आदर्श चंद्राकर
भारत देश के सभी नागरिकों को देश की 78वी स्वतंत्रता के वर्षगांठ पर शुभकामनाएं। यह दिवस हमें याद दिलाता है कि हमारे देश लाखों सच्चे सपूतों ने अपने प्राणों की आहुति दी थी उसके उपरांत ही अंग्रेजों की 200 वर्ष की परतंत्रता से देश को स्वतंत्रता मिली थी। पर यह स्वतंत्रता मात्र राजनीतिक स्वतंत्रता है और संविधान के माध्यम से देशवासियों को कुछ स्वच्छंदता के नागरिक अधिकार भी प्राप्त हुए एवं अपनी सरकार स्वयं चुनने की लोकतांत्रिक व्यवस्था भी मिली। देश की व्यवस्था देशवासियों के हाथ में आ गई।
सवाल यह है कि देश की आजादी के 77 वर्षों बाद भी क्या इस देश के नागरिक सही मायने में स्वतंत्र हैं? अंग्रेजों के आने के पूर्व हमारा देश सोने की चिड़िया कहलाता था और इसका नामकरण भारत वर्ष भी लगभग 10,000 वर्ष पूर्व आर्यों ने इसलिए किया था क्योंकि इस देश की जलवायु जीवन के अनुकूल थी, यहां प्रचुर मात्रा में भोजन व्यवस्था थी, उन्नत खेती के द्वारा भोजन उत्पादन होता था, इलाज की व्यवस्था थी, सामाजिकता एवं आध्यात्मिक ज्ञान था। देखा जाए तो हमारा देश सही मायने में पूर्णतयः आत्मनिर्भर था और किसी का मोहताज नहीं था।
भगवान शिव ने 7000 वर्ष पूर्व इस देश के निवासियों को तंत्र साधना का नियमबद्ध ज्ञान एवं अभ्यास दिया, सामाजिक व्यवस्था सिखाया, विवाह की प्रथा का आरंभ किया, चिकित्सा के लिए वैद्यक शास्त्र दिया जिसमे शल्य चिकित्सा भी शामिल थी, सरगम दिया, नाट्यशास्त्र दिया, विश्वबन्धुत्व का सिद्धांत दिया जिसके आधार पर मानव समाज का निर्माण किया जा सके। भगवान सदाशिव के दिशानिर्देश एवं मार्गदर्शन में इस देश ने प्राचीन युग में ही विकास की धारा में अपने कदम बढ़ा दिए थे जब अन्य भूमि के मनुष्य मानव जीवन की निम्न जरूरतों की पूर्ति के लिए संघर्ष कर रहे थे। इस बात का उदाहरण हड़प्पा एवं मोहनजोदड़ो की दुनिया की सबसे प्राचीन सभ्यता के रूप में मिलती है। आर्यों ने अपने साथ जब भारत वर्ष में प्रवेश किया तब उनके पास दर्शन के रूप में ऋग्वेद का ज्ञान था जिसमें देखा जाए तो मात्र प्राकृतिक शक्तियों की उपासना एवं स्तुति ज्ञान था।
भारत वर्ष के मानव समाज एवं भगवान सदाशिव के योगदान से मात्र आर्यों एवं अनार्यों में संधि नहीं हुई बल्कि वेद के ज्ञान में भी उसका प्रभाव देखा गया। तंत्र विज्ञान के शिक्षा, अभ्यास एवं अनुभवों से वेद में अनंत ब्रम्ह, निर्गुण निराकार ब्रम्ह एवं गुरु का महत्व जुड़ता चला गया। वेद दुनिया का सबसे प्राचीन ग्रंथ है जिसमें आध्यात्मिक दर्शन प्राप्त होता है। वेद के ज्ञान को संपूर्णतयः आर्यों का ज्ञान नहीं कहा जा सकता क्योंकि यह भगवान सदाशिव के तंत्र विज्ञान से प्रभावित हुए बिना नहीं रह सका और प्रकृति उपासना से कहीं बहुत आगे पहुंच गया। आज के दिन में भी वेद का ज्ञान आध्यात्मिक दर्शन के रूप में बहुतों को मार्गदर्शन देता है। उस युग में धरती के मनुष्यों ने लिपि का आविष्कार नहीं किया था इसलिए वेद को लिखा नहीं गया था और क्योंकि यह जान एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक