डीएमएस जमालपुर, मार्च 2023 की यादें – प्रद्युम्न नारायण सिंह

जमालपुर डीएमएस पर विशेष

भाग १:

आज रात डेढ बजे मैं राँची से जमालपुर पहुंचा हूँ, बहुत अच्छा लग रहा है। छोटा सा शहर पूरे गेरूआ रंग से पट गया है। जब मै रांची से जमालपुर के लिए चला तो बड़ी रोचक घटना हुई। मैं ट्रेन के ए. सी. टू में अकेला था। कल ही झारखंड और बिहार में होली का उत्सव था इसलिए यात्रियों की संख्या बहुत कम थी। ए. सी. टू के उस डब्बे में अकेलेपन के कारण मै थोड़ा परेशान हुआ, लेकिन कुछ ही देर में देखा कि तीन सन्यासी दीदियां बगल के ए. सी. थ्री में सवार हुई। मुझे थोडी सी राहत मिली। दीदी मेरे पास आई। मैंने उनसे अनुरोध किया कि यदि मैं सोया रह गया तो जमालपुर पहुंचने के पहले मुझे जगा देने का कष्ट करें। दोनों डब्बे अंदर से मिले थे।होली के कारण डब्बे में कोई भी नही था। बहरहाल गाड़ी खुली। कूपे में चारों तरफ लगे परदे के कारण मुझे टेन्ट हाउस जैसे लग रहा था। धीरे-धीरे नींद आ गयी।

पांच बजे गाड़ी बोकारो पहुंची तो किसी आदमी के पदचाप के कारण मेरी नींद टूट गई। देखा सन्यासी वेश में कोई सज्जन अपना बर्थ तलाश रहे हैं। वेश के कारण मेरी दिलचस्पी बढ़ी और निकट जाकर देखा तो मेरे आत्मीय बंधु आचार्य स्वरूपानंद अवधूत जमालपुर जाने के लिए गाड़ी में सवार हुए हैं। फिर बर्थ का नंबर देखने लगे तो मेरे सामने वाला बर्थ उनके नाम से आरक्षित मिला। फिर तो यात्रा बड़ी सरस हो गई। वे छात्र जीवन से ही बाबा के व्यक्तिगत सम्पर्क में रहे हैं। आरंभिक काल की बहुत सी कहानियां सुनाते चल रहे थे। बाबा जब विवाह करके आये तो कैसे जमालपुर स्टेशन पर उनकी अगवानी की 75 पैसे में कैसे 60 लाख का कॉलेज भवन आनंद नगर में बन गया। बहुत सी रोचक और प्रेरक घटनायें बताते चल रहे थे। मेरी यात्रा अब उत्सव में बदल गयी थी। हर यात्रा में उनकी कृपा की अनुभूति होती रही है।

भाग २:

आनंद सम्भूति में तीन दिन का आनंद समारोह थम गया, जमालपुर की उस पर्वतीय उपत्यका में जहाँ दिन के कोलाहल और शोर में संगीत गूंजता था और रात के सन्नाटे में शून्य के स्वर का निनाद था। बहुतों ने अनुभव किया होगा, महासम्भूति के अनेक रहस्यों को समेटे आनंद सम्भूति में भाव रूप ग्रहण करता है। अपने बचपन की दो कहानियां उन्होंने मुझे कृपा पूर्वक सुनाई थी। पर्वत शिखर पर स्थित घने जंगलों से घिरे काली मंदिर का वह परिसर जहाँ कभी शेर गरजते थे, उनकी क्रीड़ा भूमि थी। महा सम्भूति के अनेक रहस्यों से घिरे इस पर्वतीय अंचल में महाविश्व की योजना का आरंभ हुआ था। आनंद नगर में उसका आंशिक रूप गठित हुआ और कोलकाता में सम्पूर्ण मार्गदर्शन दिया गया। पटना और राँची महत्वपूर्ण पड़ाव थे। सौवां जन्मोत्सव बाबा नगरी आनंद सम्भूति में मनाया जाना हम लोगों के भाग्य का चरम उत्कर्ष था। हे बाबा! यह शुभ अवसर देते रहना।

भाग ३:

कल सुबह जमालपुर से पूर्णियाँ के लिए निकल रहा हूँ। अतृप्त मन को तृप्ति का जैसे बोध ही न हो रहा है। महासम्मेलन में कितने भूले-बिसरे बंधुओं से मुलाकात हुई। नेपाल की कुसुम और पवन श्रेष्ठ से मिलकर लगा ही नहीं कि पहली बार मिल रहा हूँ। मेरी सगी सहोदरा जैसी मेरी नतनी चितरूपा को तो अनेक मुख रोचक व्यंजनों को देते हुए दीदी ने निर्देश दिया कि दादा को खिला देना। फोटो भी खूब लिए।

कल संध्या दादा लोगों के स्नेह अनुरोध पर आनंद सम्भूति चला गया था। पी. पी. दादा सहित बीस पच्चीस दादा भी थे। उन लोगों को रात्रि पूजा आनंद सम्भूति में ही आज करनी थी। सारी सजावटें, शामियाने उतार लिए गए थे। सांध्यकाल के धुंधलके में उत्तर से दक्षिण तक फैली पर्वतमाला पहाड़ की परछाई जैसी दिख रही थी। ठंढ़ी हवा देह में कपकपी पैदा कर रही थी। देर तक बाबा चर्चा होती रही। सभी अत्यंत मुग्ध थे। सन्नाटे का संगीत आत्मबोध में डुबो दे रहा था। अपरोक्ष रूप में जैसे गन्धर्व लोक ही आनंद सम्भूति में उतर आया हो।

अतिथि संपादक-नवचेतना