Obituary – Shri Ganga Dadaji Left to Baba Dham

प्रद्युम्न नारायण सिंह

भक्तप्रवर श्री गंगा दादा

गंगा दादा इस भौतिक नश्वर शरीर को छोडकर बाबा में विलीन हो गए। शत शत नमन हे स्मृतिशेष!

जीवन के कुछ अंतिम साल वे पूर्णिया में अपनी छोटी बेटी के पास आ गए थे और लगभग नित्य ही मेरे घर आ जाते थे।हमेशा बाबामय बने रहते थे।थोडी सी बाबा चर्चा होते ही वे भावाविष्ट हो जाते और चिल्ला पडते – देखिए, बाबा वहाँ खडे हैं।जोर से मेरी पत्नी को पुकारते- ओ गो रानी मां,देखो बाबा आये हैं।यह उनका नित्य का ही शगल था।वे मेरी पत्नी को रानी मां कहकर ही संबोधित करते।वे भी उनका खूब सम्मान सत्कार करती।साल में तीन चार खूब अच्छी धोतियां,ब्रैसलेट या परमसुख अथवा शांतिपुरी,वे गंगादादा को भेंट करती और गंगा दादा बच्चों की तरह किलकारियां भरकर बोल उठते- राना मां,मेरे लिए मंगवाई हो?उनके लिए तो सर्वमयं बाबा बाबामयं जगत था। शुक्ल यजुर्वेद का एक सूक्त है– तन्मे मनाशिवसंकल्पमस्तु,गंगा दादा का मन तो शिवसंयुक्त था।उस मन में आनंदमूर्ति के अतिरिक्त कुछ भी नहीं था।

वे जीवन भर अनिकेत ही रहे।नाथनगर,भागलपुर की अपनी पैत्रिक जायदाद भाई भतीजों को दे दिया और स्वयं अपनी ससुराल झरिया आ गए। ससुर के पास प्रचूर धन था,साबुन बनाने का कारखाना था,रोज पचासों हजार रूपये बोरा में भरभर कर आते और सारा हिसाब किताब इनकी पत्नी ही रखती थी। एकबार की घटना है,आनंदनगर बन रहा था।बाबा आनंदनगर का निर्माण कार्य देखने आये थे।आचार्य क्षितिज उन दिनों धनबाद में जिला कृषि पदाधिकारी थे।उन्होंने गंगा दादा से पूछा वे आनंदनगर जा रहे हैं,बाबा आये हैं,क्या तुम्हें चलना है?गंगा दादा ने कहा,हां ,आप गाडी लेकर मेरे घर आ जाईये,मैं तैयार रहूंगा।यथासमय क्षितिज जी आ गए। गंगा दादा ने सबकी नजर छिपाकर एक बोरी जीप में डाला और क्षितिज जी से बोले चलिये।क्षितीज ने पूछा ,बोरा में क्या है?गंगा जी ने कहा,चलिए, रास्ते में बताता हूं। झरिया से निकलने के बाद गंगा जी ने कहा,बोरे में रूपये हैं,कितना है मैं नहीं जानता।मैने पत्नी से छिपाकर आलमारी की चाबी ले ली और रूपयों की बोरी निकाल ली। इसमें पचीस हजार या पचास हजार हैं,मै नहीं जानता।आनंदनगर का निर्माण कार्य चल रहा है,उसमें काम आ जायेंगे। लेकिन आचार्य जी,यह काम आपको ही करना है।मैं बाबा से नहीं कह सकता। बहरहाल,वे आनंदनगर पहुंचे।बाबा आवास का एक आधा अधूरा कमरा बना था।बाबा वहीं थे।क्षितिज जी ने बहुत हिम्मत कर कूट भाषा में बाबा से निवेदन किया। बाबा ने भी कूट भाषा में क्षितिज जी से मुस्कुराते हुए कहा कि गंगा को बोल दो,वह अपने लिए इसका उपयोग कर ले।मैं अनुमति देता हूं।इस कूट भाषा की मिमिक्री जब क्षितिज जी हमलोगों को सुनाते तो हंसते हंसते हमलोग लोटपोट हो जाते ।

