श्री प्रभात रंजन सरकार की रचना – “प्रभात संगीत”

डॉ. शान्ति सुमन

प्रभात संगीत के सृष्टा आनंद मार्ग के प्रवर्तक श्री प्रभात रंजन सरकार उर्फ़ श्री श्री आनन्दमूर्ति जी हैं। मनुष्य के मन में उठने वाली हर प्रकार के भाव को सुन्दर भाषा और सुर में लयबद्ध कर प्रस्तुत किये हैं। प्रभात संगीत का अर्थ नूतन सवेरा है यानि वैसा संगीत जो जीवन में नई उर्जा संचार कर परमात्मा के करीब पहुँचने में सहायक हो। इसमें भाव, भाषा, छंद, सुर और ताल की प्रधानता है। सूक्ष्म से सूक्ष्मतर की ओर अव्याहत गति जो नन्दन विज्ञान की अवस्था है, में चलते-चलते मनुष्य एक ऐसे मुकाम पर पहुँच जाता है जहाँ अनुभूति, अभिज्ञाता की सुन्दरता का स्वाद लेने की भी स्थिति उनकी नहीं रह जाती है। जीव शिव में मिलकर बूंद से सागर बन जाता है।
Excellent Song Of Lord Shiva - Shiva Songs | Isha Girisha Naresha Paresha |  Shiv Stuti
आज से सात हजार वर्ष पहले भगवान सदाशिव ने सरगम का आविष्कार कर मानव मन के सूक्ष्म अभिव्यक्ति को प्रकट करने का रास्ता खोल दिया। श्री श्री आनन्दमूर्ति जी ने प्रथम प्रभात संगीत जिसका उद्गम स्थल झारखंड राज्य के देवघर में है, 14.9.1982 को प्रातः 4.47 में “बंधु हे निये चलो” ताल कहरवा बांगला भाषा में दिये। यह ज्योतिरगीत है। इस दिन को प्रभात संगीत दिवस के रूप में मनाया जाता है। अन्तिम संगीत “आम्रा गढे नव गुरुकुल” 20.10.1990 को दिये। आठ वर्ष, एक महीना, सात दिन की अवधि में 5018 प्रभात संगीत की रचना किये। यह संगीत प्रभात संगीत घराने का माना जाता है जो आजकल एक नये घराने के रूप में लोकप्रिय हो रहा है। “संगीत” गायन, वादन और नृत्य समूह को कहते हैं। संगीत साधना में तल्लीन साधक प्रभात संगीत रुपी अमृत स्पर्श कर साधना की सफलता आसानी से प्राप्त कर पाएंगे। संगीत और भक्ति दोनों को रहस्यवाद से प्रेरणा मिलती है। जितनी भी सूक्ष्म अभिव्यक्तियां हैं वह संगीत के माध्यम से ही अभिव्यक्त होती हैं। जीवन यात्रा में आध्यात्मिक पगडंडियां प्रभात संगीत के सुर से सुगंधित हैं।

विशेषता:

इसकी विशेषता है कि पश्चिमी और पूर्वी दोनों राग के मधुर शैलियों में लयबद्ध है।

यह छः स्तर में विभक्त है-

1.विरह

2.मिलन

3.आवेदन

4.निवेदन

5.स्तुति

6.विसर्जन।

उन्होंने अनुष्ठान, उत्सव और विभिन्न पर्यायों के गीत दिये हैं। प्रभात संगीत में प्रकृति, ऋतु, लता, गुल्म, धार्मिक अनुष्ठान, उत्सव सभी का वर्णन अति मनोरम ढंग से किया गया है। इसकी विवेचना नव्य-मानवतावाद के आधार पर है। इनकी रचना प्यार, भक्ति, क्रांति और रहस्यवाद पर आधारित है।

इसमें भक्ति प्रधान गीत को कई रूप में दर्शाया गया है उदाहरणार्थ- रागात्मिका भक्ति – 1041, परमात्मा प्रेम – 607, पूर्ण समर्पण – 2300, अभिमान रस – 2005, अनुध्यान – 162, ध्यान – 1956, सखा भाव – 607। प्रभात संगीत को उन्होंने सभी उत्सव और अनुष्ठान के गीत माला से पिरोया है। उत्सव- नववर्ष – 131, वसंतोत्सव – 1683, 3110, आनन्द पूर्णिमा – 503, श्रावणी पूर्णिमा – 4954, जन्मदिन – 132, 133, 134, 135, वैशाखी पूर्णिमा – 4955, विजयोत्सव – 4013, दीपावली – 63, 64, 1637, भ्रातृ द्वितीया – 4473। अनुष्ठान – जात कर्म – 59, विवाह – 58, गृह प्रवेश – 137, नववधू स्वागत – 5659, श्राद्ध – 60, वृक्षारोपण – 136, ध्वज वंदना- 50।

प्रभात संगीत प्रकृति पर्व के गीतों में षडऋतु का अनुपम नैसर्गिक चित्रण किये हैं। वसंत ऋतु के वर्णन में उन्होंने लिखा है कि सारी पृथ्वी सुसज्जित होकर जीवन और जगत दोनों रूप में रस-राग से भर गई है। कई प्रभात संगीत में धान की तुलना सोना से किए हैं। इस प्रकार श्री श्री आनन्दमूर्ति जी ने जीवन के सभी अभिव्यक्ति को मार्मिक शब्दों में चित्रण किया है।

प्रभात संगीत आशावादी गीत है। मन को वह विशिष्ट अवस्था में ले जाती है, जो अतीत के मलिनता को त्यागकर इस दुनिया के सभी व्यक्त-अव्यक्त वस्तु को सकारात्मक रूप में देखने के लिए प्रेरित करती है।

श्री श्री आनन्दमूर्ति जी ने प्रभात संगीत आठ भाषाओं में लिखा है –

1.बंगाली

2.हिन्दी

3.इंगलीश

4.संस्कृत

5.उर्दू

6.मैथिली

7.अंगिका और

8.मगही।

प्रभात संगीत में धैर्य और भक्ति भाव से परमात्मा की ओर चलकर अपने की उनमें समाहित कर देना सिखाया है। परमात्मा से रिश्ता लेन-देन का नहीं समर्पण भाव से है।

उद्देश्य:

मन के अन्धकार को हराकर परमात्मा के प्रकाश से स्वर्णिम बिहान लाकर समाज को आगे की ओर ले जाना ही इसका उद्देश्य है।

डॉ. शान्ति सुमन
समस्तीपुर