श्रवण अर्थात सुनकर बढ़ते चली गई इसलिए इसका नाम जिसे सुना जाता है अर्थात श्रुति भी कहा गया। सही मायने में कोई भी मनुष्य स्वतंत्र आध्यात्मिक रूप से मुक्ति एवं मोक्ष के द्वारा हो सकता है और भगवान सदाशिव ने सर्वप्रथम यह विज्ञान धरती के मनुष्यों को तंत्र विज्ञान एवं योग साधना के अभ्यास के द्वारा सिखाया था। उन्होंने और अन्य ऋषि मुनियों के सामूहिक योगदान से विभिन्न योगासन का भी आविष्कार होता चला गया जो मानव शरीर और मन को स्वस्थ रख सके। योगासन मात्र हमारे शरीर को स्वस्थ नहीं रखता बल्कि शरीर के विभिन्न ग्रंथियों के रासश्रवण अर्थात हार्मोन्स को संतुलित करता है एवं मन को परिपक्व बनाने में मददगार साबित होता है जिसके द्वारा मनुष्य योग साधना कर अपने आत्मा को त्रिगुणात्मक शक्ति वाली प्रकृति के बंधन से सदा के लिए मुक्त कर सकता है और सही मायने में प्रगति कर सकता है। भौतिक या मानसिक प्रगति मात्र एक जीवन तक सीमित रहता उसके बाद उस सारी प्रगति को इस जगत में छोड़कर जाना पड़ता है एवं अपने संस्कारों के अनुरूप पुनर्जीवन में सबकुछ की शुरुवात पुनः करना पड़ता है पर मात्र आध्यात्मिक प्रगति ऐसी है जो एक जीवन से अगले जीवन तक चलती है और उसके आगे की प्रगति होती है क्योंकि आध्यात्मिक प्रगति शरीर के कम आत्मा की प्रगति होती है।
अतः सही मायने में आध्यात्मिक प्रगति ही मनुष्यों की असली प्रगति है। करोड़ों योनियां के जन्म की धारा से गुजरकर ही मनुष्य शरीर मिलता है यह इतना बहुमूल्य है और इस शरीर के द्वारा ही जीवात्मा मुक्ति और मोक्ष की धारा पर अग्रसर हो सकती है। सही मायने में देखा जाए तो मानव धर्म वह नहीं जो ग्रंथों एवं विभिन्न सांसारिक रूढ़िवाद या उपासना विधि के द्वारा मजहब रूप में सिखाया जाता है बल्कि सभी मनुष्यों का एक ही धर्म हो सकता है और वह है योग साधना, समर्पण, अनंत परमात्मा की भक्ति एवं जगत सेवा के द्वारा परमात्मा में एक होने का अभ्यास अर्थात प्रयास करना। इसके अलावा मनुष्य का और कोई धर्म संभव ही नहीं है। किसी का धर्म उसके विशेष गुण हैं जैसे अग्नि का धर्म जलाना एवं ताप देना है, जल का धर्म शीतलता प्रदान करना है उसकी तरह मनुष्य न तो पेड़ पौधों की श्रेणी में आ सकता है और न ही पशु पक्षियों की श्रेणी में। मात्र मनुष्य का मन उन्नत है एवं शारीरिक बनावट ऐसी है कि वह योग साधना कर परमात्मा में अपने मन को मिला सकता है जबकि यह स्वतंत्रता एवं सामर्थ्य परमात्मा ने धरती के अन्य जीवों एवं जीवन को नहीं दिया है यह मानव जीवन की विशेषता है अतः मानव धर्म इसके अलावा और कुछ हो ही नहीं सकता है। भगवान सदाशिव ने इसे ही भागवत धर्म के रूप में परिभाषित किया था और धरती के मनुष्यों को प्रगति के राह पर अग्रसर किया था।
