Songs of New Dawn by Shri Shri Anandamurti Ji

प्रभात संगीत क्रमांक 95 

https://youtu.be/CTU-kXbOCtU?si=pRBatz-bmBvGkfkP

 

चन्दनवीथि कुय़ासाय़ ढाकि’

भोरेर आलोके कालो करे’

आसिय़ाछो तुमि नवतर भावे

अपरूप एक रूप धरे’। 

 

चेना-जाना पथ आँधारेते ढेके’

सकल माधुरी लुकाइय़ा रेखे’

आसिय़ाछे शीत युगान्तरेर

वेदना वहन करे’। 

 

तमसार परपारे

रविर रश्मि थमकिय़ा थाके

शुधु क्षणेकेर तरे

आलोर देवता आँखि मेले’ चाय़

कालो कुहेलिका असीमे मिलाय़

शीत आसे ताइ आलो भासे भाई

आरो आरो भालो करे’।

 

अर्थ:

चंदन के कतारों को कुहासा से ढंक कर और भोर की रौशनी को अंधकारमय कर,

एक नई अभिव्यक्ति लेकर, अद्भुत एक रूप धारण किए हुए तुम आये हो।

 

जाने-पहचाने रास्तों को अंधकार में ढंके हुए, सारी मधुरता को छुपा कर,

शीतकाल बहुत समय के बाद, वेदना लिए हुए आई है।

 

अँधकार के उस पार, सूरज की किरणें अचानक दिखाई पड़ती हैं, लेकिन केवल एक क्षण के लिए।

आलोक के देवता (सूर्य) ने अपनी आँखें खोलीं और काले कोहरे को अनंत से मिला दिया।

शीतकाल आती है, इसलिए आलोक बढ़ती है मेरे भाई,

जिससे सभी चीज़ें अधिकाधिक सुंदर हो जाती हैं।