प्रउत की शिक्षा नीति

राजेंद्र प्रसाद

 (1) सा विद्या या विमुक्तये

(2) समान, निःशुल्क अनिवार्य एवं सुलभ शिक्षा

(3) नैतिक एवं आध्यात्मिक मूल्यों के समावेश युक्त अत्याधुनिक शिक्षा

(4) शिक्षा के संचालन का भार शिक्षाविदों के हाथ में होना

(5) रोजगार मूलक शिक्षा

(6) शिक्षार्थी में वैश्विक चिन्तन एवं नव्यमानवतावादी सोच का विकास करना

(7) मातृ‌भाषा में शिक्षा तथा अधिक से भाषाओ के सिखने का अवसर हो ।

(8) शिक्षक के चयन में नैतिक मापदंड की अनिवार्यता

(9) शिक्षा में अभिभावकों की भागीदारी स्वीकार करता है ।

(10) शिक्षा में समाज एवं सरकार की भी जिम्मेदारी स्वीकार करता है ।

(11) आनन्ददायी शिक्षा

(12) प्रगतिशील परीक्षा प्रणाली

(13) समग्र व्यक्तित्व (शारीरीक मानसिक एवं आध्यात्मिक) का विकास ।

 

प्रउत के शिक्षा नीति को विस्तार से समझेंगे .

 “प्रउत की शिक्षा नीति”

 (1) शिक्षा सम्बन्धी नीति निर्धारण का अधिकार :-

शिक्षा व्यवस्था की नीति का निर्धारण का अधिकार शिक्षकों को होना चाहिए न कि राजनैतिक वृत्ति से परिचालित व्यक्तियों के हाथ में । लेकिन शिक्षा-व्यवस्था की नीति के निर्धारण का अधिकार शिक्षकों को नहीं है । शिक्षा नीति का निर्धारण करते हैं वे जो साधारणत: राजनैतिक वृत्ति से परिचालित होते हैं । ऐसा भी होता है कि उनमें से अनेक लोगों को शिक्षा के विषय में लेशमात्र भी अभिज्ञता नहीं रहती । इसलिए यदि शिक्षकों को आदर्श मनुष्य बनाने के लिए कुछ भी उत्तरदायी समझता है तो शिक्षादान के यन्त्र के रूप में उनका व्यवहार न कर उन्हें शिक्षा व्यवस्था का प्रणेता होने का अधिकार भी देना पड़ेगा । राजशक्ति उनके सामने अपनी सामयिक या राष्ट्रीय आवश्यकताऐं रख सकती हैं पर उन्हें ग्रहण करना या न करना शिक्षकों की स्वतन्त्र इच्छा पर ही छोड़ देना चाहिए । विद्यालयों के अधिकार क्षेत्र में किसी अशिक्षक (राजनीतिज्ञ) को शिक्षा सम्बन्धी विषयों में नाक घुसेड़ने का अधिकार नहीं दिया जा सकता । यह हुआ शिक्षा सम्बन्धी नीति निर्धारण के अधिकार के विषय में ।

 

(2) शिक्षा के उत्तरदायित्व का भार शिक्षक, माता-पिता एवं समाज पर :-

अभिभावक प्राय: कहा करते हैं कि आजकल शिक्षक कुछ सिखाते पढ़ाते नहीं । इसे सुविचार पूर्ण नहीं कहा जा
सकता । वस्तुत: ग्रह अपना उत्तरदायित्व टालने का बहाना भर है । साथ ही, यह भी कहना पड़ेगा कि शिक्षक भी अधिकतर अपना व्यक्तिगत स्वार्थ पूरा करने की जितनी कोशिश करते देखे जाते हैं उनके व्यवहार एवं विचार में सामाजिक कर्त्तव्य पालन का उतना ही कम परिचय मिलता है । जिस तरह अशिक्षित या अर्द्धशिक्षित अभिभावक अपने बच्चों को गाली देकर मारते हैं, अनेक बार शिक्षकों का व्यवहार उनसे भी गया बीता होता है । बहुत से शिक्षक आज भी केवल डर धमका कर पढ़ाते हैं । ज्ञानार्जन, सामाजिक जीवन के लिए संयम एवं मिलित प्रयास के लिए आवश्यक शिक्षा तो शिक्षकों को ही देनी है । तब नैतिकता तथा शिक्षा के उत्तरदायित्व का अधिकांश भार माता पिता को ही लेना होगा । सधार्मिक तथा नीति – विरोधी माता पिता की सन्तान को सद्बुद्धि सम्पन्न नागरिक बनाने का उत्तरदायित्व समूचे समाज को लेना होगा । शिक्षक निर्वाचन में सतर्कता बरतनी होगी ।