इस जगत में रहते हुवे मात्र आत्मिक प्रगति को मानव सभ्यता का विकास नहीं कहा जा सकता है और मनुष्यों के द्वारा भौतिक जगत में किए जाने वाले विकास को पूर्णतयः नकारा नहीं जा सकता है। भारत वर्ष में विभिन्न ऋषि मुनि हुए उन्होंने अपने दर्शनों के माध्यम से सामाजिक एवं आध्यात्मिक ज्ञान दिया जिसमे मैं वैष्णववाद के जनम आदि शंकराचार्यजी का यहां पर उल्लेख करना जरूरी समझता हूं। उन्होंने आध्यात्मिक प्रगति को ही सम्पूर्ण प्रगति कहते हुए मानव समाज को एक अच्छा मार्गदर्शन दिया था पर कमी रह गई तो वह है जागतिक प्रगति को कोई महत्व नहीं देना। उनके कथनानुसार “ब्रम्ह सत्यम जगत मिथ्या” है अर्थात ब्रम्ह ही सम्पूर्ण सत्य है एवं जगत पूर्णतयः मिथक अर्थात झूठ है। आध्यात्मिक विज्ञान के दृष्टिकोण से इसे सही माना जा सकता है पर आध्यात्मिक प्रगति के लिए मनुष्यों को भौतिक जगत में शरीर धारण करना पड़ता है अतः उनका उक्त समय के लिए भौतिक अस्तित्व का भी महत्व है और उसे सिरे से नकारा नहीं जा सकता है। वर्तमान युग में भगवान श्री श्री आनंदमूर्तिजी ने उनके कथन को जागतिक सापेक्ष में पूर्ण करते हुए कहा कि “ब्रम्ह सत्यम जगत सत्यम आपेक्षिकम” अर्थात ब्रम्ह अर्थात अनंत परमात्मा अर्थात सृष्टि के बीज या न्यूक्लियस ही पूर्ण सत्य है क्योंकि उनका अस्तित्व सदा ही रहेगा और इस जगत में सभी कुछ चलायमान एवं परिवर्तनशील है पर मनुष्यों के लिए जागतिक जीवन में जगत के साथ सामंजस्य बनाकर चलना होगा अर्थात सापेक्षिक सत्य मानकर ही चलना होगा तभी आध्यात्मिक विकास भी संभव होगा। पूर्व में भगवान सदाशिव एवं भगवान श्रीकृष्णजी ने अर्थव्यवस्था का सिद्धांत नहीं दिया था क्योंकि उस समय के मानव समाज में उसकी जरूरत नहीं थी और गरीब से गरीब को भी निम्न जरूरतों की पूर्ति का अभाव नहीं सहना पड़ता था। पर वर्तमान युग की पूंजीवादी एवं साम्यवादी व्यवस्था में मानव समाज में हाहाकार मचाकर रखा हुआ है एवं धरती के मनुष्यों की अधिकतम जनसंख्या की निम्न जरूरतों की पूर्ति भी संघर्षशील हो गई है और मनुष्यों को अपनी जरूरत के लिए मानव समाज के ताकतवर, रसूखदार एवं आर्थिक रूप से अत्यंत संपत्ति एकत्रित करनेवालों की चाहे या अनचाहे रूप में गुलामी करने के अलावा कोई और उपाय नहीं है।
परमात्मा ने धरती के मनुष्यों की रुदन को सुना और किस तरह धरती का प्रत्येक मनुष्य आर्थिक रूप से संपन्न हो सकता है ताकि विकास की धारा में हर व्यक्ति अग्रसर हो सके एवं हर जीव की रक्षा हो सके एवं स्वच्छंद जीवन का अधिकार प्राप्त हो एवं किसी के शोषण का सामना न करना पड़े इसलिए ईश्वर प्रेम एवं विश्वबन्धुत्व आधारित नव्यमान्वतावाद की आर्थिक व्यवस्था भी इस सदी के महान दार्शनिक एवं आध्यात्मिक गुरु श्री प्रभात रंजन सरकार के द्वारा prout व्यवस्था के रूप में दिया। PROUT व्यवस्था का आधार ईश्वर प्रेम है और सम्पूर्ण जगत को उसी ईश्वर की संतान मानकर विश्वबन्धुत्व को अपनाते हुए धरती पर सहयोगात्मक आर्थिक व्यवस्था का निर्माण करना है जिसके द्वारा धरती का हर जीव स्वच्छंद रूप से जीवन यापन कर पाए एवं चहुमुखी विकास की धारा में अग्रसर हो सके। पूंजीवाद या साम्यवाद का सिद्धांत वैसी व्यवस्था बनाने में पूरी तरह असमर्थ है क्योंकि सर्वप्रथम यह मात्र भौतिक जीवन को ही महत्व देता है एवं कुछ हद तक मानसिक प्रगति के विषय में सोचता है पर आध्यात्मिक प्रगति जो कि असली प्रगति है सिरे से नकार देता