Prabhat Sangeet No. 774

प्रभात संगीत नंबर-774

तोमारइ आशाय दिन गुने याइ
हिया अलकाय देखिले ना
ब्यथित मानसे तोमार सकाशे
येते चेये पारे ये ना

हृदय-यमुना शुकाइया गेछे
मर्मतन्त्री छिंडिया पडेछे
ना-पाओयार ब्यथा अश्रुसजल
हये ये उठेछे बुझाने ना

नृत्येर ताले ताले चले याओ
बिरही हियारे भुलाते चाओ
अश्रुर बाणी भासाइया दान
मरमेड बाणी शुणिले ना


भावार्थ—-

हे मेरे प्रियतम,जिन दिनों से तुम्हारी लीला चल रही है ,तुमसे मिलन की आशा में उन्हीं दिनों से मेरे दिन बीतते जा रहे हैं।बीते दिनो को गिनती जा रही हूँ। आज जब समय आया तो तुमने मेरे मन की अलका नगरी की ओर देखा तक नहीं।तुम्हारे लिए कितने अरमानों से मैंने अपने हृदय की अलका को सजाया था तुम्हारे साथ अभिसार की आशा में।लेकिन तुमने एकबार भी इधर देखा तक नहीं।

अब अपनी आहों के साथ व्यथित मन से तुम्हारे सामने खडी हूं।चाहती हूं तुम्हारे पास आ जाऊँ, किन्तु आगे बढकर तुम्हारे पास आने का सामर्थ्य ही कहाँ है?वह तो तुम्हीं दोगे न।अपने सामर्थ्य से कोई कैसे तुम्हारे पास पहुंच सकता है!

मेरे हृदय की यमुना सूख गई है।मेरी मर्मतंत्री खंडित खंडित हो गई है।तुम्हें न पाने की व्यथा भार से मेरी आंखें सजल हैं।किन्तु हाय!मेरी व्यथा को तुमने समझा ही कहां!तुम तो अपने चपल स्वभावबस अपने ही नृत्य के ताल पर चलते जाते हो।बिरही हृदय की दग्ध आहें तुम्हें कहाँ तप्त करती है!मेरे आहत मर्म की ध्वनि तुमने कहां सुनी!लेकिन मुझे भरोसा है विरह का अवसान तो मिलन में ही होता है।विरह तुमने दिया है,यह भी तो मेरा सौभाग्य है।विरह की तडप तुम्हारी ही दी हुई सौगात है मेरे प्रियतम।प्रकृति तिल तिल जलती है तब ही न परमपुरूष प्रकाशित होते हैं।राधा की विरहाग्नि के प्रकाश में ही तो मोहन के दर्शन होते हैं।विरह की तडप नहीं तो प्रियतम से अभिसार का आनंद कहाँ!

प्रद्युम्न नारायण सिंह दादाजी द्वारा अनुवादित