श्री पी आर सरकार के लेखों से उद्धृत
लगभग 800 करोड़ वर्ष पहले पृथ्वी पर कहीं कठोर पदार्थ जैसा कुछ नहीं था। यह ग्रह उस समय हुआ गैस पिण्ड था। पृथ्वी का स्थलभाग बना है मात्र 230 करोड़ वर्ष पहले। टर्सियरी युग के अन्तिम दिनों और क्रेटशियन युग के प्रारम्भिक दिनों में पृथ्वी की छाती पर गोण्डवानालैण्ड का सर्वप्रथम उद्भव हुआ था। उस समय पृथ्वी का मध्यभाग जलमय था। उन दिनों अरब सागर जैसा कुछ नहीं था। नहीं था बंगोपसागर या अन्य द्वीप। उत्तर भारत का अस्तित्व भी उस समय नहीं था। आज के तिब्बत देश का अथवा हिमालय का पता उन दिनों नहीं था। मात्र एक अविच्छिन्न भूमिखण्ड उन दिनों परिव्याप्त था जिसका भाग विशेष था आज के अफ्रीका महादेश का पूर्वी भाग, भारत उपमहादेश (जो था उत्तरी गोलार्द का अंश विशेष), मलेशिया और आस्ट्रेलिया। प्राचीनतम इस द्वीपपुंज सदृश दीर्घ भूमिखण्ड का अंश विशेष था उन दिनों आज का कनाडा और अर्जेन्टीना देश का भू-भाग भी। यह जो विशाल भूमिखण्ड है जो कभी विस्तृत था आज के अरबसागर, बंगोपसागर, इन्डोनेशिया द्वीपपुंज, दखिण भारत की मालभूमि, दक्षिण-पूर्व अफ्रीका और ओशियानिया तक, भू-तत्वविदों और ज्योतिर्विज्ञानियों ने उनका नामकरण किया था गोण्डवानालैण्ड। उन्होंने इस भूमिखण्ड का ऐसा नामकरण इस कारण किया था कि आष्ट्रिक गोष्ठी के अन्तर्गत गोण्ड जनजाति कभी उस विशाल भूमिखण्ड के मध्यभाग में निवास करती थी। इस मध्य अंचल की भूमि गोण्डवानालैण्ड की प्राचीनतम मृत्तिका नहीं मानी जाती। आज भी 30 करोड़ वर्ष प्राचीन भारत के छत्तीसगढ़ अंचल में उन्हीं गोण्ड लोगों के उत्तराधिकारी लोग निवास करते आ रहे है।
राढ़ समुद्र की सतह से ऊपर अवस्थित गोण्डवानालैण्ड का प्राचीनतम भूमिखण्ड है। राढ़ की छाती पर अवस्थित हम लोगों के आनन्दनगर के पहाड़ कम से कम 30 करोड़ वर्ष प्राचीन है। उस समय हिमालय का भी जन्म नहीं हुआ था।
प्राचीन युग का भुकम्प
उसके बाद आज से कम से कम तीन करोड़ वर्ष पहले प्लूटोनिक भूकम्प आया था। आज जहाँ बंगोपसागर और अरब सागर हैं उस सुविस्तृत भाग का भूखण्ड तत्कालीन भयंकर भूकंप के फलस्वरूप समुद्रगर्भ विलीन हो गया था। उस भूकंप के परिणामस्वरूप ही आज का उत्तर भारत उदभूय हुआ था। उस भूकम्प के बाद अरब सागर बंगोपसागर अंचल में उन दिनों जो पहाड थे वे परिणत हुए द्वीपभूमि में। इसी प्रकार 503 सागर-द्वीप उग आए थे जिनके बीच आज के मलेशिया, इन्डोनेशिया, फ़िलीपीन्स इत्यादि देश और द्वीपमय अंचल भी थे। यह सब तो है ही, इसके अलावा हिमालय की भी उदभूति हूई थी लगभग दो-तीन करोड़ वर्ष पूर्वलेकिन गोण्डवानालैण्ड और राढ 30 करोड़ वर्ष से भी प्राचीन हैं।
शिवालिक पर्वतमाला की मिट्टी के नीचे आज भी सामुद्रिक प्राणियों के जीवाश्म पाये जाते हैं। हिमालय पर्वत भी कभी समुद्र के नीचे था इसके प्रमाण उपलब्ध हैं। सर-समुद्रों में (Sargasso sea) जलधारावाहिक जीव-जंतुओं के गलित मृतदेह परवर्तीकाल में जलावन के तेल में रूपान्तरित हुए हैं। आज के भारत का सुविस्तृत गंगा का मैदानी क्षेत्र हिमाचय विधौत जलोड मिट्टी के द्वारा निर्मित है।
अफ्रीका की सहारा मरूभूमि, सिन्धु और राजस्थान का थार मरू-अंचल एक दिन समुद्र के गर्भ में थे, उनके बालू के टीले भी समुद्र संजात हैं। बालू के ये टीले ही प्रमाणित करते हैं कि ये दोनों विस्तृत मरू-अंचल कभी समुद्र के नीचे अवस्थित थे।
