिक ध्यान होने के कारण अपने आसपास हो रहे स्पष्ट संघर्षों और मुद्दों को नज़रंदाज़ करने के लिए प्रेरित होते हैं। अंदर से ऐसा लगता है कि कुछ सही नहीं हो रहा है लेकिन समाधान ढूंढना और बदलाव करना बहुत भारी लगता है। इसलिए अपने चिंताओं के बारे में सोचने से बचना चाहते हैं और अपने पेशेवर कम पर ध्यान केंद्रित करते हैं।

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5. मूल्यों का संशोधन– आपको एहसास होने लगता है कि आप उस चीज़ से भटक गए हैं जो आपके लिए महत्वपूर्ण है। वास्तविकता का सामना करने के बजाय अपना ध्यान काम पर केंद्रित करते हैं। इस क्रम में दोस्त, परिवार, अपना शौक इत्यादि सब पीछे छूट जाते हैं। आपका आत्म मूल्य अपनी उत्पादकता और उपलब्धियों से प्राप्त होता है।

6. कई समस्याओं से इनकार– आप धीरे-धीरे असहिष्णु, असंवेदनशील और सनकी होते जाते हैं। अपने सहकर्मियों को आलसी, ग्राहकों को अधिक मांग करने वाला समझ सकते हैं। आपके खुद का मूल्य बदल गया और दोष दूसरों पर डालते हैं। अपने बदलाव को और काम को समय देते हैं।

7. वापसी– अब आप रिश्तों से अलग हो जाते हैं। आपको यह भी याद नहीं होता है कि आखिरी बार काम के अलावा आपने कौन सी बात की। आपको सामाजिक जीवन छोटा सा और बिना काम का लगने लगता है। आप खुद को अलग-थलग कर लेते हैं।

8. दूसरों पर प्रभाव– आपका बर्न आउट परिवार पर असर डालने लगता है। आप और अधिक चिड़चिड़े हो जाते हैं। भूल करने लगते हैं, जैसे– बच्चों को डे केयर से लाना भूलना, मीटिंग मिस करना आदि।

9. विवैक्तिकरण– आप अपने पुराने स्वरूप को एक खोल की तरह महसूस करते हैं। जहाँ आप एक समय काम के प्रति उत्साह महसूस करते थे वहीं अब अपने काम के प्रति नकारात्मक और उदासीन हो जाते हैं।

10. आंतरिक शून्यता– आप खुद को भी अब मूल्यवान नहीं समझते, बेकार समझने लगते हैं। आपकी इच्छाशक्ति खो जाती है। नौकरी छोड़ने का सोचने लगते हैं। कहीं जाना नहीं चाहते। खुद को शून्य करने के लिए शराब पीना या ज्यादा खाना खाना जैसे अस्वस्थ कारक तरीके अपनाते हैं।

11. अवसाद– अब सब कुछ धुंधला हो जाता है। आप भावात्मक तथा मानसिक रूप से थक चुके होते हैं। अपने को खोया हुआ, अनियमित व अनिश्चित महसूस करते हैं। काम पूरी तरह से अर्थहीन और उद्देश्यहीन लगता है।

12. पूर्ण बर्न आउट– यह स्थिति तब आती है जब आप टूटने की स्थिति में पहुँच जाते हैं या आप मानसिक रूप से टूट जाते हैं। ऐसी स्थिति में चिकित्सा की सहायता लेना आवश्यक हो जाता है। कई पेशेवर को लगता है कि उनके ठीक होने के लिए लंबी छुट्टी लेने की आवश्यकता है।

हम दूसरों को नहीं बदल सकते इसलिए खुद को खुश रखने के लिए कुछ उपाय अपनाना चाहिए–

1. खुद के लिए समय निकालें– हर रोज कम से कम 1 घंटा अपने लिए निकालें। यह वक्त अपनी हॉबी, सौंदर्य निखारने, बिना कुछ किए चुप से बैठने के लिए रिज़र्व कर सकते हैं।

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2. खुद को शांत और स्वस्थ रखने के लिए सुबह का कुछ समय प्राणायाम, मेडिटेशन, योगासन, जॉगिंग और वॉकिंग जैसे स्वास्थ्यवर्धक गतिविधियों के लिए रखना चाहिए। मेडिटेशन तन और मन दोनों के स्वास्थ्य के लिए आवश्यक है। इसके अभाव में ब्लड प्रेशर, डायबिटीज़, हार्ट डिज़ीज़ इत्यादि का शिकार बनना पड़ता है। महिलाएं पर्सनल और प्रोफेशनल ज़िदगी तभी अदब से निभा पाएंगी जब खुद मानसिक और शारीरिक स्तर पर स्वस्थ रहेंगी।

3. ना कहना सीखें– उन्हीं कामों को करें जिनकी आपको ज़िम्मेदारी है। उससे ज़्यादा किसी को खुश करने के लिए नहीं करें। जो व्यक्ति गलत फ़ायदा उठाकर आपको इस्तेमाल करता है, वैसे व्यक्ति को भी विनम्रता के साथ ना कह दें। इससे अनावश्यक बोझ हट जाएगा।

4. परफेक्शन का कीड़ा ना पालें। ऐक्शन 9 टू 5 की लेखिका लेरीना केश कहती है कि 110% काम करने के चक्कर में 9% भी नहीं कर पाते हैं। हर वक्त ईमेल या व्हाट्सऐप पर ध्यान नहीं लगाएं। इसके चक्कर में आपका काम समय से नहीं हो पाएगा और दबाव महसूस होने लगेगा।

5. सब कुछ अकेले ना करें– जिस काम को करने में सहूलियत हो उसी को करें, बाकी काम के लिए सहयोगियों की मदद लें। ऑफिस के काम को एक टीम वर्क की तरह करना चाहिए। आपस में काम बाँट कर करें तो सबका काम आसान हो जाएगा।

मानव जीवन आदर्श मुखी धारा प्रवाह है। जीवन में आदर्श रहना चाहिए और जहाँ गति उस आदर्श की ओर नहीं है, शक्ल इंसान की होते हुए भी वह इंसान नहीं है। दुनिया में आए हैं तो दुनिया की सेवा भी करनी है और आत्मा मोक्षार्थ की भी साधना करनी है। दोनों एक दूसरे पर निर्भरशील हैं। साधक जीवन के कार्य के संबंध में कहा गया है– आत्म मोक्षार्थम् जगत् हिताय च। मनुष्य काम करेंगे और काम के समय हमेशा यह याद रखेंगे कि जो भी कर रहे हैं आत्ममोक्ष और जगत हित के लिए है। जीवन की गति परम लक्ष्य की ओर है।

शांति सुमन दीदी