 

(3) शिक्षक को कैसा होना चाहिए ? –

उपयुक्त शैक्षणिक डिप्लोमा या डिग्री रहने से ही किसी को शिक्षक बनने का अधिकार नहीं हो जाता । उनमें, चारित्रिक दृढ़ता, धर्मनिष्ठा, समाज सेवा, निःस्वार्थभाव, व्यक्तित्व एवं नेतृत्व का गुण होना चाहिए । शिक्षक हैं – समाज गुरू । इसलिए जिस किसी को भी शिक्षक के रूप में मान लेना किसी प्रकार योग्य नहीं । शिक्षक के पद की गरिमा जितनी अधिक है उनकी योग्यता का मापदण्ड भी उतने ही ऊंचे स्तर का होना चाहिए । शिक्षकों का वेतन सुनिर्धारित होना चाहिए तभी उनसे समाज के प्रति जागरूक रहने की आशा की जा सकती है । शिक्षक का आचरण, नैतिक चरित्र और व्यवहार उत्तम कोटि का होना चाहिए ।

शिक्षकों को आपस में दलबन्दी या गुटबन्दी से दूर रहना होगा । शिक्षक को दलगत राजनीति से दूर रहना चाहिए । छात्रों में अनुशासन का भाव लाने के लिए शिक्षा व्यवस्था या अभिभावकों के आचरण की भी उपेक्षा नहीं की जा सकती । शिशु को दुनियां के सामने परिचित कराने का प्राथमिक उत्तरदायित्व उसके माँ बाप या अभिभावक के ऊपर है । परिवार सामाजिक जीवन की प्रथम पाठशाला है जहाँ बच्चा का व्यक्तित्व एवं भविष्य निखरता है ।

 

शिक्षक को कैसा होना चाहिए ? (TEACHER’S Control) :

T = Trained (प्रशिक्षित); E = Educated (शिक्षित); A = Active (फुर्तीला, सक्रिय); C = Character (चरित्रवान); H = Honest (इमानदार); E = Experience (अनुभवी, विषय का जानकार ), R= Regularity (नियमितता – समय पर काम करने वाला) – ये सभी एक शिक्षक के आवश्यक गुण हैं ।

 

(4) शिक्षा नीति कैसी होनी चाहिए ? शिक्षा का दिशा-निर्देश क्या होना चाहिए ? (Education- Guidelines) :-

कहा गया है- “सा विद्या या विमुक्तयें”- विद्या वही है जो विमुक्त कर दे ।” शिक्षा (EDUCATION) का निर्देश (Guidelines) निम्नलिखित होना चाहिए E = Expansion of mind (मनका विस्तार) – I am one with all. (feeling of oneness)

D = DESMEP.

D = Discipline (अनुशासन)

E = Etiquette (शिष्टाचार)

S= Smartness (चुस्त दुरुस्त सुडौल)

M = Morality (नैतिकता)

E = English (अंग्रेजी का ज्ञान)

P = Pronounciation (उच्चारण विधि)

U = Universal outlook (सार्वभौम दृष्टिकोण)

C = Character building (मजबूत चरित्र निर्माण)

A = Active habits (सक्रिय आदतें, कठिन परिश्रम, आलस्य से दूर)

T = Trustworthiness (विश्वास या भरोसा करने योग्य, उत्तरदायित्व बोध)

I = Ideation of supreme (पारमारिमक भाव ग्रहण)

O = Omniscient grace (सर्वग्राहीता, कृपा)

N = Nice temperament (सुन्दर शान्त स्वभाव)

 

(5) शिक्षा में भाषा नीति :-

 

पहले दो भाषाओं के माध्यम से ही छात्र यदि ज्ञानार्जन करें या ज्ञान की भूख जगा सके तो बाद में अन्य भाषाओं को भी वह सीख सकता है । एक छात्र के सर पर अनेक भाषाओं का बोझ लाद देने से वह ज्ञानार्जन करेगा कि भाषाओं का बोझ ढोता फिरेगा । अत: शुरू से ही शिशुओं को तीन भाषाओं में शिक्षित किया जा सकता है – (1) मातृभाषा (2) बेसिक संस्कृत (3) विश्वभाषा – अंग्रेजी । वास्तविक जीवन में मातृभाषा का व्यवहार होना उचित है । विश्व नागरिक के रूप में अंग्रेजी भाषा का ज्ञान आवश्यक हो ।

