इस लेख का उद्देश्य दो समुदायों के मेलजोल को चित्रित करना है। यह लेख मूर्ति पूजा को बढ़ावा देने वाला नहीं है, बल्कि यहाँ चित्रित मूर्ति पूजा एक समुदाय की संस्कृति का प्रतीक है। – संपादक
जब से मनुष्य का बौद्धिक विकास हुआ तब से ही वह अपनी प्रविधि से अद्वितीय शक्ति की पूजा अर्चना करते आया है। यद्यपि ध्यान, धारणा, प्रत्याहार और समाधि के आध्यात्मिक पथ में मूर्तिपूजा निषिद्ध है, लेकिन यह सांस्कृतिक विरासत के प्रतीक के रूप में उभरा है। श्री श्री आनंदमूर्ति जी आनंदवचनामृतं के एकादश खंड में ‘मूर्ति पूजा और उसके पीछे मनस्तत्व’ में लिखते हैं कि मूर्ति पूजा का सर्वप्रथम उल्लेख बौद्ध युग में मिलता है, जिसका संबंध बौद्ध महायान सम्प्रदाय से है।
पठान काल के प्रारंभिक भाग में, वरेन्द्रभूमि (वर्तमान उत्तरी बंगाल) में राजशाही जिले के ताहेरपुर में एक राजा शासन करता था। उसका नाम कंसनारायण राय था। उस राजा कंसनारायण के पास बहुत बड़ी संपत्ति थी – एक विशाल जमींदारी, या संपत्ति। उन्होंने जमींदारी के ब्राह्मण पंडितों को बुलाया और राजसूय या अश्वमेध यज्ञ करने की इच्छा व्यक्त की। “लोगों को बताएं कि मेरे पास प्रचुर धन है। मैं समारोह के दौरान उदारतापूर्वक दान दूंगा।”
यह सुनकर, पंडितों ने कहा, “हे महान महोदय, यह कलियुग है, जब आप अश्वमेध या राजसूय यज्ञ नहीं कर सकते। इसके बजाय, आप मार्कंडेय में दर्शाए अनुसार दुर्गा की पूजा के अवसर पर उदार व्यय कर सकते हैं; फिर आप बड़े धूमधाम और प्रदर्शन का आयोजन कर सकते हैं। इसलिए कृपया मार्कण्डेय पुराण में दिए गए वर्णन के अनुसार दुर्गा पूजा करें।
तब राजा कंसनारायण ने सबसे पहले 7,00,000 सोने के सिक्के (लाखों रुपये) खर्च करके दुर्गा की पूजा की प्रथा शुरू की। तो आप समझिए कि दुर्गा पूजा की प्रथा बिल्कुल भी पुरानी प्रथा नहीं है; इसकी शुरुआत इतिहास के पठान काल के शुरुआती दौर में ही हुई थी।
अब राजा कासनरायण के उदाहरण का अनुसरण करते हुए, शायद बांग्लादेश के रंगपुर जिले में एकटकिया के राजा जगदवल्लभ (कुछ लोग “जगत्नारायण” कहते हैं) ने 8,50,000 सोने के सिक्के खर्च करके और भी अधिक धूमधाम के साथ दुर्गा की पूजा की; और उनके उदाहरण का अनुसरण करते हुए, अन्य ज़मींदारों ने भी सोचा, “क्या हम उनसे कमतर हैं? हम भी बड़े खर्च करने वाले हो सकते हैं!” इसलिए उन्होंने भी धूमधाम और भव्यता के साथ देवी दुर्गा की पूजा शुरू कर दी। इस प्रकार हर बड़े जमींदार के घर में दुर्गा की पूजा एक सामान्य प्रथा बन गई और पूजा करने वाले लोगों की संख्या में वृद्धि हुई। लेकिन पूजा हमेशा पारिवारिक माहौल में ही आयोजित की जाती थी।