झरिया में स्व’ आचार्य अमितानंद अवधूत इनके यहां रेगुलर विजिटर थे।वे आनंदनगर इंजीनियरिंग कालेज के प्रिंसिपल थे और बाबा के अत्यंत प्रिय शिष्य थे।अपनी कार्यकुशलता और दक्षता से उन्होंने इस कालेज से अनेकों ग्रैजुएट इंजीनियर पैदा किये।बाबा इनसे सर्वाधिक खुश रहते थे।जब भी अमितानंद जी अभाव में होते गंगा दादा हर क्षण उनकी मदद के लिए तैयार रहते। लेकिन दूसरे के पैसे से कबतक दिवाली मनती! गंगा दादा को भी कुछ न कर पाने की ग्लानी होती थी।आखिर इनको सेट्ल करने के ख्याल से इनके ससुर रामगढ में सोडा की एक फैक्ट्री लगवा दी ।गंगा दादा फैक्ट्री के सर्वेसर्वा थे।इनके ससुर के साबुन बनाने की फैक्ट्री में सोडा की जरूरत होती थी।अब गंगा दादा रामगढ रहने लगे।फायर ब्रिक्स की भी फैक्ट्री लग गई। पैसा ही पैसा। एक दिन बाबा जमालपुर से आनंदनगर जा रहे थे आनंदनगर की प्रगति देखने।बाबा आचार्य अमूल्य रत्न सारंगी की गाडी से सफर कर रहे थे।रास्ते में थोडी देर बरही में रामविलास बाबू के घर रूके।रामविलास बाबू उस समय बरही में डी,एस,पी,थे।कस्टम की ड्यूटी थी।वहां से रामविलास बाबू भी साथ हो लिए। रामगढ आकर बाबा अचानक गंगा दादा के घर आ गए। अप्रत्याशित रूप से बाबा को अपने घर पाकर वे मानो अपना होशोहवास खो बैठे। गंगाजी अकेले रहते थे,पत्नी झरिया में थी।बाबा दस मिनट रुके,जल लिया फिर रांची के लिए प्रस्थान कर गये।गंगा दादा भी अपना घर द्वार,फैक्ट्री यूं ही खुला छोड रामविलास बाबू की जीप में बैठ गए। कई दिन बाद वापस लौटे तो सबकुछ अव्यवस्थित।लेकिन कोई मलाल नहीं,कोई चिंता नहीं। उस अपूर्व आनंद की स्थिति में संसार की चिंता कैसे हो सकती है। ससुर ने हर संभव कोशिश की गंगा दादा को दुनिया में सेट्ल करने की,लेकिन जो दुनिया का है ही नही उसे दुनिया में कोई कैसे सेट्ल कर सकता है?

लेकिन संसार की कुछ वाध्यता है। उसे मानकर हमें चलना होता है।परिस्थितियों के साथ संगति बैठानी पडती है। गंगा दादा की चिंता भी यही थी।चार चार सयानी बेटियों के विवाह की चिंता भला किस पिता को न होगी! इस चिंता से वे अक्सर तिलमिला जाते थे। एक रोचक घटना सुना रहा हूं। सन 1972 के दिसम्बर महीने की वह ठंढ से कड़कड़ाती रात थी। बाबा तब पाटलीपुत्र कालोनी में रहते थे।मै अप्रत्याशित रूप से भीषण संकट से घिर गया था।भविष्य के सारे दरवाजे जैसे मेरे लिए बंद हो गये थे।इसकी चर्चा मैं यहां नहीं करूंगा। मैं अज्ञातवास में था और सेन्ट्रल एजेंसियां मुझे गिरफ्तार करने के लिए कुत्तों तरह ढूढ रही थी। शांति के लिए किसी तरह बाबा का दर्शन चाहता था।सो मैं बचते हुए किसी तरह पाटलिपुत्र कॉलोनी पहुंचा,पूरी तरह सर से पैर तक ढंका हुआ।वहीं गंगा दादा से मुलाकात हो गई। रात थी,मैं आफिस के कोरीडोर में दीवार से सटकर खडा था और बरामदे में कुर्सी पर बैठे बाबा को कभी कभी झांक लेता था।

