Prabhat Samgiita – 1973

प्रभात संगीत नंबर-1973

यबे तोमाय पेलुम मोर अनुभवे
ग्लानि सरिये दिये छ
यखन मानि ना तखनओ देखेछे

 

अनादिकालेर हे पुरूष उत्तम
तोमार बुझिते पारे कार एत ज्ञान
बुझिते गिय्त बोधि करे अवधान
बुधि-बोधि सबे तुमि ढेले छे

 

दिइ निको कोन किछु शुधुजियेछि चाओयार अतिरिक पेटेंट
यबे तोमार जिनिस तोमा के दितेगेछि
विनिमये ता मोर साजिते करेछो

The ever knowing feeling of meeting God and Jesus ... - AI Art

भावार्थ–
हे प्रभु,तुम मेरी अनुभूतिकी में आये,यह कैसी अहेतुकी कृपा थी तुम्हांअंद मेरी! जब भी मैने तुमको अपनी अनुभूति में पाया,मेरे मन की सारी व्यथा,ग्लानि दूर हो गई। मन की सभी कलुषिता,संकीर्णता,मलिनता सभी धुल गये।मैं तो जैसे मुक्ति के आनंद में डूब गई। और तुम कितने कृपालु हो,कितने करूणावत्सल हो प्रभु,कि जब मैने तुम्हारी तरफ देखा भी नहीं,तब भी तुम मेरी तरफ देखते रहें।मैं धन्य हो गई तुम्हारी अहेतुकी कृपा से।मैं तो आनंद से भर गई। आनंद के अतिरेक से मैं मूक सी हो गई। मन की भावना कैसे व्यक्त करूं?शब्द मे वह सामर्थ्य ही कहाँ!
हे पुरुषोत्तम, तुमको कौन समझ सकता है?अपने ज्ञानके विमर्श से तुमको कोई कैसे समझ सकता है?तुम्हारे ही दिये स्वयं प्रकाश ज्ञान से,बोधि से तुम्हारा बहुत थोडा सा एहसास तो कर पाती हूँ। लेकिन सभी बुद्धि और बोधि देने वाले तो तुम ही हो।बुद्धि की वह औकात ही कहाँ जो तुमको समझ सके।
मैने तो तुम्हें कभी कुछ भी नहीं दिया।क्या दूं तुम्हें?सब तो तुम्हारा ही दिया है।मैने तो सिर्फ तुमसे लिया ही है।इतना कि अपनी चाहना से भी अधिक।जितनी कल्पना भी नहीं की थी उससे भी अधिक दिया तुमने।और जब भी तुम्हारी दी हुई चीज तुमको देनी चाही तो तुमने इतने निछावर दिये कि अपनी आंचल में संभाल भी नहीं सकी।चांद तारे से भी बडी सौगातें।कृतज्ञता व्यक्त करने की धृष्टता भी कैसे करूँ?

प्रद्युम्न दादाजी द्वारा संकलित