आज प्रवासी भारतीय समेत पुरा देश शारदीय नवरात्र की पूजा अर्चना में डूबा हुआ है। ऐसे में ही एक अलग संस्कृति के जन समुदाय न सिर्फ शारीरिक सहयोग कर रहा है बल्कि आर्थिक सहायता भी प्रदान कर भारतीय संस्कृति गंगा-यमुना तहजीब को स्थापित किए हुए है।
झारखंड प्रदेश के गढ़वा जिला स्थिति मेराल प्रखंड मुख्यालय से महज 700-800 मीटर की दूरी पर चाँदनी चौक है जहाँ लगभग दोनों समुदाय (हिंदू और मुस्लिम के) यहाँ पारंपरिक भाईचारे के साथ रहकर उदारता, प्रेम व भाईचारे का नमूना प्रदर्शित किया है। प्रत्येक पर्व- त्योहारों में सहयोग प्रदान करते हैं। न ही एक दूसरे को अनजान से परहेज है न ही घंटी और आरती से गुरेज।
नवरात्र में देवी माँ दुर्गा का दरबार हर जगह सजा है। हर गली-मुहल्ला और चौक-चौराहों पर धूम मची है। लेकिन मेराल के चाँदनी चौक के देवी मंडप और पूजा पंडाल बहुत खास हैं, जहाँ हिन्दू-मुस्लिम दोनों साथ मिलकर पंडाल बनाने से लेकर विसर्जन तक साथ-साथ रहते हैं।
मेराल शब्द ‘मराल’ का अपभ्रंश शब्द है जिसका संस्कृत शब्द कोष में अर्थ होता है हंस। सफेद सुंदर विवेकपूर्ण पक्षी जो दूध और पानी को अलग कर देता है। अपने नाम के अर्थपूर्ण भाव जैसा ही विवेकी यहाँ के निवासी हैं। मेराल के आस-पास गाँव पाडुआ, अकलवानी और बौराहा से आसय स्पष्ट है कि मेराल प्रबुद्ध और विवेकिजनों का गाँव है। मेराल गाँव मूलतः कृषि पर निर्भर है, जहाँ हिन्दू और मुसलमान सम्प्रदाय के लोग निवास करते है। लगभग-लगभग सभी जाति के लोग वास करते हैं। जहाँ आपसी प्रेम और सौहार्दपूर्ण जीवन शैली से दूसरों को प्रेम का पाठ पढ़ाते हैं। अपने गाँव और वतन में अमन शांति स्थापित रखने के लिए दुआ और आरती दोनों एक साथ करते हैं।
चाँदनी चौक पर 4-5 दशक से ताजिया रखा जाता है, उससे महज 15-20 फ़ीट की दूरी पर लगभग 8 वर्षों से नव-युवक संघ के बैनर तले दुर्गा पंडाल में प्रतिमा स्थापित कर पूजा-अर्चना की जाती है जिसमें बढ़-चढ़ कर भागीदारी सुनिश्चित करते हैं। शारीरिक सहयोग के अलावा भी आर्थिक सहायता प्रदान करते हैं। साथ ही साथ आरती के समय आते भी हैं और प्रसाद ग्रहण करते हैं। इतना ही नही बल्कि चाँदनी चौक निवासी करमुलाह अंसारी ही पंडाल का मंदिर नुमा अंतिम रूप निः शुल्क दे रहे हैं।
पूजा समिति के अध्यक्ष सुरेश मेहता बताते हैं कि सभी के सहयोग से यह पूजा-अर्जना सम्पन्न होता है। मुख्यद्वार से लेकर पंडाल बनाने और मूर्ति विसर्जन तक खूब सहयोग प्राप्त होता है। अन्य पंडालों के अपेक्षाकृत यहाँ प्रशासन कम गस्ती लगाती है, क्योंकि यहाँ के आपसी सौहार्द से परिचित है। बाबा-दादा ने प्रेम और मोहब्बत से रहने को सिखाया है उन्हीं के सिखाये हुए बातों को जीवन चरित्र में आत्मसात कर रहा हूँ। उन्होंने कहा कि-
मैं हिन्द देश का वासी हूँ, मैं हिन्द देश से आया हूँ।
मैं प्रेम सबसे करता हूँ, मैं प्रेम सीखने आया हूँ।।
