– श्री पी. आर. सरकार
अवधुतिका आनन्द श्वेता आचार्या द्वारा संकलित
कुशीनगर
कुशीनगर ऐतिहासिक महत्व की जगह है। यह भारत तिब्बतीय समुदाय के मल्ल राजाओं की राजधानी थी।
मल्ल लोग भारत–तिब्बतीय समुदाय के उप–हिमालयी वर्ग से सम्बन्धित हैं। उन्होंने हिमालयी क्षेत्र एवं मैदान,
मध्य देश या मधेश, शिवालिक पर्वत मालाओं, तिब्बत तथा सिक्किम से गढ़वाल या उदयन तक समूचे
हिमालयी इलाके पर शासन किया था। वर्तमान में, काठमाण्डू उपत्यका में रहने वाले नेवारी लोग प्राचीन मल्लों
के ही वंशज हैं।

शाक्य लोग भी मल्लों के ही वंशज हैं तथा लगभग 560 ई० पूर्व शुद्धोधन उन लोगों के राजा थे। वह एक
धर्म-निष्ठ व्यष्टि थे तथा सदाचारी तरीके से अपनी जीविका चलाते थे। उसी रूप में, उनका गुणवाची नाम
शुद्धोधन हो गया। उनके राज्य में, दक्षिणी छोर पर राप्ती या रापिती नदी थी। चूँकि यह अपने आस-पास की
भूमि पर उर्वर कछारी मिट्टी इकठ्ठा करती थी, इसलिए इसे राप्ति नदी कहा जाता था। बुद्ध इसी समुदाय
में पैदा हुए थे। बुद्ध की मृत्यु यहीं पर हुई थी तथा उनकी जन्म स्थली लुम्बिनी यहाँ से बहुत दूर नहीं है।
बुद्ध एक क्षत्रीय राजकुमार थे जिन्हें ‘कुँमर’ के नाम से भी जाना जाता था।
संस्कृत शब्द ‘मृत’ 2500 वर्ष पूर्व मागधी प्राकृत में ‘मत’ हो गया, अर्ध मागधी प्राकृत में यह ‘मल्ल’ हो गया,
तथा अर्ध मागधी प्राकृत की पुत्री, प्राचीन भोजपुरी में यह ‘मट्ट’ में रूपान्तरित हुआ। आधुनिक भोजपुरी में
यह शब्द लुप्त हो गया है। ‘कुमार’ या ‘राजकुमार’ आधुनिक भोजपुरी में ‘कुँवर’ हो गया। इस प्रकार बुद्ध
भोजपुरी में ‘मट्ट कुँवर’ के नाम से जाने गये, जिसका तात्पर्य है ‘मृत राजकुमार’ । कुशीनगर को क्षेत्रीय
लोगों द्वारा ‘मठ कुँवर’ (माथा कुंवर) के नाम से जाना जाता है।
कुशीनगर काशी राज्य का ही एक अंग था जिसे उत्तरी काशिका राज्य के रूप में जाना जाता था। काशी राज्य
के पूर्व की ओर विदेह था तथा इस राज्य की एक राजकुमारी का नाम ‘वैदेही’ था। विदेह का पौराणिक नाम
मिथिला था। काशी राज्य के पश्चिम की ओर श्रावस्ती या पूर्वी कोशल थे। बुद्ध के समय इसके राजा
प्रसेनजीत थे, जो मगध राजा बिंबसार के साला थे। प्रसेनजीत की बहन कौशल कुमारी बिंबसार की पत्नियों में
से एक थीं। दुनियाँ में सर्वप्रथम गणतन्त्र का निर्माण वैशाली के लिच्छिवियों द्वारा किया गया था, जो
श्रावस्ती का ही एक अंग था। बुद्ध के साथ घनिष्ठ रूप से जुड़े हुए इस क्षेत्र का विस्तृत अध्ययन न केवल
काशी राज्य की सांस्कृतिक विरासत को प्रकट करेगा बल्कि विश्व संस्कृति पर इसके प्रभाव की और भी अच्छी