इतने में बरामदे से गंगा दादा भीतर आने लगे तो कोरीडोर में मुलाकात हो गई। वे भी चिंतित दीख रहे थे।अपनी चिंता को दरकिनार कर मैने उनसे उनकी चिंता का कारण पूछा। उन्होंने कहा,मैं अपनी बेटी के रिश्ते के लिए आचार्य चन्द्रनाथ जी के घर गदोपुर जा रहा हूं। पटना उतर कर भगवान का दर्शन करने आया हूं।किसी तरह कृपा प्राप्त हो और रिश्ता बन जाय।तबतक बाबा अपने आवास चले गए थे और फिल्ड जाने की तैयारी हो रही थी।हमलोग बात कर ही रहे थे कि इतने में बाबा आवास से आफिस सेक्रेटरी आचार्य प्रणवानंद जी सीधे हमलोगों के पास आये और दोनों को बाबा के साथ फिल्डवाक में जाने कहा। मै तो आश्चर्य चकित था। बिना देखे मेरी उपस्थिति और चिंता को प्रभु ने जान लिया।मैं विह्वल था।मैं असल विषय पर आना चाहता हू। जाने के समय मैं बाबा के साथ गाडी में पिछली सीट पर बैठा और गंगा दादा आगे की सीट पर ड्रायवर के साथ।भ्रमण से जब लौटने लगा तो गंगा दादा ने कान में फुसफुसाहट हुए मुझसे अनुरोध किया कि आप आगे आ जांय और बाबा के साथ मुझे बैठने दें।फिर मैं आगे आ गया और गंगा दादा पीछे बाबा के साथ बैठ गए। थोडी दूर चलने के बाद ही एकाएक बाबा बोल उठे— छि छि गंगा, बोलो इ उचित छै? गुरू के चरण स्पर्श करि क तोंय लडकी के विवाह के चिंतना करि रहलो छो।सांसारिक उद्देश्य लेलि गुरूचरण के स्पर्श करि क भौतिक आकांक्षा पूर्ति र चिंता उचित नय छै।जे भी भौतिक जरूरत छै ,समय पर पूरा होय जाय छै। ” बाबा अंगिका में बोल रहे थे।अब तो गंगा दादा बाबा से बार बार क्षमायाचना करने लगे। बाबा बोले,गंगा तोर बेटी क मांगी क लोग ले जयतय” अर्थात,गंगा ,तुम्हारी बेटी को रिश्ते वाले मांग कर ले जायेंगे।चिंता मत करो।
और आचार्य चंद्रकांता के यहां रिश्ता तो हुआ ही,सभी बेटियों का सुखद और सुंदर विवाह हुआ। बता दें कि आचार्य चंद्र नाथ जी गंगा दादा के आचार्य भी थे और समधी भी हो गए ।

नाम यश से दूर वे स्थितप्रज्ञ पुरूष थे।गुरू ने अपनी सत्ता उनके समक्ष प्रकट कर दी थी,इसलिए जीवन की सभी कठिनाईयों और प्रतिकूलताओं को उन्होंने सहज भाव से झेल लिया। आपको जानकर हैरानी होगी कि जिस पौराणिक सावित्री की कथा हम सुनते आये हैं और भारतीय नारियां बटसावित्री के रूप में आज भी व्रत रखती हैं,वह सावित्री आज भी गंगा दादा की बडी बहू के रूप में अपने विकलांग पति की सेवा में तत्पर है।कैंसर के आप्रेशन में गंगा दादा के बडे बेटे का पूरा मुंह काट दिया गया है।कपडे की पट्टी से हमेशा मुख ढंका रहता है,नली से भोजन दिया जाता है।गंगा दादा की बडी बहू के माता पिता ने बेटी को समझाने का प्रयास किया कि उसकी दूसरी शादी करा दें,बेटी ने माता पिता को यह कहते हुए अपने घर से निकाल दिया कि वे कभी दूसरी बार मेरे घर के चौकठ के अंदर आने की हिमाकत न करें और उनको घर से निकाल दिया और भीतर से दरवाजा बंद कर लिया।नारी का संकल्प कालजयी होता है,इसीलिये भारत की संस्कृति में उसे शक्तिरूपा कहा गया। मां बाहर चीखती रही,घंटों चीखने के बाबजूद दरवाजा नहीं खुला और वे निराश वापस चले गए। यह आधुनिक सावित्री है,निराश्रित और विकलांग पति को वह कैसे छोड दे!गंगा दादा जब मुझे यह कहानी सुना रहे थे तब उनकी आंखें नम थी और गला भर आया था। उस सावित्री को आज कोई नहीं जानता। पौराणिक सावित्री ने यमराज के यहां से अपने पति सत्यवान को वापस लाया था। महर्षि अरविंद ने अपने “सावित्री” महाकाव्य में सावित्री का अनूठा चित्रण किया है। इस वीर रमणी की वीरगाथा भारत के घर घर में सुनी जाती है।गंगा दादा की बडी बहू आधुनिक काल की सावित्री है।

