प्राचीन काल से ही मनुष्यों को अपने मन के भीतर चलने वाले संघर्षों से जूझना पडा है, उसी समय से उसने अपने जीवन के लय को, अपने मन में उठने वाले भाव- विचारों को और अपनी आंतरिक अनुभूतियों को समझने की चेष्टा की है, उसने अनेक तरह के प्राणियों को देखा- पशुओं को, पक्षियों को और उनकी मानसिक स्थतियों को भी समझने की कोशिश की, प्रश्न उठता है मनुष्य कैसे सोचता है? क्यों मन के विभिन्न स्तरों और अनुभूतियों में अंतर होता है? क्या विकास की महत श्रृंखला के साथ मन का कोई संबंध है अथवा यह कुछ और ही है?
दूसरे शब्दों में हमारी वर्तमान चेतना के स्तर का संबंध क्या भूतकाल और भविष्य काल से भी जुडा हुआ है? अनेक प्रकार की आश्चर्यजनक मानसिक घटनाओं से मनुष्य को जूझना पडा है, अनेक प्रकार की मानसिक अनुभूतियों को उसने साक्षात किया है, मन की विभिन्न दशा– लम्पटता और कपटता से लेकर दया, करूणा, मैत्री, दूरदर्शन, दूर श्रवन, टेलिपैथी, इन्ट्यूसन की अनुभूतियों को भी महसूस किया है, मन की ये विभिन्न दशायें क्या हैं? हम उन्हें क्यों अनुभव करते हैं?
अपने समाज में मनुष्यों ने हमेशा कुछ लोगों को मेधावी मानसिकता का देखा है, कुछ दैवी गुणों से भरे लोगों को देखा है और अन्य बहुत सीमित मन वाले, तो स्वाभाविक रूप से उसकी जिज्ञासा रही है कि किस तरह उच्चतर मानसिकता को प्राप्त किया जाय, आज भी यदि आप किसी अच्छे खिलाडी के विषय में सुनते हैं, किसी मैजिशियन की कला को, या संगीतज्ञ को, किसी अच्छे अभिनेता को या किसी सुंदर लावण्यमयी नारी को देखते हैं तो आप जानना चाहते हैं कि कैसे ये लोग इस तरह बने, ठीक इसी तरह जब हम उच्चतर मन की विभिन्न अभिव्यक्तियों को, उसके प्रभावों को देखते हैं तो स्वाभाविक रूप से हमारे मन में भी अभिलाषायें होती हैं कि हम भी इसे कैसे प्राप्त करेंl
इस उच्चतर मन या विकसित दिमाग के कारणों के प्रसंग में अनेक लोगों ने अनेकों अभिमत दिये हैं, कुछ लोगों का कहना है कि कोई दैवी शक्ति मन के अंदर प्रवेश कर जाती है जिसके फलस्वरूप इस तरह का चमत्कारी मन काम करने लगता है, कुछ कहते हैं, ” नहीं, कोई अमरीकी आत्मा मन में प्रवेश कर जाती है और उसी के माध्यम से अमरीकी आत्मा बातें करती हैं, कुछ दूसरे लोग कहते हैं, ” नहीं, भगवान् ही उसमें उतर जाते हैं और उसके माध्यम से बोलते हैं”, इस तरह समय समय पर अनेक लोगों ने अनेक बातें कहीं, लेकिन ज्ञानियों और चिंतकों ने इसे कभी स्वीकार नहीं कियाl
इस विषय पर भारत में प्राचीन काल से ही चिंतन, मनन, और निधिध्यासन होते रहे हैं, ” मनुष्य की चेतना के विकास का आधार क्या है? “, इस विषय पर ऋषियों ने, मुनियों ने भिन्न भिन्न तरीके से इसे समझने की कोशिश की, और इन्हीं कोशिशों से उन्होंने तांत्रिक अभ्यास के कुछ सूत्र खोज लिये, उन्होने “तंत्र” शब्द का व्यवहार उस प्रसंग में नहीं किया जिस अर्थ में सामान्य लोग इसे समझते हैं, आधुनिक मनुष्य तो तंत्र से सामान्यतया झाड, फूंक, बामाचारी पंचमकार की साधना, मारन, मोहन, उच्चाटन, बस यही समझते हैं, हाँ, यह भी तंत्र के ही अंगीभूत है लेकिन यह तंत्र की स्थूलतम साधना है जो साधक के निम्न व्यक्तित्व और हीन संस्कार पर आधारित है l तंत्र का मात्र दो उद्देश्य है- मन का विस्तार और चेतना की विमुक्ति, और वह अभ्यास जो चैतन्य की उर्जा को प्रवाहित कर देता है, खोल देता है, मन के विस्तार का अर्थ है मन की वह क्षमता जो हमारी ज्ञानेंद्रियों की सीमा के पार जाकर प्रत्याक्षानुभूति को प्राप्त करता है, आंखें विषय ( object) को देख सकती है, कान ध्वनि को सुन सकता है, इनको