समझ प्रदान करेगा।

गोरखपुर के चारों ओर, विभिन्न तरह से भाषा विकसित हुई। उदाहरण के लिए, सड़क के लिए संस्कृत में
पर्याय शब्द ‘वतमते’ है तथा मागधी प्राकृत में यह ‘बट्टअ’ हो गया, जो भोजपुरी में ‘बाट’ हो गया। ‘मौजूद’
के लिए संस्कृत शब्द ‘वर्तते’ है, मागधी प्राकृत में यह ‘बट्टवे’ हो गया तथा आधुनिक भोजपुरी में हो गया
‘बाटे’ । संस्कृत में ‘ईटा’ के लिए पर्याय शब्द ‘इष्टक’ है जो मागधी प्राकृत में ‘ईट्टा’ में परिवर्तित हुआ और
आधुनिक भोजपुरी में इसे ‘ईटा’ उच्चारित किया जाता है।
2800 वर्ष पूर्व गोरखपुर के आस-पास प्रयुक्त ईटें लम्बी और पतली थीं। इस आकार की ईटें कुशीनगर में
अभी भी प्राप्त हो सकती हैं। उस समय ईटों की जुड़ाई चूना और शीरा-गुड़ की सहायता से होती थी।
ईस्ट इण्डिया कम्पनी के एक कर्मचारी 24 वर्षीय एक अंग्रेज व्यष्टि मि. प्रिन्सेप ने सर्वप्रथम यह खोजा था
कि पाली या मागधी प्राकृत ब्राह्मलिपि में लिखी जाती थी। जिसे गोरखपुर में लुम्बिनी लिपि के नाम से जाना
जाता है। लुम्बिनी गाँव में प्राप्त लिपि को उन्होंने पढ़ा और ध्यान दिया कि पाली ही ब्राह्मी लिपि में लिखी
जाती थी।
हीनयान और महायान बौद्ध का सम्मिश्रण कुशीनगर में ही हुआ था। बुद्ध की मृत्यु के तीन सौ साल बाद
बौद्ध दर्शन दो शाखाओं में विभक्त हो गया- पहली उत्तरी शाखा को महासांधिक नाम से जाना गया, जिन्हें
प्रायः महायानी बौद्ध कहा गया तथा दूसरी शाखा को पाली या संस्कृत में स्थविरवाद या थेरवादी बौद्ध मत
के दक्षिणी शाखा के रूप में जाना गया, क्योंकि यह दक्षिण और दक्षिण-पूर्व एशिया में प्रभावी था। महासांधिक
या महायानी शास्त्रों में इसे हीनयान के नाम से वर्णित किया गया।
महायान बौद्ध मत एवं शैव मत का सम्मिश्रण ही नाथ धर्म में परिणत हुआ। विश्वास किया जाता है कि
गोरखनाथ शिव के अवतार थे तथा नाथ पन्थ के प्रवर्त्तकों में से एक थे। महायान बौद्धमत भी बाद में वैष्णव
मत के साथ सम्मिश्रित हुआ। आदि शंकराचार्य के तुरन्त बाद, देवी-देवताओं में लोकेश्वर विष्णु सम्मिलित
हुए। गोरखपुर शहर के पूर्वी बहिक्षेत्र पर स्थित विन्ध्वासिनी पार्क में लोकेश्वर विष्णु की प्रतिमा को देख सकते
हैं। पूर्वी भारत में अर्थात् इलाहाबाद के पूर्व की ओर लोकेश्वर विष्णु की प्रतिमा प्राप्त हो सकती है।बोली जाने वाली भाषा है।भोजपुरी भाषा में पढ़ाई एवं शेध तथा साहित्य यहां के लोगों के आर्थिक एवं सांस्कृतिक पुनरुद्धार के लिए अनिवार्य है।यहां एक सांस्कृतिक संग्रहालय होना चाहिए।
