तुमने मुझे नव चेतना के लिए कुछ लिखने कहा है, लेकिन क्या लिखूँ यह समझ में नहीं आ रहा है। अभी चारों तरफ नवरात्र और दशहरे की गहमा-गहमी है। अभी राँची के जिस खेल गांव हाउसिंग सोसाइटी में हूँ, वहाँ भी कई दिनों से उत्सव चल रहा है। न चाहते हुए भी मुझे उत्सव में भाग लेने जाना पडता है, आसपास के लोग चलने के लिए बाध्य कर देते हैं। कभी-कभी दूसरों की खुशी में शामिल होना भी मन को तृप्त कर देता है। यह त्यौहार भारतीय सामाजिक जीवन में कई-कई दिनों तक चलने वाला अकेला त्यौहार है। हमारे चर्याचर्य के अनुसार भी पांच दिनों तक चलने वाला यह अकेला त्यौहार है। हम इसे शरद उत्सव कहते हैं और परम्परा में नौ दिनों तक शक्ति की उपासना का विधान है और फिर दसवें दिन पर्याप्त अर्जित शक्ति से पाप शक्ति के प्रतीक रावण का दहन होता है। हर साल दशहरा आता है और हम रावण के पुतले जलाते हैं। यह रावण क्या है और उसे जलाकर हम क्या सिद्ध करना चाहते हैं? इसका पौराणिक संदर्भ हटा दें तो रावण का प्रतीक एक मनोवैज्ञानिक सत्य है कई व्यक्तित्व को लेकर, ओढ़कर जीना। कहते हैं रावण के दस सिर थे, वह दशानन था। खंडित व्यक्तित्व वाला आदमी। जब व्यक्तित्व जटिल हो जाता है उसके अनेक टुकड़े हो जाते हैं। यह जटिलता आती है सामाजिक मूल्यों के कारण। हमारा पूरा जीवन एक सामाजिक दिखावा होता है। हम भीतर जैसे हैं वैसे ही बाहर नहीं दिखा सकते, इसीलिए हमें नकली चेहरे ओढ़ने पड़ते हैं। यह पाखंड है और हम सब इस पाखंड में जीते हैं।
राम इस पाखंड को तोड़ देते हैं। रावण असुर है और हमारे चित्त की दशा जब तक आसुरी रहती है तब तक हमारे भी बहुत चेहरे होते हैं। इतने चेहरों से हम दूसरों को धोखा देते हैं। सवाल है हम अपने अंदर के दशानन को कैसे जलायें? हम इसके प्रति बिल्कुल बेहोश हैं। लेकिन हर्ज नहीं बेहोशी टूट सकती है। रावण के पुतले जलाकर तो वह नहीं टूट सकती, हाँ, ध्यान का होश जगाकर उसे तोड़ा जा सकता है। तब आपके जीवन में राम आ जाते हैं। हमारा असली चेहरा कभी बदलता नहीं। वह चेहरा है राम का, वह चेहरा है कृष्ण का, वह चेहरा है आनंद मूर्ति का, जो हमारी आत्मा है। जैसे रावण हमारे अंदर है, वैसे राम भी अंदर ही हैं। इसीलिए पहले दशहरा और उसके बाद विजयादशमी होती है। यही हमारे जीवन में नव चेतना के आर्विभाव का एकमात्र तरीका है।