है। यह व्यवस्था सभी की निम्न जरूरतों की पूर्ति करने में भी सैकड़ों वर्षों से असमर्थ रहा है एवं मात्र जड़वादी एवं शोषण व्यवस्था का श्रोत बना हुआ है। इस व्यवस्था के चलते धरती का मानव समाज अपने आपको अत्यंत प्रताड़ित महसूस करने लगा है एवं प्रगति की राह पर धरती की अधिकतम जनसंख्या अपने आपको पिछड़ा समझती है और विकास की धारा में वह सबसे निचले पायदान पर बने हुए हैं। जबकि दुनिया के मात्र चंद लोग जो कि मुश्किल से दुनिया की आबादी के 1% भी नहीं होंगे वह सम्पूर्ण अर्थव्यवस्था के विकास का रस चूस लेते हैं और जिसकी वजह से धरती के सम्पूर्ण मानव समाज को अत्यंत व्यथित होकर जीवन जीना पड़ता है। साम्यवाद की व्यवस्था में तो अर्थव्यवस्था को सम्हालने का कोई सिद्धांत ही नहीं है इसलिए वह अंत में जागतिक विकास के लिए पूंजीवादी व्यवस्था को अपनाने के लिए मजबूर हो जाते हैं और पूंजीवाद से ज्यादा जघन्य शोषण व्यवस्था का निर्माण करते हैं जिसमें अभिव्यक्ति की आजादी तक छीन ली जाती है एवं शासक वर्ग के विरोध में कोई आवाज भी उठाने का प्रयास करे तो उन्हें अत्यंत गंभीर परिणाम जिसमें अपने मानव जीवन के आकस्मिक अंत का भी सामना करना पड़ता है। पूंजीवादी एवं साम्यवादी व्यवस्था में धरती के अन्य जीवों को कोई अधिकार ही नहीं दिया जाता बल्कि उन्हें मानव जीवन के लिए उपयोगी तत्व के रूप में मात्र देखकर उनके दोहन और विनाश को ही विकास का सिद्धांत कहा जाता है। जिसका गंभीर परिणाम धरती के मनुष्यों को ही भुगतना पड़ रहा है।
सही मायने में आर्थिक आजादी या आर्थिक लोकतंत्र के बिना संपूर्ण रूप से आजादी सम्भव नहीं है अतः इस सदी के महान दार्शनिक एवं आध्यात्मिक गुरु श्री प्रभात रंजन सरकार ने prout का सामाजिक अर्थव्यवस्था का सिद्धांत दिया जिसके माध्यम से धरती का हर मनुष्य एवं जीव असली प्रगति एवं स्वतंत्रता की ओर अग्रसर हो सके।
प्राउट की नींव इसके पाँच मौलिक सिद्धांतों में समाहित है ।
निम्नलिखित अनुभाग इन सिद्धांतों का संक्षिप्त अवलोकन है:
सिद्धांत १: समाज की स्वीकृति के बिना धन संचय नहीं किया जाना चाहिए।
सिद्धांत 2: अपरिष्कृत, सूक्ष्म और कारण संसाधनों का अधिकतम उपयोग और तर्कसंगत वितरण होना चाहिए।
सिद्धांत 3: व्यक्तिगत और सामूहिक प्राणियों की शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक क्षमताओं का अधिकतम उपयोग होना चाहिए।
सिद्धांत 4: अपरिष्कृत, सूक्ष्म और कारणात्मक उपयोगों के बीच एक संतुलित समायोजन होना चाहिए।
सिद्धांत 5: उपयोग समय, स्थान और रूप में परिवर्तन के अनुसार भिन्न होते हैं; उपयोग प्रगतिशील होना चाहिए।
सर्वप्रथम मानव सभ्यता के विकास के नाम पर जंगल, नदी, पहाड़ सबके साथ पिछले सैकड़ों वर्षों से खिलवाड़ किया जाता रहा है जिसकी वजह से धरती का वातावरण जीवन के संरक्षण के लिए बिगड़ता चला गया है। दूसरा मात्र लाभ कमाने के दृष्टिकोण से भौतिक विज्ञान को एक आधार बनाकर मांसाहार को बढ़ावा दिया जाता रहा है एवं उसे मनुष्यों के शरीर को स्वस्थ रखने के लिए अनिवार्य कहा जाता रहा है। इस व्यवस्था के 2 प्रमुख