वह स्थान जहाँ-जहाँ बुद्ध ने प्रवचन किया था वह सुवर्णवर्षा कहलाए। भोजपुरी में यह सोनवर्षा हो गया। इस
नाम के बहुत से गाँव मगध, काशी और विदेह राज्यों में अर्थात् पूर्वी उत्तर प्रदेश एवं उत्तरी-पश्चिमी बिहार में
पाये जा सकते हैं। वह स्थान जहाँ बुद्ध एक रात रूके थे उसे धराहरा नाम दिया गया था, जिसका तात्पर्य है
उस स्थान का पाप दूर कर दिया गया। कुशीनगर के आस-पास वह सम्पूर्ण क्षेत्र बौद्ध मत का एक केन्द्र था।
इस बौद्ध प्रभाव क्षेत्र के उत्तर-पूर्व की ओर शाक्यारण्य या सारण था तथा पूर्व की ओर चम्पकरण्य या
चम्पारण था।
भोजपुरी भाषा साधारणतः पाली के नाम से ज्ञात–मागधी प्राकृत की पौत्री है। पूर्ववर्ती भाषा का ज्ञान भोजपुरी
भाषा के उचित ज्ञान एवं समझ प्राप्त करने के लिए किसी को योग्य बनायेगा। एक विकसित भाषा के सभी
गुणों से सुशोभित भोजपुरी भाषा एक सम्पूर्ण भाषा है। इसकी चार बोलियाँ हैं- गोरखपुरी बोली उनमें से एक
है। ‘खातिर’ इस बोली में प्रयुक्त होता है। भोजपुरी की बस्तिया बोली अवधी भाषा से प्रभावित है। एक विशाल
क्षेत्र पर फैले करीब 10 करोड़ लोगों द्वारा बोली जाने वाली भोजपुरी भाषा एक पूर्ण विकसित भाषा है। उत्तर
में यह हिमालय से परिवेष्टित है तथा दक्षिण में विन्ध्य पर्वत श्रेणियों से, पश्चिम में प्रयाग से तथा पूर्व में
नारायणी गण्डक एवं सोन नदी से परिवेष्टित है। बंगला, तेलगू, मराठी एवं तमिल के बाद भारत में यह
पाँचवी सर्वाधिक बोली जाने वाली भाषा है। भोजपुरी भाषा में पढ़ाई एवं शोध तथा साहित्य यहाँ के लोगों के
आर्थिक एवं सांस्कृतिक पुनरुद्धार के लिए अनिवार्य हैं। यहाँ एक सांस्कृतिक संग्रहालय होना चाहिए।
. 26 जनवरी ,1984
गोरखपुर –विन्ध्यवासिनी पार्क।

यहाँ मौजूद लोकेश्वर विष्णु की प्रतिमा पौराणिक मत और बौद्ध मत के सम्मिश्रण का संकेत करती है। यह
प्रतिमा उस काल की है जब बौद्ध मत इस क्षेत्र में अपने प्रभाव के अन्तिम चरण में था। प्रतिमा के नीचे एक
दूसरे के ऊपर जो दो कमल के फूल बने हुए हैं- इनमें से उर्ध्व मुखी पंखुड़ियों वाला कमल बौद्ध मत का
द्योतक है। एक साथ मिलकर दोनों पौराणिक मत एवं बौद्धमत के सम्मिश्रण को दर्शाते हैं। विष्णु के सिर
पर उत्कीर्ण बुद्ध की यह छोटी प्रतिमा यही दर्शाती है कि लोगों ने पौराणिक मत के प्रभावाधीन होकर विष्णु
की पूजा को स्वीकार तो कर लिया था पर बुद्ध उनके दिल में नियामक देवता के रूप में बने रहे। बुद्ध के
प्रति अपनी श्रद्धा की वजह से ही उन लोगों ने विष्णु की प्रतिमा के सिर पर बुद्ध की छोटी प्रतिमा को
