प्रकृति पर्व करमा – राज मोहन

आदिवासी संस्कृति में प्रकृति का संरक्षण

प्राचीन सभ्यताओं से लेकर आधुनिक काल तक, जनजातियों ने हमारे समाज को आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। ‘आदि’ का अभिप्राय सबसे पुराना और ‘वासी’ का अर्थ  वास करने वालों से है। समाजशास्त्री जी एस घुरिये ने आदिवासीयों को ‘पिछड़े हुए हिंदू’ के नाम से संबोधित किया है। आदिवासी घनघोर जंगल में निवास करते थे और जीवन यापन का साधन जंगल से प्राप्त किया करते थे। इनकी अपनी संस्कृति ही विशिष्ट पहचान है। आर्यों के पहले से आदिवासी सभ्यता एवं संस्कृति यहां विकसित थी। इनकी अक्षुण्ण संस्कृति, अपने सामाजिक व्यवहार और धार्मिक आचरणों से स्वयं को अभिमत करती थी। यही कारण है कि भारत में लंबे आक्रमणकारियों के आगमन के बाद भी ये अपना अस्तित्व और संस्कृति बनाये रखने में कामयाब रहे। इनकी सामाजिक स्थिति एक समान नहीं रही है।

अंग्रेज शासक उन्हें मलेच्छ समझते थे व घृणा करते थे। इनको मूल रूप से मिटाने के लिए 1871 में क्रिमिनल ट्राईबल एक्ट बनाया। इस एक्ट का उद्देश्य ही था इन्हें आपराधी घोषित कर जेल में बंद करना ताकि इनकी पहचान और अस्तित्व मिटाई जा सके। किन्तु ये समुदाय जंगल और पहाड़ों में रहकर नदी-नालों के पानी, जंगली कंद-मूल, जड़ी-बूटी और खानाबदोश जीवन यापन कर संस्कृति और अस्मिता बचाने में सफल हुए।

उनकी सामान्य एवं सीमित जरूरतें थीं तथा किसी भी वस्तु का एकीकरण या कालेधन के संचय की प्रकृति उनके संस्कृति में नहीं थी। वे एक प्रकृति के पुजारी हैं। इनका धार्मिक स्थल कोई इमारत एवं भवन में न होकर खुला आकाश होता है। जहां कभी अपनी उपासना आराधना कर सकते हैं। इनका अपनी संस्कृति एवं प्रकृति में एक गहरा आत्मीय रिश्ता है, तभी तो प्रकृति प्रदत्त धरती, पहाड़ों, वृक्षों, पशु-पक्षियों को आदिवासियों ने अपने जीवन में टोटम (गोत्र के रूप में) के रूप में जोड़ लिया है।

आदिवासी संस्कृति की पहचान के अंतर्गत सिर्फ सामान्य सहभागिता, भाईचारा, सबसे विचित्र प्रकृति से निकट संबंध एवं प्रकृति प्रेम है; जो अन्य सभी संस्कृतियों से आदिवासी संस्कृति को अलग करता है।

आदिवासी संस्कृति में मनुष्य का जीवन बिल्कुल साधारण (चकाचौंध से अलग) है। इनका दृष्टिकोण उपयोगितावादी (विवेकपूर्ण अधिकतम उपयोग) और विचारधारा (जियो और जीने दो) की है। आदिवासी चेतना में प्रकृति के नियम के अंतर्गत संग्रह की अपेक्षा त्याग, प्रतिशोध के बदले दया (क्षमा) आदि का महत्वपूर्ण स्थान है। इनका मानना है कि ‘प्रकृति की कृपा से ही धरती पर मनुष्यों एवं विभिन्न प्राणियों का अस्तित्व है।‘ इस विश्वास का संकेत इनके पर्व-त्योहारों और धार्मिक अनुष्ठानों में देखने को मिलते हैं।

प्रकृति के संरक्षण के लिए आदिवासियों में पर्व-त्योहारों का सीधा संबंध वृक्षों, फूलों और पत्तों से जोड़ा गया है। सरहुल, गंडा टिशु, कदलेटा, माघे, करमा, बड़पहाड़ी पूजन, सोहराई पूजन जैसे सभी त्योहारों का संबंध प्रकृति के स्वच्छ और उन्मुक्त वातावरण से है। इसके लोकगीतों में साल, महुआ, कटहल, करम के वृक्षों को नहीं काटने का निवेदन किया गया है। इनके प्रकृति संपदा से ही उनका भोजन, सुरक्षा, कृषि,  औषधी, जलावन है और जंगल के अंदर ही उनके सुख-दुख और सपने हैं। उनके जीवन का आधार है जल, जंगल और जमीन जिसे ये बचाएं रखे हैं और बचाएं रखना चाहते हैं।

जहाँ आम इंसान चाँद तक पहुंच गया है और वहाँ रहने का विकल्प ढूंढ़ रहा है, वहीँ दूसरी ओर आदिवासी समुदाय विमर्श के दौर के बाद भी हाशिए पर खड़ा है और कई मूल समस्याओं से जूझ रहा है; जिसमें दुर्गम निवास स्थान, कृषि योग्य भूमि का अभाव, ऋण ग्रस्तता, धार्मिक और भाषाई समस्या, बाल विवाह, स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार का अभाव, खानाबदोश जीवन इत्यादि समस्याएं प्रमुख हैं।

भारतीय संविधान में इनके सामाजिक और आर्थिक उत्थान के लिए विशेष प्रावधान रखे गए हैं, कुछ स्थिति अच्छी हुई भी है इससे इंकार नहीं किया जा सकता है। विधायक, सांसद, प्रदेश के मुख्यमंत्री तक ही नहीं बल्कि राष्ट्रपति तक का सफर तय किया है किन्तु आज भी समय और संख्या के अनुपात में वे बहुत अल्प हैं। आज आज़ादी के 75 वर्षों के बाद भी इनकी दीन-हीन (सामाजिक, आर्थिक) स्थिति आधुनिक समाज के नाम पर कलंक है।

वैश्विक स्तर पर जहां जलवायु प्रदूषण और सतत विकास की चहुंमुखी चर्चा-परिचर्चा ही नहीं हो रही है बल्कि आज पूरा विश्व चिंतित है। आज इनकी जीवन शैली और संस्कृति (जल, जंगल और जमीन) और प्रकृति पूजा अपनी ओर ध्यान आकर्षित कर रही है। यथार्थ सत्य है कि प्रकृति के संरक्षण, संवर्धन और सतत विकास के अभाव में जीवन की कल्पना संभव नहीं है।

(सहायक प्राध्यापक)

समाजशास्त्र- विभाग

गुलाबचंद प्रसाद अग्रवाल कॉलेज

छत्तरपुर (पलामू) झारखंड-822113

rajmohanraj084@gmail.com