आंखें फिर से तकलीफ दे रही हैं, इसलिए कुछ दिनों से लिख नही पा रहा हूँ। लेकिन इधर कुछ दिनों से विश्व में ऐसी घटनायें घट रही हैं जिसे प्राउटिष्टों को अनदेखा नहीं करना चाहिए। यदि कहूँ कि महा विश्व का संग्राम पूरे शबाब पर है तो कोई अतिशयोक्ति नहीं। सारी दुनिया इस महासंग्राम के दायरे में आ गयी है। याद रखिये, यह महाभारत युद्ध की तरह कुरूक्षेत्र के मैदान में नहीं लड़ा जा रहा है, पूरी दुनिया इस युद्ध का मैदान है। इस युद्ध में न सैनिक हैं, न सेनापति है फिर भी युद्ध जैसी बरबादी हो रही है। यह केवल भारत के पहाड़ों और मैदानों में ही नहीं हो रहा है, पूरी दुनिया पर संकटों का पहाड़ जैसे टूट पड़ा है। इस बार की जुलाई मानव इतिहास की सबसे गर्म जुलाई के तौर पर दर्ज की गई। चीन के कुछ जगहों में पारा 52.2 डिग्री हो गई। अगस्त में ग्रीस, कनाडा, अमेरिका, इटली के जंगलों में भीषण आग लगने की खबरें आई। घटनायें इतनी तेजी से बढ़ी हैं कि वैज्ञानिक तक इसकी कल्पना नहीं कर सके थे। बचे खुचे संकट साम्राज्यवादी पूंजीवाद और भावजडतावादी मजहबी कट्टरवाद पैदा कर रहा है, लेकिन दोनों के भाग्य का फैसला हो गया है। अपना विनाश वे खुद करेंगे, लेकिन जाते-जाते मानवता को जो टीस वे देते जायेंगे उसका उपचार कौन करेगा?
प्राउटिष्ट ही उसका उपचार करेगा। प्राउटिष्टों के बीच से ही निकला हुआ सदविप्र नये संसार की रचना करेगा। यम-नियम में प्रतिष्ठित ये सदविप्र ही नव्य-मानवता का इतिहास रचेंगे, यम-नियम केवल शब्दों में नहीं स्वभाव में होना चाहिए। यदि यम के सत्य में कोई साधक प्रतिष्ठित होता है तो वह जो भी कहेगा उसको होना ही है। यदि अहिंसा में प्रतिष्ठित होता है तो उसके निकट हिंसक प्राणी पालतू जैसा आचरण करेगा, योगसूत्र में भी कुछ ऐसा ही कहा गया है। ऐसे ही सदविप्र ‘सर्वोच्च सदविप्र बोर्ड’ के सदस्य होंगें। वे सामान्य नैतिकता के साथ आध्यात्मिक नैतिकता में प्रतिष्ठित होंगे। महाभारत में श्रीकृष्ण ने आध्यात्मिक नैतिकता का दिग्दर्शन युधिष्ठिर के माध्यम से कराया था। जब उनसे कहलवाया गया- “अश्वत्थामा हतो”। और फिर ढोल-नगाडों के कोलाहल के बीच धीमे स्वर में युधिष्ठिर कहते हैं- “नरो वा कुंजरो” (वह नर है या हाथी?)। द्रोणाचार्य इसे सुन नहीं सके, केवल इतना सुना कि अश्वत्थामा मारा गया, और द्रोणाचार्य के हाथों के बाण गिर गये। पुत्र वियोग सह नहीं सके, बाण-रहित द्रोणाचार्य मारे गये। धर्म की रक्षा के लिए उनका मरना जरूरी था। यही आध्यात्मिक नैतिकता है। भीष्म पितामह सामान्य नैतिकता में बंधे थे। उनकी प्रतिज्ञा थी हस्तिनापुर सिंहासन के प्रति प्रतिबद्ध रहूंगा और उसी हस्तिनापुर सिंहासन के समक्ष द्रौपदी का चीरहरण हुआ। पितामह देखते रहे, सामर्थ्य रहते कुछ नहीं कर सके, क्योंकि वे सिंहासन के प्रति प्रतिबद्ध थे। सिंहासन जो भी गलत सही करे अपनी प्रतिज्ञा में बंधे होने के कारण उन्होंने विरोध नहीं किया। फिर ऐसी सामान्य नैतिकता और प्रतिज्ञा किस काम की जो एक राजकन्या को जो उनके कुल की ही लाज थी, उसे बचा नहीं सके। इसलिए बाबा ने एथिक्स अथवा सदाचार शास्त्र को एक नया आयाम दिया जिसे “नियो एथिक्स” या “नव्य नीति चेतषा” कहते हैं। तो सदविप्र वे ही होंगे जो नव्य नीति चेतषा में पूरी तरह प्रतिष्ठित होंगे। वे ही नव्य-मानवता के दिशावाहक होंगे। सदविप्र समाज की नींव डालेंगे, फिर नया संसार बसेगा। छोटी-छोटी बातों से जो मान-अपमान से प्रभावित होते हैं, वे कैसे सदविप्र की भूमिका में आ सकते हैं?