उत्कीर्ण किया था। लोकेश्वर विष्णु की प्रतिमा केवल पूर्वी-भारत में तथा डेल्टाइ गांगेय घाटी में प्राप्त हो
सकती है। विष्णु की प्रतिमा के ऊपर दोनों ओर ही अप्सराएँ उत्कीर्ण की गयी हैं। बहुत सी जैन प्रतिमाएँ पाँच
फनबाले नाग-देवताओं की बनी रहती हैं। जिस तरह से चीन में ताओ देवी-देवताओं को ड्रेगन के रूप में
निरूपित किया जाता है। नेपाल का महायान बौद्ध मताओ मत एवं नाथ पन्थ का सम्मिश्रण हैं इसे शेर्पा,
भोटिया एवं गुरुग्ङ जैसी जन जातियों द्वारा अनुसरण किया गया।
आम जनता को बौद्ध मत का अनुसरण करने से हतोत्साहित करने के उद्देश्य से गैर बौद्ध राजाओं द्वारा
बौद्ध देवी-देवताओं की प्रतिमाओं को विरूपित किया गया था। राढ़ के राजा शंशाक ने उस समय चारों ओर
मौजूद बौद्ध मत की अधिकांश प्रतिमाओं को विरूपित कर दिया था। शंशाक की मुत्यु के बाद ही बंगाल में
बौद्ध मत फैला। बौद्ध मत में पीनियल ग्रन्थि या चक्र को “नैरात्म देवी” कहा जाता है। कुण्डलिनी का
बीजमन्त्र- ‘हुम’ है। बौद्ध मतावलम्बी लोग “ओम मणि पद्में हुम” का उच्चारण करते हैं। जब कुण्डलिनी
शक्ति ऊपर उठती है तथा सहस्रार चक्र (pineal plexus) में कुण्डलिनी शक्ति के हुम ओंम में मिल जाने
से कोई भी व्यष्टि निर्गुण अवस्था की अनुभूति करता है।
‘मणि त्रिपाठी’ की उपाधि ‘मणि पद्मे हुम’ से व्युत्पन्न हुई थी। इस उपाधि को धारण करने वाले लोग बौद्ध
थे। इस उपाधि को धारण करने वाले ब्राह्मण केवल पूर्वी उत्तर प्रदेश में पाये जाते हैं। बाद में नाथ पन्थ के
प्रभाव के अंतर्गत ‘नाथ’ एवं ‘मणि’ उपाधियों को ब्राह्मणों द्वारा स्वीकार किया गया। गढ़वाल एवं कुमाऊँ को
सम्मिलित करके तत्कालीन नेपाल के जोशी ब्राह्मण लोग मणि त्रिपाठियों के भगिनी विरादरी के थे। ‘नाथ’
एवं ‘मणि’ ब्राह्मणों का गोरखनाथ से निकट सम्बन्ध था। इसी बौद्ध काल के दौरान मणि–त्रिपाठियों ने अपने
बौद्धिक गौरव की पराकाष्ठा को प्राप्त किया था।
जैसा पहले कहा गया है कि नाथपन्थ, शैवमत एवं बौद्धमत का सम्मिश्रण था। आदि नाथ को इसका प्रर्वत्तक
माना जाता है। आदि नाथ परवर्ती नाथ गुरुओं चौरंगी नाथ, मत्स्येन्द्रनाथ एवं गोरखनाथ की तरह ऐतिहासिक
व्यष्टि नहीं थे। कबीर भी नाथ योगी ही थे। परवर्तीकाल में जैसे ही बैष्णव मत ने अपना प्रभाव विस्तार
किया, वैसे ही बौद्ध मत की प्रतिष्ठा में कमी आने लगी। परिणामस्वरूप नाथपन्थ का प्रभाव भी कमते गया।
नाथ पन्थ के अनुयायियों ने ध्यान दिये बिना कि वे हिन्दू थे या मुस्लिम थे, उन्होंने बुनकर का पेशा अपना
लिया। परिणामस्वरूप हिन्दू लोग बुनकर और मुसलमान लोग जुलाहा बन गये।
गोरखनाथ ने नेपाल में अपने पन्थ का प्रचार किया था। पश्चिमी नेपाल में बहुत से लोगों ने उनके पन्थ को
अपना लिया तथा गोरखा या गोरर्वा कहलाये। पृथ्वीनारायण शाह भी एक गोरखा थे। उन्होंने नेपाल का
पश्चिमी मध्य एवं उत्तरी भाग जीत लिया तथा सन् 1763 ई० में गोरखा-राज्य की नींव डाली। गोरखाओं ने
पट्टन, हरगाँव, भट्टगाँव एवं कट्ठगाँव तक अपना शासन स्थापित किया। बाद में कट्ठगाँव को काठमाण्डू के
नाम से जाना गया।
महायानियों की धर्मग्रन्थी भाषा लौकिक संस्कृत थी। जबकि थेरवादियों या हीनयानियों ने अपने धर्मग्रन्थी
भाषा के रूप में मागधी प्राकृत या पाली का प्रयोग जारी रखा। बुद्ध ने अपनी अभिव्यक्ति के माध्यम के रूप
में पाली का ही प्रयोग किया था। भोजपुरी भाषा मागधी प्राकृत या पाली की पौत्री है। इसकी अपनी खुद की
लिपि है जिसे कौशाम्बी की श्री हर्ष लिपि या कुटिला लिपि के नाम से जाना जाता था। कुटिला और नागरी
लिपि के मिश्रण को कायथी लिपि के नाम से जाना जाता था- क्योंकि कायस्थ लोग इस लिपि का व्यवहार
करते थे।
बौद्धमत का आर्य-भारतीय संस्कृति पर धार्मिक-सांस्कृतिक प्रभाव अत्यधिक था। बुद्ध के 400 वर्ष के बाद
इसका प्रभाव तिब्बत में फैला जब गढ़वाल-कुमाउँ के उदयन राजकुमार पद्मसम्भव ने तिब्बत के शक्तिशाली
राजा सृंगेत्सेन गम्पों को बौद्ध मत में दीक्षित किया। सृंगेत्सेन गम्पों ने नेपाल के राजा, अन्शुवर्मन की पुत्री
त्रिकुटि एवं चीन की एक राजकुमारी तेन्जिग से विवाह किया था। इन राजकुमारियों के प्रभाव के
परिणामस्वरूप नेपाल और चीन के प्रत्येक भाग में बौद्ध मत फैला। तभी से तिब्बत ने लगातार चीन, नेपाल
एवं भारत के साथ भी निकट सम्बन्ध बनाए रखा है। बौद्ध मत के प्रभाव के पूर्व तिब्बत ने बोनपा धर्म
अपना रखा था।
28 नवम्बर 1815 ई० को सुगौली सन्धि पर हस्ताक्षर करने के पूर्व गढ़वाल-कुमाऊँ तथा गोरखपुर, देवरिया
एवं बस्ती के कुछ बड़े भू-भाग नेपाल राज के अंग थे। शाक्यों और नेवारों सहित, मल्लों के राजकीय परिवार
के लोग बुद्ध की प्रतिमाओं में प्राप्त टोपी की तरह ही एक विशेष प्रकार की बूटी दार टोपी का प्रयोग करते
थे। इसके अतिरिक्त इनके अधिकांश प्राचीन अवशेष नष्ट हो गये। नेवारी लोग आज भी उच्च शिक्षित हैं।
थारू, गुरुंग, शेरपा, भोटिया, लिम्पो इत्यादि अन्य जन जातियाँ नेपाल में ही रहती हैं तथा ये लोग अपनी खुद
की भारत तिब्बतीय भाषाएँ ही बोलते हैं। थारू लोग यहाँ के मूल निवासी हैं। ये लोग बौद्ध तान्त्रिक थे। अपने
घरों में ये लोग भारत तिब्बतीय समुदाय की अपनी खुद की मातृ भाषा बोलते हैं किन्तु जब ये लोग घरों से
बाहर होते हैं तो भोजपुरी भाषा बोलते हैं। नेपाल और काशीराज के भोजपुरी भाषी लोगों में एक निकट
घनिष्ठता है तथा इनका आर्थिक-सांस्कृतिक भविष्य निकटता से जुड़ा हुआ है।
इतिहास का अध्ययन आम जनता के बीच चेतना उत्पन्न करता है, तब उनका इतिहास उन्हें उनके गौरवशाली
सांस्कृतिक विरासत के प्रति जानकार बनाता है। काशीराज्य की सांस्कृतिक विरासत बहुत गौरवशाली थी।
काशीराज में गोरखपुर या किसी अन्य स्थान पर एक सांस्कृतिक पुरातात्त्विक संग्रहालय स्थापित होना चाहिए,
जिससे इस क्षेत्र के लोग अपनी समृद्ध विरासत का मूल्यांकन एवं महत्व समझ सकें।
नेपाल के कुछ ब्राह्मण और नेवारी परिवारों के घरों में पाली एवं संस्कृत में पाण्डुलिपियाँ अधिक पठनीयता
युक्त प्राप्त हो सकती हैं। मूल संस्कृत पाण्डुलिपि तिब्बती, चीनी एवं लद्दाखी भाषाओं में अनुदित हुई थीं,
किन्तु यह पाण्डुलिपि अब भारत में अप्राप्त है। इसके अतिरिक्त इसका रूपान्तरण अब भी तिब्बती, चीनी एवं
लद्दाखी भाषाओं में उपलब्ध है। कर्जन एवं कुन्निग्हम् जैसे कुछ अँग्रेजों ने सर्वप्रथम भारत की ऐतिहासिक
निधि को अनावृत करने का कुछ प्रयास किया था। इसके लिए भारतीय जनता को उनका आभारी रहना
चाहिए।
एक समृद्ध इतिहास के साथ इस क्षेत्र में प्रचण्ड आर्थिक एवं कृषीय क्षमता है। राप्ती नदी में जल विद्युत की
प्रचुर क्षमता है। इसके अलावा, इसके आस-पास के गाँव देहात की भूमि बागवानी के लिए सब तरह से अच्छी
है यथा आम के बगीचे बहुत अच्छी तरह से उगाये जा सकते हैं।
..गोरखपुर 27 जनवरी 1984
गोरखनाथ मन्दिर:

नाथ पन्थ, बौद्ध मत एवं शैव मत का सम्मिश्रण है। इसके प्रवर्तक मत्स्येन्द्रनाथ बंगाली राजकुमार थे।
गोरखनाथ का जन्म स्थान अभी तक अप्रमाणित है। किन्तु यह सुप्रसिद्ध है कि वे भोजपुरी भाषी क्षेत्र में ही
कहीं पैदा हुए थे। यह बात र्निविवादित रूप से सत्य है। आम तौर से यह विश्वास किया गया कि गोरखनाथ
शिव के अवतार थे। यह शैव मत के प्रभाव को बताता है।
आदि शंकराचार्य के बाद पौराणिक धर्म मत प्रचलित हुआ तब शिव पौराणिक देवता के रूप में स्वीकृत हुए थे।
गोरखपुर के आस-पास भोजपुरी और संस्कृत दोनों ही भाषाओं में तान्त्रिक साहित्य प्राप्त हो सकता है। नाथ
योगी लोग द्वारा प्राचीन भोजपुरी ताड़ पत्रों पर लिखित तान्त्रिक साहित्य अभी भी इस क्षेत्र में प्राप्त हो
सकता है। नाथ योगी जनगीत और कहावतें पुरानी भोजपुरी में गाया करते थे।
नाथ मन्दिरों के पुरोहितों की जाति पहचान पौराणिक प्रभाव पर निर्भर है। जहाँ-जहाँ पौराणिक मत का प्राबल्य