गंगा दादा भक्त थे इसलिए अत्यंत विनम्र थे। जमालपुर की घटना है।उत्तरप्रदेश कैडर के एक बडे आई,एस,एस, अधिकारी ,जो बाबा के अनन्य भक्त थे,बाबा का दर्शन करने आये थे।बाबा अभी आश्रम नहीं पहुंचे थे,बस आने ही वाले थे।उपस्थित साधकगण उस अधिकारी से मिल रहे थे,नमस्कार कर रहे थे,मिलकर गौरवबोध भी कर रहे थे। गंगा दादा भी वहीं थे।उन्होंने भी बडे आत्मीय भाव से उनको नमस्कार किया,लेकिन प्रतिनमस्कार तो दूर ,एक सामान्य आगंतुक मार्गी समझ कर उधर से नजर भी फेर ली।अधिकार और पद का गरूर तो होता ही है,मुश्किल से आदमी बच पाता है इन पाशों से।बाबा आये।सभी साष्टांग प्रणाम कर हाथ जोडे अपनी गर्दन ऊंची किये हैं कि आराध्य की दृष्टि उनपर पड जाय।आते ही बाबा गंगा दादा को लक्ष्य कर बोले— गंगा,कुछ बनैले छो?गंगा दादा ने तपाक से जबाब दिया,हों बाबा,। तब बाबा बोले,सुनाबो।और गंगा दादा की कविता शुरू हो गई। गंगा दादा ओजपूर्ण स्वर में कविता पाठ कर रहे हैं और बाबा मुग्ध होकर सुन रहे हैं।आई,एस,अधिकारी इस साधारण आदमी की हैसियत देखकर हैरान है,जिसकी ओर देखना भी उसे नागवार लगा था,उसको परमाराध्य मुग्ध भाव से सुन रहे हैं।बाबा ने उनको ” गंगोदकम” उपनाम दिया,उदकम ” का अर्थ जल होता है,अर्थात ” गंगा का जल” ।गंगा का जल हमारी संस्कृति में अत्यंत पवित्र माना जाता है।अब तो वे अधिकारी गंगा दादा के पीछे पड गये । वे आशुकवि थे,अंगिका,हिंदी,मारवाडी भाषा में वे तक्षण किसी भी विषय पर कविता पाठ करते,लिखने की जरूरत नहीं।लेकिन वे तो सहज थे,राग-द्वेष से ऊपर।इधर जब बंगलुरू छोटे बेटे के पास चले गए तो रोज ही फोन से बात करते थे।

आचार्य रूद्रानंद दादा से अत्यंत आत्मीय भाव था उनका और उनसे भी बातें करते रहते थे।कभी कभी व्यस्तता के कारण यदि वे फोन न उठा पाते तो मुझे फोन कर कहते कि दादा को कहिये ,मेरा फोन क्यों नहीं उठाते हैं।फिर मैं दादा को फोन कर गंगा दादा की विह्वलता से परिचित कराता और वे फोन कर उनकी विह्वलता को शांत करते।मैने मधुव्रतानंदजी से भी अनुरोध किया था कि जब भी गंगा दादा का फोन आवे तो उन्हें रूद्रानंद दादा से बात करा दें और मधुव्रतानंद जी बात करा देते थे। फिर तो वे निर्विकल्प अवस्था में चले गए और सम्पूर्ण संस्कार का भोग कर बाबा के पास चले गए। यह गंगादादा को मेरी श्रद्धांजलि है। गंगा गाथा सुनने में कैसा लग रहा है?

प्रद्युम्न नारायण सिंह