 

(6) विद्यार्थियों को समस्यायें और शिक्षक तथा शिक्षार्थी का सम्बन्ध :-

छात्रों पर दबाव डालकर या डरा धमका कर उनसे कुछ पाने की चेष्टा करना वृथा चेष्टा है । पढ़ने के लिए ज्ञान की भूख जगानी होगी और उसके साथ ज्ञान की भूख मिटने की व्यवस्था के रूप में यथोपयुक्त शिक्षा देनी होगी । इसी में शिक्षा की सार्थकता है । तभी वह शिक्षा छात्रों के शरीर, मन और आदर्श का सम्यक् रूप से गठन कर सकेगी ।

शिशुओं के मन का झुकाव खेलने कूदने की ओर सबसे अधिक रहता है । इसलिए खेलकूद के माध्यम से ही उनकी ज्ञानतृष्णा जगानी चाहिए । खेलकूद के माध्यम से ही उन्हें शिक्षा देनी होगी । कहानी के माध्यम से उसे सहज भाव से देश विदेश का इतिहास, भूगोल सिखाया जा सकता है । युवकों को शिक्षा के लिए आदर्श के साथ वास्तविकता का सम्मिश्रण करना होगा । शिक्षकों को भी यह स्मरण रखना है कि वे भी विभिन्न आयु के शिशु ही हैं । प्रेम सम्बन्ध के अभाव के कारण ही अनेक लड़के कड़े शिक्ष‌कों या प्रहार पटु माता पिता की मन ही मन मृत्यु कामना भी करते हैं । STUDENT – CONTROL – का सूत्र है :- (विद्यार्थी को प्रगति के लिए सूत्र)

S = Sense of duty (कर्त्तव्य बोध)

T = Truthfulness (सच्चाई)

U = Universal outlook (सार्वभौम दृष्टिकोण)

D = Disciplinarian (अनुशासित या अनुशासन प्रिय)

E = Etiquette (सदाचारी, शिष्टाचारी)

N = Nice disposition (सुन्दर स्वभाव या सुन्दर प्रकृति)

T = Tactful (निपुण एवं व्यवहार कुशल, सही काम को सही समय पर सही ढंग से सम्पन्न करना)

 

(7) राष्ट्रीय शिक्षा या मानव शिक्षा ? – स्वाधीनता प्राप्ति के बाद ही बहुत देशों में शिक्षा व्यवस्था को राष्ट्रीयता के साँचे में ढालने का प्रयास देखा जाता है । यदि छात्रों की आवश्यकता समझने की चेष्टा न रहे तो हो सकता है कि वह राष्ट्रीय शिक्षा हो पर वह मानव शिक्षा नहीं मानी जा सकती ।

प्रादेशिकता या साम्प्रदायिकता के समान राष्ट्रीयता भी शिशु मन पर घातक आघात करती है । इससे उसकी स्वच्छ विचार बुद्धि बहुत कुछ हद तक नष्ट हो जाती है । अत्यन्त उग्र राष्ट्रीयता का भूत यदि शिक्षा-व्यवस्था के प्रवक्ताओं के सर चढ़ बैठे तो अनेक बार राष्ट्रीय विशेषता के नाम पर देश के छात्रों को बाकी दुनियां से अलग रखने की चेष्टा करते हैं । अतः मानव शिक्षा को अधिकतर प्रश्रय देना होगा । जिस शिक्षा में आध्यात्म का समोवश नहीं वह शिक्षा अधूरी है ।

 

(8) सही विद्वान और शिक्षित कौन ? – जिसने अधिक सीखा है, स्मरण रखा है, और उसका व्यवहारिक जीवन में प्रयोग किया है उसे ही शिक्षित कहा जा सकता है ।