गंभीर परिणामों से मानव सभ्यता को भुगतना पड़ रहा है जिसे भौतिक वैज्ञानिक आर्थिक एवं राजनीतिक रूप से ताकतवर लोगों के भय में साफ साफ न कहकर दबी जुबान से कहते हुए भी मिल जाते हैं। सबसे पहले मांसाहार मानव शरीर को गंभीर रूप से रोगी बनाने के लिए काफी है क्योंकि यह पूर्णतयः मृत कोशिकाओं का भोजन है एवं अत्यंत अम्लीय होता है उसके साथ साथ इसके तरंग आकस्मिक मृत्यु को वरण किए होते हैं जो मानव शरीर एवं मन को जड़ एवं मृत्यु की ओर धीरे धीरे धकेलना शुरू कर देता है। इसका लोग इस तरह से तर्क भी देते हैं कि अगर इन पशुओं को मनुष्य भोजन के रूप में ग्रहण नहीं करेंगे तो इनकी जनसंख्या धरती पर बहुत बढ़ जाएगी और मनुष्यों के लिए जीवन जीना भी मुश्किल हो जायेगा।
सर्वप्रथम यह बात भी सीरे के गलत है क्योंकि प्रकृति मनुष्यों से लाखों करोड़ों गुना ज्यादा शक्तिशाली है और वह ही सम्पूर्ण जगत में सामंजस्य कैसे स्थापित करना है भली भांति जानती है और सक्षम है और मनुष्य उनका कार्य करने में चाहकर भी असमर्थ ही साबित होते रहेंगे और जगत की जीवन व्यवस्था को इस तरह विपरीत तरीके के प्रभावित करने के अलावा और कुछ नहीं कर पाएंगे। तीसरा वर्तमान पूंजीवादी युग में इन पशुओं को मानव निर्मित शोधशालाओं में तैयार किया जा रहा है और इनकी अप्राकृतिक तरीके से खेती की जा रही है तो प्राकृतिक रूप से इनकी जनसंख्या वृद्धि की बात भी सरासर झूठी है एवं इतनी बड़ी जनसंख्या में पशुओं की खेती की जा रही है जिसके उत्पादन के लिए 10 गुना पानी एवं 5 गुना ज्यादा समतल जगह की जरूरत पड़ती है जिसका हिसाब नहीं लगाया जाता है। मात्र इतना नहीं इन पशुओं का उत्पादन बढ़ाने के लिए इनके भोजन जो कि शाक, सब्जी, अनाज आधारित ही ज्यादातर होता है का उत्पादन कर एवं अप्राकृतिक तरीके से दवाओं के द्वारा इनका वजन बढ़ाया जाता है जो मनुष्यों के भोजन के अभाव को बढ़ाता है एवं धरती के प्राकृतिक श्रोतों को जनसंख्या के मुकाबले में कमी पैदा करते चला जाता है एवं दवाओं के द्वारा बढ़ाया गया मांस के भक्षण से मनुष्यों में वजन वृद्धि की समस्या भी बढ़ती चली गई है जो मनुष्यों में गंभीर रोग भी पैदा कर रहे हैं। प्रकृति के धरोहरों एवं संपत्तियों का विषाणुपात दोहन से धरती पर भुखमरी जैसी अवस्था भी बनी हुई है और ज्यादातर लोगों को पौष्टिक भोजन का अभाव भी सहना पड़ रहा है। वैज्ञानिक एवं तार्किक दृष्टिकोण से मांसाहार या पशु मांस की खेती मानव सभ्यता में भुखमरी पैदा कर रही है और अर्थव्यवस्था को भी विपरीत रूप से प्रभावित कर रही है। ऐसे भोजन के सेवन से मानव मन भी जड़ होता चला जाता है और उसकी किसी भी विषय को सोचने समझने की क्षमता भी रुग्ण होती चली जाती है एवं उन्हें गंभीर रूप से रोगी बनाता जा रहा है जिसे भौतिक वैज्ञानिक पूंजीवादी ताकतों के दबाव में शोध के माध्यम से उजागर नहीं कर रहे हैं। अतः prout व्यवस्था हर जीव को जीवन का अधिकार की पैरवी करती है ताकि मनुष्य स्वस्थ जीवन यापन कर सके एवं जागरूक सामंजस्य भी बने रह सके।