चांदनी चौक निवासी अहमद अंसारी बताते हैं कि सभी के सहयोग से ताजिया रखा जाता है जहां सभी का सहयोग प्राप्त होता है। अपनी स्वेक्षा से आर्थिक सहयोग से भी मदद करते हैं, कभी एहसास ही नहीं होता है कि दो संस्कृति के लोग रहते हैं। हिन्दू भाई ताजिया कंधे पर सहारा देकर ले जाते हैं।
अहमद अंसारी फिलहाल का स्मरण सुनाते हैं कि एक वर्ष ऐसा संयोग आया कि मोहर्रम और विजयादशमी एक तिथि को आया। लेकिन कोई उत्साह में कमी नहीं आई। दोनों एक दूसरे को सहयोग कर पूजा और मोहर्रम सम्पन्न कराए। जब उनका लाउडस्पीकर (डीजे) बंद होता हो हम सभी फतेहा करते और जब बाजा बंद करते तो वो आरती करते।
हमारे पूर्वजों ने हिंदुस्तान से मोहब्बत किया है जहाँ के मिट्टी को दोनों समय नमाज पढ़ने के वक्त चूमा है। हिंदुस्तान की अछून्नय संस्कृति को महफूज रखना चाहते हैं। शायरी अंदाज में उन्होंने कहा कि-
“वजू करूँ अजमेर में, काशी में स्नान।
धर्म मेरा इस्लाम है, भारत जन्म स्थान।।”
मेरालवासियों का जो मोहब्बत मिला है वो निजी भाई और गोतिया से कदापि कम नहीं है। मैं अल्लाह से दुआ करूंगा कि जब भी दोबारा जन्म मिले तो मेराल (हिंदुस्तान) की सरजमीं प्राप्त हो।
हिन्दू-मुस्लिम एकता हमारी साझी विरासत है। उसी का प्रतिफल है की अकबर जैसे महान बादशाह हुए हैं। उल्लेखनीय है कि मध्यकाल में हिन्दू-मुस्लिम साझी संस्कृति के अनेक कवि एवं विद्वान हुए हैं जिसमें रहीम, रसखान, संत कबीर, दाराशिकोह आदि उल्लेखनीय हैं। मुगलकाल की कवयित्री और कृष्ण भक्त ताज बेगम कहती हैं कि-
“नंद के कुमार कुरबान तेरी सूरत पै,
हूँ तो मुगलानी हिंदूआनी ह्वे रहूंगी मैं।“
जबकि वर्तमान समय की बात करूं तो मशहूर मुस्लिम गायिका शहनाज अख्तर (मैया पांव पैजनियां) और फरमानी नाज (हर हर शम्भू-शिव भजन) को भला कौन नहीं जनता? ऐसे उदाहरण समाज में भरे पड़े है, जिससे हिन्दू-मुस्लिम एकता ही नहीं बल्कि विश्वबंधुत्व को बढ़ावा मिल रहा है।
हिन्दू-मुस्लिम एकता और ईश्वरीय एक कि अवधारणा रखने वाले ये दोनों साम्प्रदायिक सौहार्द की मिसाल हैं तो दूसरी ओर सिख वैसे लोगों के लिए, जो क्षुद्र और संकुचित विचार रखते हुए सम्प्रदाय के नाम पर इंसान को बाँटकर अपनी स्वार्थ पूर्ति के लिए, आपसी भाईचारा के लिए नासूर बनते हैं।
भारतीय समाज में विविधता में एकता पाई जाती है, जहाँ विभिन्न जाति, मतवाद, सम्प्रदाय, वर्ग और नाना संस्कृति के लोग अपने पर्व-त्यौहारों को मनाते हैं। सभी को एक साथ और एक भावधारा के साथ लेकर चलने का नाम ही समाज है (समानं एजती इति समाज:) जो मेराल में दृष्टिगोचर हो रही है।

राज मोहन (सहायक प्राध्यापक)
समाजशास्त्र विभाग
गुलाबचंद प्रसाद अग्रवाल कॉलेज
छत्तरपुर (पलामू) झारखंड-822113