यदि डिग्री को शिक्षा का मापदण्ड माना जाय, डिग्री से ही यदि समझा जाए कि किसने कितना ज्ञानार्जन किया है, तो भी सवाल उठता है कि परीक्षा पास करने के लिए जो लोग किसी किसी तरह अनेक विषय कण्ठस्थ तो कर लेते हैं और परीक्षा के दो चार महीने या बहुत हुआ तो दो चार वर्ष बाद ही सब कुछ भूल जाते हैं, वे बहुत जानते हैं या बहुत शिक्षित हैं कैसे कहा जा सकता है ? यदि शिक्षा माने रूचि का परिमार्जन या व्यावहारिक संयम समझा जाय तो वह तो निरक्षर में भी हो सकता है । अधिक जानने वाले, यदि रखनेवाले और जीवन में उसे प्रतिफलित करने वालों को यदि शिक्षित समझा जाय तो कहना पड़ेगा कि ऐसी शिक्षा के लिए विद्यालय जाना अनिवार्य नहीं है, बिना किसी स्कूल में नाम लिखाए भी ऐसी शिक्षा संभव है ।

यह कहना कठिन है कि कौन शिक्षित है और कौन मूर्ख साधारण लोग उन्हें ही शिक्षित समझते हैं जिनकी शिक्षित मान्यता का उन पर सिक्का जम जाता है । ऐसे शिक्षितमन्य लोग सदा सब के सब उच्च उपाधि धारी नहीं होते । अधिकांश तो धन के बल पर या अपनी पदमर्यादा के बल पर अपने को शिक्षितों की श्रेणी में सम्मिलित कर लेना चाहते हैं ।

उसे ही Learned या विद्वान कहेंगे जो बहुत पढ़ा लिखा है, जो पढ़ा है उसे समझा है, उसे याद रखा है और उन्हें कार्यरूप भी दिया है । किसी शिक्षित (Educated) और विद्वान व्यक्ति में किताबी ज्ञान हो सकता है या नहीं भी हो सकता है वैसे ही प्रथागत रूप से ज्ञानार्जन कारी कोई व्यक्ति वास्तविक शिक्षित हो भी सकता है और नहीं भी हो सकता है । इस प्रकार सही विद्वान या शिक्षित उसे ही कहेंगे जिसमें निम्नोक्त चार चीजें जरूर होंगी, इनमें से एक का भी अभाव रहने पर उसे विद्वान नहीं कहा जाएगा ।

  • एक दो नहीं, विभिन्न विषयों पर अनेक किताबें यत्नपूर्वक पढ़नी होंगी थोड़ा पढ़ लिखकर विद्वान नहीं बन
    सकते ।
  • केवल पढ़ने से नहीं होगा, समझकर पढ़ना होगा अर्थात् जो पढ़ा उसे हृदयंगम करना होगा, अधिगत करना
    होगा ।
  • जिसे पढ़ा, समझा उसे याद नहीं रख सका – ऐसा भी होने पर नहीं चलेगा । याद न रख पाने पर विद्या प्राप्त करने का कोई मतलब ही नहीं होता । जिसने बहुत दिन पहले M.Sc. पास किया है उसे अब Matriculation की परीक्षा में शामिल होने के लिए कहने पर वह बेशक असफल हो जाएगा क्योंकि वह अधिकतर भाग भूल चुका है ।
  • पढ़ना, हृदयंगम करना और याद रखना – ये तीनों एक साथ चलना चाहिए । साथ ही उन्हें कार्यरूप भी देना होगा । कोई पास किया हुआ Advocate है, जबकि वह उस वृत्ति में नियोजित नहीं है, इसका अर्थ है कि थोड़े समय में ही वह सारे कानून भूल जाएगा । तब फिर उसे कानून विषय पर विद्वान कैसे कहेंगे ?

 

(9) शिक्षा पद्धति के मूल तीन तत्व :- शिक्षा पद्धति के सम्बन्ध में हमें तीन मूल बातें याद रखनी होगी । प्रथमतः शिक्षा का आधार होगा ।

  • प्रखर वास्तवकिता बोध :- शिक्षा व्यवस्था में कोई भाव जड़ता, अन्धविश्वास, भौगोलिक या जातिगत भेद-विभेद के लिए तिलमात्र भी जगह नहीं होगी ।
  • वास्तविक ज्ञान की भूख :- द्वितीयतः शिक्षा ऐसी हो जिसमें शिक्षार्थी के मन में वास्तविक ज्ञान की भूख जगे । छात्र-छात्रायें स्वतः प्रवृत्तहोकर अपने मन में एक स्थिति का दबाव पैदा करेंगे, सभी प्रश्नों के उत्तर पाने के लिए उनका मन व्याकुल हो उठेगा – “इसका उत्तर क्या है ?” “क्या वह सही है ?” उनका मनोभाव होगा – “मैं सबकुछ जानना चाहता हूँ । मैं सम्पूर्ण विश्व को अधिगत करना चाहता हूँ ।” अरबी भाषा में शिक्षार्थी के लिए ‘तालिब-उल-इल्म’ शब्द व्यवहृत होता है; जिसका अर्थ है ज्ञान का असली खोजी । ऐसी प्रचण्ड ज्ञान की भूख जगानी होगी ताकि शिक्षार्थी अपने शिक्षक को, माँ बाप को, पड़ोसियों को हमेशा प्रश्न पूछकर परेशान कर डाले – “यह ऐसा क्यों ?” “वह वैसा क्यों ?” “ऐसा क्यों हुआ ?” – इस प्रकार वह मानो समग्र विश्व को अपने में समाहित कर लेना चाहेगा ।

(3) तृतीयत: शिक्षक और शिक्षार्थी का मन साम्यावस्था में रहेगा ताकि वह किसी भी प्रकार के गैर जरूरी तत्वों के द्वारा प्रभावित न हो सके । ये हुए शिक्षा पद्धति के मूल तीन तत्व ।

 

(10) शिक्षा व्यवस्था कैसी होनी चाहिए ? शिक्षा-व्यवस्था का आर्थिक दायित्व, पठन-पाठन, पाठ रीति तथा पाठ निर्वाचन का अधिकार किनके हाथों में रहना उचित है ? :- दलीय राजनीति के हाथों से शिक्षा व्यवस्था को यत्नपूर्वक दूर रखने की आवश्यकता है । शिक्षा व्यवस्था का आर्थिक दायित्व राष्ट्र का है किन्तु पठन-पाठन, पाठ रीति तथा पाठ निर्वाचन का एकमात्र अधिकार शिक्षाव्रतियों के हाथों मे रहना चाहिए । राष्ट्र इन शिक्षाव्रतियों तथा विश्वविद्यालयों को परामर्श दे सकता है लेकिन आदेश नहीं दे सकता है । किसी भी प्रस्ताव को विचार विमर्श के लिए भेज सकता है, किन्तु स्वीकार करने के लिए दबाव नहीं दे सकता है । बेतार व्यवस्था, सिनेमा आदि जो सब चीजें लोक शिक्षा की दृष्टि से गुरूत्वपूर्ण है, इन सबके सम्बन्ध में भी उपरोक्त नीति ही जरूरी है ।

गणतान्त्रिक व्यवस्था में विश्वविद्यालय सम्बन्धी मामलों में शिक्षाविद् राजनैतिक नेता नाक घुसेड़ते हैं । वे लोग शिक्षा का कुछ भी न समझते हुए भी अपने मतवाद को जन समर्थन पुष्ट बनने के लिए भावावेग पैदा करने के उद्देश्य से शिक्षा व्यवस्था में हस्तक्षेप करते हैं । जिन प्रतिष्ठानों का शिक्षागत मूल्य है उनके परिचालन का दायित्व राजनीति वालों का नहीं शिक्षाविदों का ही रहना चाहिए । रेडियो, टेलीविजन परिचालन का दायित्व भी शिक्षाविदों पर न्यस्त होना उचित है । अन्यथा जिस तरह सत्तासीन राजनैतिक दल विश्वविद्यालय से अनुमोदित पुस्तकों में अपने मतवाद का प्रचार करते हैं, ठीक उसी तरह रेडियो, टेलीविजन में भी उस अवसर पर अपव्यवहार करेंगे ।

 

(11) प्राउट के अनुसार शिक्षा का लक्ष्य क्या है ? प्राउट को शिक्षा नीति कैसी है ? :- प्राउट के अनुसार शिक्षा का लक्ष्य है “सा विद्या या विमुक्तये।” शिक्षा वही है जो विमुक्ति अर्थात स्थाशी मुक्ति प्रदान करती है । शिक्षा का वास्तविक अर्थ है त्रिभौमिक विकास मानवीय अस्तित्व के शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक-इन तीनों स्तरों पर एक साथ और समान रूप से उन्नति । इसके फलस्वरूप व्यक्तित्व की सुसामञस्यपूर्ण अग्रगति संसाधित होती है । शिक्षा प्रसुप्त मानवीय संभावनाओं को भी जगाती है ताकि उसका यथार्थ उपयोग सम्भव हो । वास्तविक शिक्षित उसे ही कहेंगे जिसने प्रभूत ज्ञान अर्जित किया है, बहुत अधिक याद रखा है और अपने व्यावहारिक जीवन में काम में लाने में सक्षम हुआ है ।

