पशु पालनार्थ निर्देशन
लेखक के बारे मे
डॉ. धनेन्द्र कुमार सिंह, उम्र 56 वर्ष, पटनाअध्ययन – आनंद नगर वेटनरी कॉलेज से पशुचिकित्सक, वर्ष 90-91 पर डिप्लोमा 2 वर्षआनंद नगर में अभ्यास – उसी स्कूल में अध्यापन 92 – 2005 and पशु चिकित्सालय में अभ्यास। पशु चिकित्सा शिविर का भी आयोजन किया गयाक्लिनिक का अनुभव – 2005 से अब तकप्रति दिन – 5-6 विजिट + क्लिनिक में मरीजउपचार – मौखिक चिकित्सा + शल्य चिकित्साआनंदमार्ग – 1990, पूरा परिवार मार्गी है। 11 कत्था का land दान भी किया, नवचेतना में समाचार प्रकाशित, अक्टूबर 2023। साथ ही महीने में एक बार गांवों में पुरुषों और महिलाओं के लिए होम्योपैथिक चिकित्सा शिविर का आयोजन कर डॉ. सुमन होम्योपैथ का अभ्यास कर रही हैं।
पशुपालक भाईयों से अनुरोध है कि आप पशु पालने से पहले तथा, पालते समय नीचे लिखी सारी बातों की जानकारी अवश्य रखें। इससे आपके पशुओं के देख-रेख, रख-रखाव तथा उचित व्यवस्था देने में आप खुद सक्षम होंगे और समय आने पर उचित व्यवस्था अपने पशुओं को दे सकेंगे।
पशुओं के पालन से पहले उनके सामान्य शारीरिक तापमान को जानना ज़रूरी है।
गाय, भैंस – 100-102 °F
भेड़, बकरी – 103 °F
कुत्ता – 101 °F
गर्भावस्था (Gestation Period)
गाय – 280 दिन,
भैंस – 310 दिन
भेड़, बकरी – 150 दिन,
कुतिया – 60-65 दिन
हमारे पशुपालकों से निवेदन है कि अपने पशुओं का कृत्रिम गर्भाधान (Artificial Insemination) करें तथा इससे जच्चा-बच्चा को स्वस्थ करें और अच्छे नस्ल के बच्चे प्राप्त करें।
पशुओं में कृत्रिम गर्भाधान का उद्येश्य सिर्फ उनकी संख्या बढ़ाना ही नहीं है, बल्कि ऐसा प्रजनन इसलिए आवश्यक है क्यूंकि उनके नस्ल को सुधारना, दुध के उत्पादकता को बढ़ाना और मादा पशुओं को योनि के संक्रमण से भी बचाना सम्भव हो सकता है। और नस्ल सुधार से सभी लोगों को अच्छे नस्ल के पशु आसानी से उपलब्ध होंगे।
हर पशु का अपना ऋतुचक् (Estrous cycle) होता है और जब पशु गर्म (Heat) में आती है तो उसके शरीर में बदलाव आना शुरू हो जाता है, जैसे- ठीक से खाना नहीं खाना, दुसरे पशुओं पर चढ़ना, योनि (Vagina) द्वारा स्त्राव (Discharge) आना, चिल्लाना और पुरे गर्म-अवस्था तक बेचैन रहना।
पशुओं को कृत्रिम गर्भाधान कराने का उचित समय- पशु जब से गर्म होता है तो उसके बीच या अन्तिम समय कृत्रिम गर्भाधान का उचित/ ठीक समय होता है।
पशुओं को पुरे गर्भावस्था तक उचित देख-रेख करना चाहिए-
पौस्टिक भोजन देना तथा मिनरल पाउडर देते रहना चाहिए।
रखने का घर भी व्यवस्थित ढंग का होना चाहिए।
डीवॉर्मिंग (Deworming – पेट के कीड़े)
पशुओं को साल में 3-4 बार पेट के कीड़े का दवा देना है। बच्चा देने के बाद माँ और बच्चे दोनों को कीड़े का दवा देना है और पशुओं को अपने मन-पसन्द लायक आहार देना चाहिए, जिससे हमारा पशु स्वस्थ रहे। बच्चा देने के बाद बच्चे को अपने माँ का ही पीला गाढ़ा दुध पिलाना है, बच्चे को बाहर का दुध नहीं पिलाना चाहिए। माँ का पीला गाढ़ा कोलस्ट्रम (Colostrum) पिलाना बच्चे को 3 महीने तक बीमारी होने से रोकता है और शरीर में रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाता है, जिससे बच्चा निरोग और स्वस्थ रहेगा।
पशुओं के स्वस्थ और अस्वस्थ होने के पहचान-
स्वस्थ पशु का शरीर और मन चंचल रहता है, कान सावधान (Alert) के अवस्था में रहता है, समय पर भोजन, पानी, पेशाब, पखाना, तापमान सभी सामान्य रहता है।
जब पशु अस्वस्थ हो जाता है तो शांत व सुस्त रहता है, भोजन नहीं करता तथा उसे बुखार भी हो जाया करता है। पखाना, पेशाब में भी बदलाव हो जाता है।
ये सभी लक्षण दिखने पर पशुपालक को पशु चिकित्सक से सलाह, सम्पर्क करना जरूरी हो जाता है।