था वहाँ के पुरोहित ब्राह्मण होते थे। किन्तु जहाँ यह प्रभावी नहीं था वहाँ किसी जाति का कोई व्यष्टि पुरोहित
हो सकता था। जोशी लोग बौद्ध पुरोहित थे तथा बाद में उन्हें ब्राह्मणों का दर्जा दिया गया था। जोशी लोग
गोरे रंग तथा औसत ऊँचाई के होते हैं। नाथ पन्थ बौद्ध मत का रूपान्तरित रूप होकर उसका उपांग बन कर
आगे बढ़ा। इसके अलावा गोरखनाथ और मस्त्येन्द्रनाथ के बीच वैचारिक विरोध भी था। मत्स्येन्द्रनाथ ने
नेपाल में नाथ पन्थ का प्रचार किया और बाद में कामरूप चले गये। गोरखनाथ नेपाल गये और वहाँ रहने
वाले भारत-तिब्बतीय जन-जातियों के बीच एक नया गोरखपन्थी समुदाय तैयार किया। काशी से लेकर असम
तक के विस्तृत क्षेत्र पर नाथ पन्थ के केन्द्र फैले हुए थे। बिहार के भागलपुर में नाथनगर कसबा नाथ पन्थ
के सर्वाधिक शक्तिशाली केन्द्रो में एक था। नाथ प्रत्यय युक्त बहुत से गाँव इस क्षेत्र में पाये जा सकते हैं।
इस धर्ममत के अनुयायियों ने नाथ या देवनाथ पदवी अपनाया था। हालाँकि कुछ नाथ अनुयायी लोग
सामाजिक रूप से बहिष्कृत हुए थे। काशी राज्य में जाति चेतना उतनी शक्तिशाली नहीं थी। कायस्थों के बीच
‘मुंशी’ पदवी वाले लोग नाथ समर्थक थे तथा ‘अखौरी’ पद्दी वाले लोग शैव समर्थक थे।
भर्तृहरि एक शक्तिशाली राजा थे तथा एक महान नाथ योगी थे। उन्होंने भोजपुरी में बहुत से गीतों की रचना
की थी जिससे 800 से 900 वर्ष पूर्व एक समृद्ध भोजपुरी साहित्य को नाथ पन्थ के मठों में प्राप्त पत्रों से
भी एकत्रित किया जा सकता है। गोरखनाथ और भर्तृहरि के दोहे एवं उक्तियाँ भोजपुरी साहित्य के मूल्यवान
स्रोत हैं। इन्हें एकत्रित और मुद्रित किया जाना चाहिए तथा यही पर्याप्त प्रमाण होगा कि भोजपुरी एक पूर्ण
विकसित भाषा है सिर्फ एक बोली नहीं। भोजपुरी भाषा लगभग 1200 वर्ष या उससे अधिक वर्ष पुरानी है।
… गोरखपुर 28 जनवरी 1984
भोजपुरी एक अत्यन्त विकसित भाषा है। इसकी चार बोलियाँ हैं खड़ी, चम्पारणी, डुमरावीं और काशिका।
डुमरावीं बोली को मानक भोजपुरी के रूप में स्वीकृत किया जाना चाहिए।
गोरखपुर जब काशीराज्य में शामिल हुआ तब भोजदेव इसके सर्वाधिक प्रसिद्ध राजाओं में एक थे। वे ब्राह्मण
थे तथा बहुत बड़े विद्वान थे। उन्होंने सांख्य दर्शन पर जो टीका लिखा था, वह उनके पाण्डित्य के प्रमाण
स्वरूप व्यापक रूप से स्वीकृत हुआ। इसमें कुछ ब्राह्मण लोग इतने इर्ष्यालु हो गये कि उनके खिलाफ
आन्दोलन शुरू कर दिया। जिसके कारण दो समूह उभर कर सामने आए – कट्टर समर्थक और कटु विरोधी।
जिन लोगों ने भोज का समर्थन किया था उन लोगों को उनकी जाति से बहिष्कृत कर दिया गया था। उन