प्राउट की शिक्षा व्यवस्था में नैतिक शिक्षा और अदर्शोन्मुखता पर जोर देना होगा । शिक्षा के सभी स्तरों पर नैतिक अनुशीलन को सबसे अधिक महत्व देना होगा । शिशु के मन में शुरू से विश्वैकतावाद की भावना भी सञ्चारित करनी होगी। केवल शिष्टाचार और मार्जित व्यवहार सीखा देने से नहीं चलेगा। असली शिक्षा वही है जो शिक्षार्थी के मन से सृष्टि के सारे अस्तित्वों के प्रति गहरे प्रेम और ममताबोध को जगा दे ।

आज का शिशु कल का आदर्श नागरिक है । शिशुओं में ग्रहण क्षमता तथा सर्जनशीलता असाधारण होती है, किन्तु उसे उत्तरोत्तर बढ़ाते रहने के लिए शिक्षा पद्धति को पूरी तरह मनोवैज्ञानिक बुनियाद पर स्थापित करना होगा ।

परीक्षा व्यवस्था में आमूल परिवर्त्तन करना होगा ताकि शिक्षार्थियों के सैद्धान्तिक और व्यावहारिक ज्ञान दोनों का सही मूल्यांकन हो । स्कूल में निवास करने के समय में शिक्षार्थियों को समाज कल्याण मूलक और अन्यान्य निर्माणमूलक (constructive) कामों में भाग लेने के लिए प्रोत्साहित करना होगा । शिक्षा के अन्त में यथोपयुक्त जीविका की निश्चितता होनी चाहिए । शिक्षकों का चुनाव महत्त्व के साथ करना होगा । इसके लिए शिक्षागत योग्यता के मापदण्ड के रूप में सर्टिफिकेट या प्रशंसापत्र काफी नहीं है । चारित्रिक दृढ़ता, सत्यता, समाजसेवा, निःस्वार्थ परता, अनुकरणीय व्यक्तित्व और स्वभाव सुलभ नेतृत्व प्रदान करने की क्षमता शिक्षक में ये योग्यतायें अवश्य ही रहनी चाहिए । समाज में शिक्षक को सर्वोच्च सम्मान मिलेगा और उनका आर्थिक उत्तरदायित्व समाज को ही वहन करना होगा ।

माध्यमिक स्तर पर (भारत में 8, 9 एवं 10 श्रेणी) छात्र-छात्राऐं की स्वाभाविक प्रवणता और योग्यता के अनुसार रोजगार परक शिक्षा में शिक्षित करना होगा । गरीब परन्तु मेधावी छात्र-छात्राओं के लिये विशेष सुविधा को व्यवस्था रखनी होगी । उच्च शिक्षा सम्पन्न होने के बाद ऐसे छात्र-छात्राओं के लिए सरकारी आर्थिक सहायता से गवेषणामूलक काम का अवसर प्रदान करना होगा ।

प्राप्त व्यस्क छात्र-छात्रायें पठन-पाठन से बाहर (non-academic) के विषयों से जुड़े रह सकते है लेकिन acadmic विषय पूरी तरह से शिक्षा व्रतियों के द्वारा नियंत्रित होने चाहिए । हाँ इस मामले में वे प्राप्त वयस्क छात्र-छात्राओं से जरूरी सहयोग ले सकते हैं । ठीक मानो परिवार चलाने के मामले में लड़के-लड़कियाँ माता-पिता को प्रर्याप्त सहायता किया करती है । इसलिए छात्रों और शिक्षकों का संबंध बहुत ही मधुर होगा ।

(12) शिक्षकों द्वारा छात्रों के प्रति किया गया पक्षपात मारक अपराध है ।

(13) शिक्षा का पाठ्यक्रम (Curriculum) ब्रह्मचक्र ( cycle of creation) एवं नव्यमानवतावाद ( Neo-humanism) दर्शन पर आधारित होना चाहिए ।