अर्थव्यवस्था के सिद्धांत में यह सिखाया जाता है कि वही अर्थव्यवस्था मजबूत बनी रह सकती जिसमें मांग एवं आपूर्ति में सामंजस्य बना रह सके और दोनों में लगातार वृद्धि हो सके। अर्थव्यवस्था का यह सिद्धांत बिल्कुल उपयुक्त एवं सही है पर दुनिया भर के शैक्षणिक संस्थाएं जो अर्थव्यवस्था की शिक्षा प्रदान करते हैं के द्वारा भी बेवकूफ बनाया जा रहा है। यह शिक्षण संस्था यह सिखाते हैं क्योंकि धरती में मनुष्यों की जनसंख्या वृद्धि होते जा रही है तो उनकी जरूरतों के अनुसार मांग में वृद्धि हो रही है और विभिन्न वैज्ञानिक मशीन आधारित उद्योगों के द्वारा आपूर्ति के लिए उत्पादन क्षमता बढ़ाकर आपूर्ति किया जा रहा है। वह यह भी कहते हैं कि किसी उत्पाद की कीमत भी मांग एवं उत्पादन के संतुलन से ही बनती है। यह सिद्धांत भी कुछ हद तक सही है पर पूंजीवादी व्यवस्था में राष्ट्रीकृत बैंकों के माध्यम से मात्र पूंजीपतियों को ऋण सुविधा उपलब्ध कराई जाती है और उद्योग लगाने की स्वतंत्रता मिलती है पर विभिन्न नियमों के द्वारा आमजन को उस व्यवस्था की स्वतंत्रता से अलग रखा जाता है। दूसरा जितने भी प्राकृतिक संसाधन हैं उनके दोहन की आजादी भी सरकारों के द्वारा इन्हीं पूंजीपतियों को कौड़ी के दाम में बांट दिया जाता है अर्थात आम नागरिक से उसका भी अधिकार छीन लिया जाता है और उसके अनुपात में उसे लाभ नहीं दिया जाता है बल्कि प्राकृतिक संपदा तो मानव निर्मित नहीं है बल्कि प्रकृति निर्मित है इसलिए इसपर सभी नागरिकों का अधिकार होता है तो इसका इस्तेमाल भी सभी नागरिकों के विकास के लिए होना चाहिए। ऐसा अक्सर नहीं होता है बल्कि पूंजीपतियों के हाथों में यह प्राकृतिक संपदा जाते ही वह उसके उपयोग या वितरण को नियंत्रण करना आरंभ कर देते हैं और उसका मनमाना कीमत बढ़ाकर 10 गुना से हजार गुना या लाख गुना कीमत में आमजन या देश की सामरिक व्यवस्था के लिए वापस बेचते हैं। इससे आम नागरिक से प्राकृतिक संपदाओं का अधिकार भी छीन लिया जाता है।
पूंजीवादी व्यवस्था में किसी भी औद्योगिक या व्यापारिक उत्पादन से कमाया गया लाभ का वितरण में जितने लोगों के योगदान से हुआ है उसके अनुपात में नहीं होता है बल्कि उसका सबसे ज्यादा लाभ इन्हीं चंद पूंजीपतियों को ही मिलता है और उसके लिए उन्हें विकासशील और रोजगार पैदा करनेवाला और अर्थव्यवस्था को सम्हालने वाला कहकर सामाजिक रूप से सम्मानित किया जाता है जबकि उनमें से अधिकतम लोग लुटेरे ही होते हैं। वह दुनियाभर की जनसंख्या की मेहनत के निचोड़ से अपना महल एवं धन संपत्ति के अंबार को बढ़ाते चले जाते हैं साथ ही साथ हमेशा महंगाई को उत्पादन का खर्च बढ़ने के नाम पर बढ़ाते चले जाते हैं जिसे टालना भी गलत बात हो जाएगी। सबसे गलत बात है कि बैंकों के माध्यम से जनता के पैसों से लगे गए उद्योग और जनता के मेहनत से पैदा हुआ उत्पादन और उसकी बिक्री से कमाए गए लाभ को सभी में उचित अनुपात में वितरित होना चाहिए और किसी भी व्यक्ति या चंद व्यक्तियों के समूह को आर्थिक रूप से इतना ज्यादा मजबूत होने की आजादी नहीं मिलनी चाहिए कि उनके द्वारा सम्पूर्ण अर्थव्यवस्था प्रभावित होने लगे या