लोगों ने ‘राई’ पदवी अपना लिया। ‘राइ’ संस्कृत शब्द ‘राजा’ से व्युत्पन्न है। मागधी प्राकृत में यह ‘राय’ हो
गया तथा अर्ध मागधी प्राकृत में यह ‘राई’ हो गया। यद्यपि कुछ लोग ‘राई’ कहते हैं जैसा कि रघुराई में है।
‘राई’ भूमिहारों के एक समूह की भी पदवी है। दो हजार साल पहले कोई भूमिहार लोग नहीं थे। किन्तु आज वे
लोग सभी ब्राह्मण पदवीयाँ जैसे पाण्डेय, दुबे, तिवारी आदि का प्रयोग करते हैं। राजा भोज की पत्नी भानुमती
एक तान्त्रिक थी। उन्होंने एक तरह का जादू, जादूगरी या बाजीगरी शुरू किया था। ‘बाजीगर’ पहले एक
संस्कृत शब्द था जो ‘बाजीकर’ शब्द से विकसित हुआ। ‘कार’ एक फारसी प्रत्यय है जैसा कि कारखाना,
कारीगर और बेकार शब्दों में प्रयुक्त हुआ है। ‘भोजवाजी’ और ‘भानुमती का पिटारा’ जैसे शब्द भोजपुर की
स्पृहणीय रानी भानुमती के कारण प्रसिद्ध हुए।
बाद में राजा भोज ने काशी त्याग करके बिहार के भोजपुर जिला में स्थित एक स्थान पर खुद को
सुव्यवस्थित किया। उन्होंने काशी जैसे प्रसिद्ध आध्यात्मिक-सांस्कृतिक स्थान से अपनी राजधानी को हटा लेने
का निर्णय किया, क्योंकि उन दिनों काशी में बहुत से लोग दूर-दूर से हमेशा आया करते थे।
1200 वर्ष पूर्व प्रयाग में ब्राह्मणों की एक सभा हुई थी, जो अब इलाहाबाद के नाम से अधिक परिचित है।
इस सम्मेलन में ब्राह्मणों के दो वर्ग उभर कर सामने आए जिनमें एक काशी से तथा दूसरा कोशल से
सम्बन्धित थे। इन दोनों वर्गों से मिला कर एक तीसरा वर्ग भी बना जिसे कान्यकुब्ज वर्ग से जाना गया। इस
सम्मेलन में गौड़ीय ब्राह्मणों के (उत्तर भारतीय) पाँच भाग स्वीकृत हुए तथा द्रविड़ (दक्षिण भारतीय) ब्राह्मणों
के भी पाँच भाग स्वीकृत हुए। गौड़ीय ब्राह्मणों के पाँच भाग थे-
1. कश्मीर एवं पंजाब के सारस्वत ब्राह्मण
2. पश्चिमी एवं पूर्वी उत्तर प्रदेश के कान्यकुब्ज ब्राह्मण
3. राजस्थान और दक्षिण पंजाब के गौड़ ब्राह्मण
4. मिथिला के मैथिल ब्राह्मण
5. गुजरात के नागर ब्राह्मण (जिन लोगों ने नागर लिपि अविष्कृत किया था)
द्रविड़ ब्राह्मणों के पांच भाग थे।
हालाँकि, ब्राह्मणों के ये उत्तरी और दक्षिणी वर्गों के बीच विवाह निषिद्ध था, फिर भी, यही दस वर्ग ही
स्वीकृत ब्राह्मण माने गये। बुद्ध के समय इस तरह का कोई पृथक्करण नहीं था एवं बुआ के बच्चों के बीच
शादियाँ स्वीकृत थीं। सिद्धार्थ पत्नी, यशोधरा उनकी ममेरी बहन ही थी। इस तरह के विवाह प्रयाग सम्मेलन
से निषिद्ध हुए थे।
क्रमशः
– श्री पी. आर. सरकार
अवधुतिका आनन्द श्वेता आचार्या द्वारा संकलित