हम इंद्रियानुभूति कहते हैं, इंद्रियों के माध्यम से मन ही देखता है, मन ही सुनता है, सभी प्रकार की इंद्रियानुभूति का प्रत्यक्षीकरण मन के द्वारा ही होता है, लेकिन इन इंद्रियों के माध्यम से मन बहुत ही सीमित रूप में विषयों का प्रत्यक्षीकरण कर सकता है, इंद्रियों की अपनी सीमा है, ज्यादा प्रकाश में आंख चौंधिया जाती है, सूरज को नंगी आंखों से नहीं देख सकते, अंधेरे में भी आंखें काम नहीं कर सकती, बहुत कड़ी ध्वनि कान बर्दाश्त नहीं कर सकता, तो इंद्रियों के माध्यम से मन बहुत ही सीमित प्रत्यक्षीकरण कर सकता है, लेकिन मन वह देख सकता है जो आंखें नहीं देख सकती, मन वह सुन सकता है जो कान नहीं सुन सकते, जो गंध आपके आसपास नहीं है, वह गंध भी मन सूंघ सकता है, यदि आप ऐसा कुछ चिंतन करते हैं जो तर्क के बाहर है तो इसे हम उच्चतर मन की अनुभूति कहते हैं, तो यह तंत्र का एक बहुत ही महत्वपूर्ण पहलू है l
तो हमलोग उच्चतर मन ( expanded mind) की बात कर रहे थे, विस्तारित मन अर्थात ज्ञानेंद्रियों की परिधि से बाहर जाकर विषयों का प्रत्यक्षीकरण करना, उसकी अनुभूति करना, तंत्र में इन अनुभूतियों को यंत्र, मंडल और ध्वनि के प्रतीकों में व्यक्त किया गया है, यदि आप प्रत्यक्ष में बिना ध्वनि के होते हुए भी ध्वनि सुनते हैं तो यह उच्चतर मन, विस्तारित मन के जागरूक होने के कारण सुन रहे हैं, जब इंद्रियों की सहायता के बिना यह आंतरिक अनुभूति होने लगती है तब क्या होता है कि और भी बडी बडी अनुभूतियाँ होना शुरू हो जाती हैं, इसी को कहते हैं ऊर्जा की मुक्ति अर्थात मुक्त ऊर्जा का प्रवाह शुरू हो जाता है, इसी को कहा जाता है कुंडलिनी का जागरण, यहाँ यह जान लेना चाहिए कि यह ऊर्जा की मुक्ति या कुंडलिनी जागरण किसी भी धार्मिक मतवाद के अन्तर्गत नहीं है, यह विशुद्ध वैज्ञानिक कारणों से ऐसा होता है, जब आप मैटर या पदार्थ को तोडते हैं, चूर्ण विचूर्ण करते हैं तब उससे ऊर्जा निकलती है, ऊर्जा का प्रवाह निकलने लगता है, इस मुक्त ऊर्जा की व्याख्या फिजिक्स में की गई है, आप दूध को मथिये मक्खन निकल आयगा, मै ऊर्जा की मुक्ति समझाने की कोशिश कर रहा हूँ,
मैटर ( पदार्थ) के आधार में ही ऊर्जा (इनर्जी) है, श्रीश्री आनंद मूर्ति जी इसे bottled up energy कहते हैं, यानि बोतल में बंद ऊर्जा, जैसे ही बोतल का ढक्कन खुला ऊर्जा का प्रवाह शुरू हो जाता है, सभी पदार्थों के आधार में, आगे पीछे केवल ऊर्जा ही है, पदार्थ ऊर्जा का स्थूल रूप है, एक स्तर में मैटर ऊर्जा में रूपांतरित हो जाता है फिर दूसरे स्तर में ऊर्जा मैटर में रूपांतरित हो जाती है, विचार( thought) भी मैटर है, अनुभूति भी मैटर है, यह एक आधार है और इसका भी आधार है, आप एक विचार का विश्लेषण करते करते उसके पीछे जाईये, एक अनुभव का विश्लेषण करते करते उसकी जड में पहुँचिये, आप अस्तित्व के सभी अनुभवों का विश्लेषण करते करते उसकी जड में पहुँचिये, तब क्या होता है? आप सभी अनुभवों को इनकार करते जायेंगे, नहीं नहीं, इसके पीछे कुछ और है, आप कहेंगे- यह नहीं, यह नहीं, यह नहीं, आप इनकार करते चले जायेंगे और अंत में कुछ नहीं, इसे ही वेद ने – नेति नेति कहा है,
तंत्र का अर्थ है मन का विस्तार (expansion of mind) और ऊर्जा की मुक्ति(liberation of energy), इसके अभ्यास के लिए तंत्र में एक प्रणाली विकसित की गई है जिसे क्रिया योग या अष्टांग योग कहा जाता है l