फिर वह किसी देश की सरकार को धन एवं अपनी कमाई के माध्यम से अपने अधीनता स्वीकारने को मजबूर कर दे। ऐसी सरकार चाहे जनता के द्वारा ही चुना हुई क्यों न हो वह जनहित में नीति तैयार नहीं कर सकती है बल्कि इन पूंजीवादी ताकतों के हित में ही नीति तैयार करेगी। उचित शब्दों में कहा जाए तो आमजन से आर्थिक स्वतंत्रता के अधिकार को छीना जाएगा और उन्हें आर्थिक विकास की धारा में निचले पायदान पर बने रहने को अत्यंत मजबूर कर दिया जाएगा एवं उनकी आर्थिक प्रगति के सभी रास्तों को विभिन्न सरकारी नियमों एवं आर्थिक एवं लाइसेंस के नियमों के तहत सरकारी संस्थानों के द्वारा अवरुद्ध कर दिया जाएगा। ऐसी व्यवस्था मात्र प्रचंड भ्रष्टाचार से फल फूल सकती है जो वर्तमान में हमारे देश की व्यवस्था बनी हुई है।
इस दृष्टिकोण से हम 77 वर्षों की आजादी के उपरांत भी सही मायने में आजाद नहीं हो पाए हैं क्योंकि सरकारी आंकड़ों के अनुसार ही इस देश की 60% जनसंख्या जो कि लगभग 80 करोड़ होती है सरकार के द्वारा सस्ते दर पर या मुफ्त में दिए गए भोजन पर जीवन यापन कर रही है। इस देश में आजादी के 77 वर्षों बाद भी आर्थिक विषमता को भी इस तरह समझा जा सकता है कि इस देश के मात्र 1% पूंजीपतियों के हाथ में देश की धन एवं संपदा 60 से 70% के मालिकाना हक में है और इस देश के ऊपर के 10% लोगों के हाथ में लगभग 80 से 90% की धन संपदा का नियंत्रण है। इसका यह अर्थ हुआ कि देश की लगभग 90% जनसंख्या अपनी निम्न जरूरतों की पूर्ति के लिए वह भी जो ठीक तरह से नहीं हो पाती है के लिए इनकी गुलामी करने को मजबूर हैं। इसे किस दृष्टिकोण से स्वतंत्रता कहते हैं यह मेरी समझ के बाहर की बात है। जब तक इस आर्थिक विषमता को दूर नहीं किया जाएगा जो कि पूंजीवादी या साम्यवादी व्यवस्था में कभी संभव ही नहीं है आमजन गुलाम ही बना रहेगा और अपनी भोजन, कपड़ा, मकान, शिक्षा एवं इलाज की निम्न जरूरतों की पूर्ति के लिए इनकी हर बात को मानने के लिए मजबूर बना रहेगा। देश की सरकार भी इस व्यवस्था के खिलाफ विरोध जताने को देश के खिलाफ अपराध कहकर आमजन को दंडित करने एवं प्रताड़ित करने से भी परहेज नहीं करेगी। क्या हम ऐसी व्यवस्था को स्वतंत्रता की व्यवस्था कह सकते हैं? क्या इसी स्वतंत्रता के लिए हमारे देश के लाखों शहीदों ने अपने प्राणों की आहुति दी थी? क्या नेताजी सुभाषचंद्र बोस, भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद जैसे आजादी के मतवालों ने क्या ऐसी स्वतंत्रता की कल्पना की थी? उनके कथनों को पढ़ा जाए तो देश तब तक सही मायने में आजाद नहीं हो सकता जब तक इस देश में शोषण व्यवस्था का अंत नहीं होगा और देश का हर नागरिक आर्थिक रूप से स्वतंत्रता का उत्सव मनाता हुआ नहीं दिखेगा और उसे गरीबी या भुखमरी या अभावग्रस्त जीवन जीने के लिए मजबूर नहीं होना पड़ेगा।
Prout व्यवस्था में इन बिंदुओं पर भी विचार कर उसका सिद्धांत बनाया गया है। पहला किसी भी व्यक्ति को इतनी ज्यादा संपत्ति एकत्रित करने का सामाजिक अधिकार नहीं दिया जाएगा जिसके द्वारा वह समूचे अर्थव्यवस्था या सरकार को प्रभावित करने लायक कभी बन सके। काम करनेवालों की सहकारिता की सहूलयोगात्मक व्यवस्था के आधार पर लोगों की आय को लगातार बढ़ाते जाया जाएगा और वह जन जन की आय में वृद्धि असली मांग को बढ़ाते चली जायेगी जिसकी आपूर्ति मांग के अनुपात में आधुनिक उद्योगों के माध्यम से बढ़ाते चला जायेगा। तीसरा जो वर्तमान में देश की आर्थिक प्रगति की प्लानिंग की जाती है वह केंद्रीय स्तर पर किया जाता है जिसकी वजह से देश के हर कोने का विकास संभव नहीं हो पाता है। अतः आर्थिक विकास की प्लानिंग को संभाग स्तर पर या ब्लॉक स्तर पर निर्णय के लिए व्यवस्था बनाई जाएगी जिसमें उस स्थान के मूलनिवासियों को जो वहां की अर्थव्यवस्था से प्रभावित होते हों और उनकी समस्याओं के निवारण के लिए आर्थिक विकास की प्लानिंग करने में भागीदार बनाया जाएगा।
यह सब व्यवस्था परिवर्तन के उपरांत prout के अनुसार अर्थव्यवस्था और सामाजिक विकास को मजबूत एवं प्रगतिशील बनाने के लिए सभी की निम्न जरूरतों की पूर्ति को प्राथमिकता दी जाएगी उसके उपरांत के लाभ को प्रगति में योगदान एवं महत्व के अनुसार वितरित किया जाएगा ताकि विकास की धारा में महत्वपूर्ण योगदान देनेवालों को उसका लाभ पहले दिया जा सके। यम नियम की सामाजिक नैतिकता में सभी को परिपक्व बनाया जाएगा ताकि मनुष्य मात्र भौतिक रूप से नहीं बल्कि मानसिक रूप से भी प्रगति कर सके। क्योंकि कितनी भी धन संपदा क्यों न हो वह हमेशा सीमित ही रहेगी और कभी भी मानव मन को संतुष्ट नहीं कर सकती अतः मनुष्यों को आर्थिक संपत्ति के अनंत संग्रहण का नहीं बल्कि मानसिक एवं आध्यात्मिक संपत्ति के संग्रहण के लिए भी कार्य करते रहना चाहिए ताकि उनकी असली आध्यात्मिक प्रगति भी संभव हो सके। इस व्यवस्था को चलाने या नेतृत्व के लिए भी मानसाध्यात्मिक रूप से उन्नत नेतृत्व की जरूरत पड़ेगी जिसे सद्विप्र के रूप में परिभाषित किया जाता है क्योंकि वह लोग निज स्वार्थ की सोच से मुक्त लोग रहेंगे एवं किसी भी प्रकार के अहम की भावना से भी मुक्त लोग रहेंगे एवं जनकल्याण के कार्य को ईश्वर सेवा मानकर करते रहेंगे एवं सम्पूर्ण मानव समाज को चहुमुखी विकास का सदैव नेतृत्व देते रहेंगे। जब तक ऐसी भ्रष्टाचार रहित एवं शोषण रहित प्रगतिशील सामाजिक एवं आर्थिक व्यवस्था का निर्माण नहीं किया जाएगा तब तक यह कहना कि लोकतंत्र या स्वतंत्र व्यवस्था है कहना भी मिथ्या कथन ही होगा।
मैं आशा करता हूं कि इस देश के एवं दुनिया भर के नैतिकवान बुद्धिजीवी मिलकर prout की आर्थिक लोकतंत्र की व्यवस्था को समझकर उसे अमल में लाने के लिए एवं नव्यामनवतावाद आधारित धरती पर एक मानव समाज के निर्माण के लिए इसे समझना प्रारंभ करेंगे एवं संगठनात्मक रूप से इसके लिए कार्य करने को उद्देश बनाना शुरू कर देंगे। मेरे दृष्टिकोण से इस युग का नया मंत्र होना चाहिए न कि मात्र आर्थिक आजादी बल्कि संपूर्ण आजादी ताकि धरती का मानव समाज भी विकास की धारा में चहुमुखी प्रगति कर इस विश्व ब्रम्हांड में अन्य ग्रहों या नक्षत्रों के मानव समाज के लिए एक उदाहरण के रूप में स्थापित हो सके।
आदर्श चंद्राकर