मैने मन का विस्तार और ऊर्जा की मुक्ति के संबंध में कहा है, सरल शब्दों में यही तंत्र है और इसके लिए एक प्रणाली विकसित की गई है जिसे अष्टांग योग कहते, अष्टांग मार्ग का उपदेश बुद्ध ने भी दिया है और पतंजलि ने भी अपने योगसूत्र में इसकी चर्चा की है, लेकिन भगवान् श्री श्री आनंद मूर्ति जी द्वारा प्रतिपादित अष्टांगयोग इससे भिन्न है, इसमें भी यम नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि की बात कही गई है, लेकिन दोनो का क्रियात्मक पक्ष अलग है, बुद्ध का अष्टांग मार्ग तो भिक्षुओं और श्रावकों के जीवन व्यवहार में नैतिकता को सर्वोपरि मान कर चलता है जो सामान्यतया यम नियम के अन्तर्गत आ जाता है और अंत में सम्यक आजिविका, सम्यक कर्मान्त आदि के बाद सम्यक समाधि की बात कही गई है, इसपर विशेष चर्चा नही करूंगा, पतंजलि का अष्टांग योग, योग दर्शन पर आधारित है जिसे सामान्यतः हमलोग राजयोग कहते हैं, लेकिन भगवान् श्री श्री आनंद मूर्ति जी ने जो अष्टांगयोग की साधना दी है वह तंत्राश्रित है, इसे राजाधिराज योग कहा जाता है, यह साधना पद्धति इस पृथ्वी पर पहली बार सभी मनुष्यों के कल्याण को ध्यान में रखकर दिया गया है, इसको सभी जाति के लोग, सभी धर्मों के लोग, स्त्री पुरूष, बालक वृद्ध, विद्वान मूर्ख, सभी कर सकते हैं,
अष्टांग योग के सभी अंगों के चर्चा के क्रम में हम जान पायेंगें कि आनंद मार्ग की साधना पद्धति को राजाधिराज योग क्यों कहा गया है l
मन का अनियंत्रित होना साधना की सबसे बडी समस्या है, साधना चाहे कोई भी हो, राजयोग हो, या भक्ति योग, ज्ञानयोग, कर्मयोग, नादबिन्दुयोग, जप योग, शब्दसुरतयोग, क्रिया योग, कीर्तन, कोई भी साधना, मन की एकाग्रता अनिवार्य है, मन एकाग्र न हो तो किसी भी साधना में सिद्धि असंभव है, कमरे के दरवाजे, खिडकियां खुली हों, हवा की झोंकें कमरे में आ रही हो और हम मोमबत्ती जलायें तो क्या उसकी लौ स्थिर रहेगी? दरवाजा और खिडकियां बंद कर दीजिए, मोमबत्ती की लौ स्थर हो जायगी, तो जब हम ध्यान, जप, कीर्तन, साधना में बैठते हैं तब मन की सारी मलिनता, उद्वेग, तृष्णा, इच्छायें हमला कर देती हैं और मन की एकरूपता, निरंतरता को बाधित कर देती है, ऐसे में मन की एकाग्रता की चेष्टा बेकार हो जाती है, इसलिए मन को इष्ट मंत्र की वृत्ति में बांधने की चेष्टा करनी चाहिए, इसको कैसे किया जाय? सभी खिडकियां और दरवाजे बंद करने होंगे जिससे हवा अंदर आकर चेतना की लौ को बाधित न कर सके,
इसके लिए यम नियम, आसन, प्राणायाम और प्रत्याहार का अभ्यास करना होगा, तब आप मन पर नियंत्रण करने में समर्थ हो सकेंगे, जब मन पर नियंत्रण हो जाता है तब किताब की तरह आप किसी के मन को पढ सकते हैं, नियंत्रित और एकाग्र मन सबसे शक्तिशाली हथियार होता है, सभी महान व्यक्ति जिसने इतिहास को बदल कर रख दिया है, वे ऐसे ही मन वाले व्यक्ति थे, उन्होने अवसर की प्रतीक्षा नहीं की, अवसर को खींचकर लाया, अब हम एक-एक कर यम नियम आदि को स्पष्ट करने की चेष्टा करेंगे, मन पर अबाध नियंत्रण को संयम कहते हैं, यहाँ नैतिकता की दृष्टि से मैं संयम शब्द का व्यवहार नहीं कर रहा हूँ, यह एक टेकनिकल शब्द है जिसे पतंजलि ने अपने राजयोग सूत्र में इस्तेमाल किया है, उन्होंने कहा है कि जब आप आंखें बंद करते हैं और बिल्कुल असली कमल फूल जैसा बाहर में होता है, वैसा ही फूल आप बंद आंख से देखते हैं तो समझना चाहिए संयम की सिद्धि हो गई, धारणा, ध्यान और समाधि बिना बिलम्ब के एक एक क्षण में हो जाय तो कहते हैं संयम की सिद्धि हो गई, तो मन पर नियंत्रण करने का पहला चरण यम नियम के पालन से शुरू होता है, आगे योग के सभी अंगों की चर्चा करते हुए हमलोग आनंद मार्ग के अष्टांग योग की क्या विशेषता है, इसपर चर्चा करेंगे… क्रमश:
